
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सशस्त्र बलों को एक अहम निर्देश दिया है। इसके तहत सेना में पात्र महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन (परमानेंट कमीशन) देने का आदेश जारी किया गया है। साथ ही, जो महिला अधिकारी पहले ही सेवामुक्त हो चुकी हैं, उन्हें पूरे पेंशन और अन्य लाभ देने को कहा गया है।
अदालत ने माना है कि इन सेवामुक्त अधिकारियों ने पेंशन के लिए जरूरी 20 साल की अर्हक सेवा पूरी कर ली है। इसी आधार पर उनकी पेंशन तय की जाएगी और उन्हें 1 जनवरी 2025 से बकाया राशि (एरियर) का भुगतान किया जाएगा।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस एन के सिंह की पीठ ने यह फैसला सुनाया। तीन अलग-अलग लेकिन संबंधित फैसलों में, पीठ ने थल सेना, नौसेना और वायु सेना में शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) महिला अधिकारियों के मूल्यांकन में 'प्रणालीगत' खामियों और ढांचागत पक्षपात को प्रमुखता से उजागर किया।
सशस्त्र बलों में लैंगिक समानता की लंबी कानूनी लड़ाई में यह फैसला एक नया अध्याय है। इस रूढ़िवादी सोच को सबसे पहले साल 2020 में 'रक्षा मंत्रालय के सचिव बनाम बबीता पुनिया' और 'भारत संघ बनाम एनी नागराजा' मामलों में शीर्ष अदालत के ऐतिहासिक फैसलों ने तोड़ा था। तब कोर्ट ने महिलाओं को पुरुषों के समान स्थायी कमीशन देने का अनिवार्य आदेश दिया था।
हालांकि, जब सेना ने उन फैसलों को लागू करने के लिए चयन बोर्ड का गठन किया, तो कई महिलाओं को खारिज कर दिया गया। इसके बाद मूल्यांकन प्रक्रिया की निष्पक्षता को चुनौती देने के लिए महिला अधिकारियों ने फिर से अदालतों का रुख किया। मंगलवार को आए ये तीन फैसले असल में तीनों सेनाओं की महिला अधिकारियों द्वारा अलग-अलग अदालतों में लड़ी गई लंबी कानूनी लड़ाई का ही नतीजा हैं।
वायु सेना के मामले में, 2019 की एक नई नीति के तहत 2021 में स्थायी कमीशन से वंचित कर सेवामुक्त किए जाने के बाद महिला अधिकारियों ने सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (AFT) और दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। हालांकि, दोनों ही मंचों ने उनकी याचिकाएं खारिज कर दी थीं।
थल सेना के मामले में, बबीता पुनिया मामले के बाद महिलाओं को नियमित चयन बोर्ड द्वारा परखा गया लेकिन उन्हें तुलनात्मक योग्यता के आधार पर नकार दिया गया। साल 2024 में AFT ने भी उनकी चुनौती को खारिज कर दिया था, जिसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
नौसेना की महिला अधिकारियों का कानूनी सफर शायद सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण रहा। एनी नागराजा मामले के फैसले के बाद, दिसंबर 2020 के चयन बोर्ड द्वारा उन्हें खारिज कर दिया गया था। साल 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को वापस भेज दिया था क्योंकि नौसेना ने AFT के समक्ष "सीलबंद लिफाफे" में मूल्यांकन के मानदंड पेश किए थे। बाद में जब AFT ने एक और नए चयन बोर्ड का आदेश दिया, तो ये महिला अधिकारी अंतिम समाधान के लिए सीधे सुप्रीम कोर्ट पहुंच गईं।
इन तीनों मामलों में एक मुख्य समानता यह उभर कर सामने आई कि स्थायी कमीशन के लिए सैन्य तंत्र पूरी तरह से वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) यानी सालाना प्रदर्शन मूल्यांकन पर निर्भर था। सुप्रीम कोर्ट ने गौर किया कि ये ACR सालों पहले उस समय लिखे गए थे, जब सरकारी नीति महिलाओं को स्थायी कमीशन देने की अनुमति ही नहीं देती थी।
मूल्यांकन करने वाले अधिकारियों को पता था कि महिलाओं का कार्यकाल सीमित है, इसलिए उन्होंने उन्हें लापरवाही से ग्रेड दिए। उन्होंने सबसे अच्छे अंक पुरुष अधिकारियों के लिए बचा कर रखे, क्योंकि उनका दीर्घकालिक करियर सीधे तौर पर इन्हीं अंकों पर निर्भर था।
अदालत की पीठ ने टिप्पणी की कि इस पूरी व्यवस्था का परिणाम एक ऐसा प्रणालीगत पैटर्न था जहां महिला अधिकारियों को लगातार कम ग्रेड मिले। ऐसा उनकी योग्यता में कमी के कारण नहीं, बल्कि उनके करियर के सीमित भविष्य को देखते हुए किया गया। दोषपूर्ण ACR तो एक आम समस्या थी ही, इसके अलावा अदालत ने सेना के तीनों अंगों से जुड़ी कुछ खास और मनमानी प्रथाओं पर भी सख्त रुख अपनाया।
थल सेना की महिला अधिकारियों ने तर्क दिया कि उन्हें व्यवस्थित रूप से उच्च कमान वाली "मानदंड नियुक्तियों" और करियर को निखारने वाले पाठ्यक्रमों से दूर रखा गया, जिससे उनके कुल स्कोर पर नकारात्मक असर पड़ा। वायु सेना की महिला अधिकारियों के मामले में विवाद 2019 की एक मानव संसाधन नीति पर केंद्रित था, जिसने इन-सर्विस पाठ्यक्रमों में अनिवार्य ग्रेड सहित नए न्यूनतम प्रदर्शन मानदंड लागू किए थे।
वहीं नौसेना के मामले में अदालत ने पाया कि चयन बोर्ड की बैठक से पहले महिला अधिकारियों को मूल्यांकन मानदंड और रिक्तियों की गणना के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई थी। कोर्ट ने कड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि यह रवैया निष्पक्षता और पारदर्शिता के मूल मानदंडों का सीधा उल्लंघन है।
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