लखनऊ: उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (Special Intensive Revision - SIR) का ड्राफ्ट 6 जनवरी, 2026 को जारी कर दिया गया है। इस नई सूची ने प्रदेश में घटते लिंगानुपात (Gender Ratio) को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है, जिससे महिलाओं की चुनावी भागीदारी पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
पुनरीक्षण प्रक्रिया से पहले, 27 अक्टूबर, 2025 तक उत्तर प्रदेश में प्रति 1,000 पुरुष मतदाताओं पर महिला मतदाताओं की संख्या 877 थी। हालांकि, SIR अभियान के तहत चले सत्यापन और नाम हटाने की प्रक्रिया के बाद, जारी ड्राफ्ट सूची में यह आंकड़ा गिरकर 824 पर आ गया है।
डेढ़ करोड़ से अधिक महिला वोटरों के नाम हटे
आंकड़ों पर गौर करें तो यह गिरावट काफी बड़ी है। 2011 की जनगणना के अनुसार, यूपी का कुल जनसंख्या लिंगानुपात 911 था, जो पहले से ही राष्ट्रीय औसत से कम था। ताज़ा चुनावी आंकड़ों में, महिला मतदाताओं की कुल संख्या लगभग 7.22 करोड़ से घटकर करीब 5.67 करोड़ रह गई है। इसका सीधा अर्थ है कि करीब 1.54 करोड़ (21.4%) महिलाओं के नाम सूची से कम हुए हैं।
इसकी तुलना में, पुरुष मतदाताओं की संख्या में गिरावट की दर थोड़ी कम रही। पुरुष मतदाताओं की संख्या लगभग 8.23 करोड़ से घटकर 6.88 करोड़ हुई, यानी इसमें करीब 1.34 करोड़ (16.3%) की कमी आई है।
साहिबाबाद में स्थिति सबसे चिंताजनक
गाजियाबाद जिले की साहिबाबाद विधानसभा सीट इस असंतुलन का सबसे बड़ा उदाहरण बनकर उभरी है। यहां अक्टूबर 2025 में लिंगानुपात 779 था, जो 6 जनवरी के ड्राफ्ट में गिरकर 646 के बेहद निचले स्तर पर पहुंच गया है। यह 133 अंकों की भारी गिरावट है। एक अधिकारी ने बताया कि SIR ड्राफ्ट रोल में साहिबाबाद का लिंगानुपात राज्य में सबसे कम है। इसका कारण शहरी प्रवासन, कागजी कार्रवाई में चुनौतियां या सत्यापन में कमियां हो सकती हैं, जिसका असर घनी आबादी वाले क्षेत्रों में महिलाओं के पंजीकरण पर पड़ा है।
पिता के नाम वाली आईडी पर भी चली कैंची
एक अन्य प्रमुख संकेतक 25 वर्ष और उससे अधिक आयु की उन महिलाओं से जुड़ा है, जिनके वोटर आईडी कार्ड (EPIC) में पति के बजाय पिता का नाम दर्ज था। जुलाई 2025 में इस श्रेणी की संख्या 71.18 लाख थी। SIR प्रक्रिया के बाद, यह आंकड़ा नाटकीय रूप से घटकर महज 29.04 लाख रह गया है। इसमें 42.14 लाख, यानी लगभग 59.2% की भारी कमी आई है। अधिकारियों का मानना है कि ग्रामीण नामकरण परंपराओं या घर-घर सत्यापन के दौरान पर्याप्त सबूत न मिल पाने के कारण ऐसे नामों की सख्त जांच हुई है।
शहरी बनाम ग्रामीण प्रभाव
आंकड़े बताते हैं कि शहरी क्षेत्रों में नाम कटने की दर (28%) ग्रामीण क्षेत्रों (15.23%) की तुलना में काफी अधिक रही। शहरी मतदाता 27 अक्टूबर, 2025 को 4.16 करोड़ थे, जो 6 जनवरी, 2026 को घटकर 2.99 करोड़ रह गए। वहीं, ग्रामीण इलाकों में यह संख्या 11.28 करोड़ से घटकर 9.56 करोड़ हुई। शहरी क्षेत्रों में हुई इस भारी कटौती ने साहिबाबाद जैसी जगहों पर लैंगिक असंतुलन को और बढ़ा दिया है।
विश्लेषकों के अनुसार, SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को साफ-सुथरा बनाना था—जिसमें मृतक, शिफ्ट हो चुके या दोहरे नामों को हटाया जाना था। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि शादी के बाद नाम बदलने, पारिवारिक सत्यापन पर निर्भरता या दस्तावेजों की कमी जैसे कारणों से इस प्रक्रिया का महिलाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। विश्लेषकों ने भविष्य के चुनावों से पहले महिलाओं के मताधिकार को सुरक्षित करने के लिए पुन: सत्यापन और जागरूकता अभियान चलाने की मांग की है।
अभी भी मौका: 6 फरवरी तक कर सकते हैं दावा
उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) नवदीप रिणवा ने स्पष्ट किया है कि यह केवल ड्राफ्ट लिस्ट है और अंतिम नहीं। उन्होंने बताया कि दावे और आपत्तियां दर्ज कराने के लिए 6 फरवरी, 2026 तक की समय सीमा तय की गई है। इस दौरान प्रभावित मतदाता (महिलाएं सहित) अपने नाम फिर से जुड़वाने के लिए सबूत पेश कर सकते हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि 6 मार्च, 2026 को जारी होने वाली अंतिम मतदाता सूची त्रुटिहीन होगी और इसमें सभी वास्तविक मतदाताओं को शामिल किया जाएगा।
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