महिला आरक्षण की गूंज के बीच उत्तर प्रदेश के सदनों में आधी आबादी की जमीनी हकीकत

महिला आरक्षण बिल और यूपी की राजनीति: लोकसभा से लेकर विधान परिषद तक महिलाओं की भागीदारी के चौंकाने वाले जमीनी आंकड़े।
उत्तर प्रदेश विधान सभा
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उत्तर प्रदेश: केंद्र सरकार ने महिला आरक्षण विधेयक को लागू करने के लिए हाल ही में संसद का तीन दिवसीय विशेष सत्र बुलाया है। इस ऐतिहासिक कदम के जरिए 2029 के आम चुनावों से लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित किया जाना है। इसी बीच, उत्तर प्रदेश के विभिन्न निर्वाचित सदनों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की वर्तमान स्थिति एक बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करती है, जो वास्तव में इस नए कानून की सख्त जरूरत को भी साबित करती है।

उत्तर प्रदेश के परिप्रेक्ष्य में अगर लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा और विधान परिषद के आंकड़ों का गहराई से विश्लेषण किया जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि राजनीति के अहम मंचों पर महिलाओं की भागीदारी अभी भी बेहद कम है।

मौजूदा लोकसभा की बात करें तो उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से केवल सात पर महिला सांसद काबिज हैं। यह कुल सीटों का महज 9 प्रतिशत है। इन आंकड़ों में सबसे अच्छी स्थिति समाजवादी पार्टी की है। सपा के 37 सांसदों के दल में पांच महिला सांसद जीतकर आई हैं, जो कि 13.5 प्रतिशत बैठता है।

वहीं, उत्तर प्रदेश से लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी के कुल 33 सांसद हैं, लेकिन इनमें से सिर्फ एक महिला सांसद हैं और वह मथुरा से चुनी गईं हेमा मालिनी हैं। भाजपा की सहयोगी पार्टी अपना दल (एस) के पास भी राज्य से एक महिला सांसद हैं, जो पार्टी अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल हैं।

अगर 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान दिए गए टिकटों पर नजर डालें, तो भाजपा और उसकी सहयोगी रालोद (RLD) ने छह-छह महिला उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारा था। दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी और उसकी सहयोगी कांग्रेस ने क्रमशः 12 और 1 महिला उम्मीदवार पर दांव लगाया था। इसके अलावा मायावती के नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने तीन महिलाओं को अपना प्रत्याशी बनाया था।

इससे पहले वर्ष 2022 के विधानसभा चुनावों में सभी राजनीतिक दलों ने मिलकर कुल 559 महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया था। यह चुनाव लड़ रहे कुल 4402 उम्मीदवारों का सिर्फ 13 प्रतिशत था। इनमें सबसे ज्यादा 154 महिलाओं को कांग्रेस ने मैदान में उतारा था। इसके बाद भाजपा ने 45 और सपा ने 42 महिलाओं को अपना उम्मीदवार बनाया था, जबकि बसपा की तरफ से 38 महिला प्रत्याशी मैदान में उतरी थीं।

राज्यसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व निचले सदन के मुकाबले थोड़ा बेहतर जरूर है, लेकिन यह भी समानता के स्तर से काफी नीचे बना हुआ है। उच्च सदन में उत्तर प्रदेश के कोटे के 31 सदस्यों में से केवल सात महिलाएं हैं। इस प्रकार वहां महिलाओं की हिस्सेदारी 22.5 प्रतिशत है।

राज्य से इन सात महिला राज्यसभा सांसदों में से छह भारतीय जनता पार्टी से आती हैं। वहीं, समाजवादी पार्टी के कुल चार राज्यसभा सदस्य हैं, जिनमें अभिनेत्री से नेता बनीं जया बच्चन पार्टी की एकमात्र महिला प्रतिनिधि हैं।

उत्तर प्रदेश विधानसभा के आंकड़ों पर गौर करें तो यहां की कुल 403 सीटों में से केवल 51 पर महिला विधायक हैं, जो सदन की कुल ताकत का मात्र 12.6 प्रतिशत है। इसमें भाजपा के 257 विधायकों में 30 महिलाएं शामिल हैं, जो करीब 11.6 प्रतिशत बैठता है।

उत्तर प्रदेश विधानसभा में समाजवादी पार्टी के 102 विधायकों में से 15 महिला विधायक हैं, और इनका प्रतिशत 14.7 है। भाजपा की सहयोगी अपना दल (एस) के 13 विधायकों में चार महिलाएं हैं, जो कि 30.7 प्रतिशत का एक मजबूत आंकड़ा है।

इसी तरह, राष्ट्रीय लोक दल के नौ सदस्यों में से मिथलेश पाल इकलौती महिला विधायक हैं, जो लगभग 11 प्रतिशत के बराबर है। कांग्रेस के पास विधानसभा में दो विधायक हैं, जिनमें से एक महिला विधायक आराधना मिश्रा मोना हैं।

विधान परिषद में तो हालात और भी ज्यादा निराशाजनक नजर आते हैं। यहां वर्तमान में कुल 99 विधान परिषद सदस्य (MLC) हैं, जिनमें से केवल चार महिलाएं हैं। उच्च सदन में भाजपा के कुल 79 सदस्य हैं, जिनमें प्रज्ञा त्रिपाठी (बहराइच), वंदना वर्मा (सहारनपुर) और रमा निरंजन (झांसी) के रूप में तीन महिला एमएलसी शामिल हैं।

चौथी महिला एमएलसी अन्नपूर्णा सिंह हैं, जो आजमगढ़ से निर्दलीय चुनी गई हैं। भाजपा के किसी भी सहयोगी दल, जैसे सुभासपा (SBSP), अपना दल (एस), निषाद पार्टी और रालोद का विधान परिषद में कोई भी महिला प्रतिनिधि मौजूद नहीं है। यहां तक कि समाजवादी पार्टी के पास 10 एमएलसी हैं, लेकिन सदन में उनकी ओर से भी किसी महिला को सदस्य नहीं बनाया गया है।

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