नई दिल्ली: केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने एक महत्वपूर्ण आदेश जारी करते हुए स्पष्ट किया है कि अधिवक्ता अपने मुवक्किलों (Clients) की ओर से लड़ रहे मुकदमों का विवरण प्राप्त करने के लिए 'सूचना के अधिकार' (RTI) अधिनियम का उपयोग नहीं कर सकते हैं। आयोग ने अपने फैसले में मद्रास उच्च न्यायालय के एक निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि कानून का इस तरह इस्तेमाल करना इसके मूल उद्देश्यों को विफल करता है।
क्या है पूरा मामला?
यह फैसला सूचना आयुक्त सुधा रानी रेलंगी द्वारा सुनाया गया। उन्होंने एक अधिवक्ता द्वारा दायर की गई दूसरी अपील को खारिज कर दिया। यह मामला हरियाणा के एक जवाहर नवोदय विद्यालय में फलों और सब्जियों की आपूर्ति के अनुबंध (contract) को समाप्त करने से जुड़े विवाद से संबंधित था।
आयोग की दलील: 'नागरिक के तौर पर मांगें, वकील के तौर पर नहीं'
12 जनवरी को जारी अपने आदेश में, सूचना आयुक्त रेलंगी ने कहा, "अपीलकर्ता, जो पेशे से एक अधिवक्ता हैं, ने अपने भाई की ओर से जानकारी मांगी है, जो प्रतिवादी सार्वजनिक प्राधिकरण (Public Authority) के यहां फल और सब्जियों के सप्लायर हुआ करते थे। अपीलकर्ता ने कोई भी ऐसा तथ्य नहीं बताया कि उनका भाई, जो एक नागरिक के रूप में स्वयं जानकारी मांग सकता है, वह ऐसा क्यों नहीं कर रहा है। इससे यह प्रतीत होता है कि अपीलकर्ता ने सीधे तौर पर अपने मुवक्किल (भाई) की ओर से जानकारी मांगी है, जो मद्रास उच्च न्यायालय (मदुरै बेंच) के फैसले के आलोक में स्वीकार्य नहीं है।"
हाई कोर्ट के फैसले का हवाला
आयोग ने मद्रास उच्च न्यायालय के उस फैसले के प्रासंगिक हिस्सों का उल्लेख किया, जिसमें कोर्ट ने आरटीआई के एक मामले में टिप्पणी की थी। कोर्ट ने कहा था कि एक प्रैक्टिस करने वाला वकील अपने मुवक्किल की ओर से दायर मुकदमों से संबंधित जानकारी नहीं मांग सकता। हालांकि, एक नागरिक के रूप में वह व्यक्तिगत तौर पर जानकारी मांग सकता है, लेकिन एक वकील की हैसियत से अपने क्लाइंट के लिए नहीं।
फैसले में कहा गया कि अगर इसकी अनुमति दी गई, तो हर वकील अपने मुवक्किल की तरफ से जानकारी हासिल करने के लिए आरटीआई प्रावधानों का इस्तेमाल करना शुरू कर देगा। यह स्थिति आरटीआई अधिनियम की योजना और इसके उद्देश्यों को आगे नहीं बढ़ाती है।
निजी फायदे के लिए नहीं हो सकता कानून का इस्तेमाल
कोर्ट ने अपने फैसले में जोर देकर कहा था कि, "इस अधिनियम का उपयोग व्यक्तिगत हितों के लिए नहीं किया जा सकता और न ही इसे वकीलों के हाथों में अपनी वकालत (Practise) को बढ़ाने के लिए हर प्रकार की जानकारी मांगने का औजार बनना चाहिए।"
दूसरे मामले में भी यही रुख
सुधा रानी रेलंगी ने भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण (Inland Waterways Authority of India) से जुड़े एक अन्य मामले में भी यही रुख अपनाया। इस केस में भी एक वकील ने अपने मुवक्किल की ओर से आरटीआई आवेदन और प्रथम व द्वितीय अपील दायर की थी, जिसमें दावा किया गया था कि उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं मिला।
आयोग ने हाई कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए 12 जनवरी और 14 जनवरी के अपने आदेशों के माध्यम से इन मामलों का निपटारा कर दिया।
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