
नई दिल्ली: ट्रांसजेंडर्स की पहचान, उनके अधिकारों और कल्याण से जुड़े महत्वपूर्ण बदलावों वाला 'ट्रांसजेंडर पर्सन (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026' मंगलवार को लोकसभा में पारित हो गया। हालांकि, इस दौरान विपक्ष ने भारी विरोध जताया और बिल को आगे की जांच के लिए स्थायी समिति (स्टैंडिंग कमेटी) के पास भेजने की मांग की।
विपक्षी सांसदों ने मौजूदा प्रावधानों में संशोधन की आवश्यकता पर सवाल उठाए। उन्होंने बिल पेश करने में दिखाई गई जल्दबाजी की भी कड़ी आलोचना की और इसे एक प्रतिगामी (पीछे ले जाने वाला) कदम बताते हुए सदन से वॉकआउट कर दिया।
इससे पहले, वित्त विधेयक 2026 पर चर्चा समाप्त होने के बाद संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने इस प्रस्तावित कानून को सदन पटल पर रखने के लिए सदस्यों की राय मांगी। उन्होंने व्यापार सलाहकार समिति (बिजनेस एडवाइजरी कमेटी) की बैठक में विपक्षी सदस्यों द्वारा उठाई गई चिंताओं के समाधान की आवश्यकता का भी जिक्र किया।
जब विपक्षी नेताओं ने इसे स्थायी समिति को भेजने की मांग की, तो रिजिजू ने स्पष्ट किया कि इस पर पहले ही एक साल तक स्थायी समिति की कार्यवाही के तहत व्यापक चर्चा हो चुकी है। उनका कहना था कि इस बिल में बहुत अधिक 'महत्वपूर्ण' संशोधन नहीं मांगे जा रहे हैं।
इसके बाद, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री वीरेंद्र कुमार ने इस विधेयक को पेश किया। सदन में इस बिल पर करीब तीन घंटे तक विस्तार से चर्चा की गई।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस प्रस्तावित कानून को ट्रांसजेंडर्स के अधिकारों और उनकी पहचान पर 'खुला हमला' करार दिया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' (X) पर लिखा कि भाजपा सरकार ने ट्रांस समुदाय से कोई सलाह नहीं ली और ऐसा बिल लेकर आई है जो उन्हें सुरक्षा देने के बजाय कलंकित करता है।
उन्होंने अपनी पोस्ट में आगे कहा कि यह सरकार हमारे संविधान का उल्लंघन कर रही है और अपने संकीर्ण विचारों को थोपकर ट्रांसजेंडर समुदायों का सम्मान करने के भारत के समृद्ध इतिहास को नष्ट कर रही है। उन्होंने साफ किया कि कांग्रेस पार्टी इस बिल का कड़ा विरोध करती है।
समाजवादी पार्टी के सांसद आनंद भदौरिया ने आपत्ति जताते हुए कहा कि यह बिल ट्रांसजेंडर व्यक्ति की एक बहुत ही संकीर्ण परिभाषा पेश करता है। उनके अनुसार, इसमें ट्रांस-मेन, ट्रांस-मैस्कुलिन, ट्रांस-विमेन, जेंडर-क्वीर और नॉन-बाइनरी जैसी श्रेणियों को पूरी तरह से बाहर रखा गया है।
डीएमके सांसद टी. सुमति ने इसे 'संवैधानिक प्रतिगमन' बताते हुए आरोप लगाया कि यह बिल संवैधानिक नैतिकता की जगह प्रशासनिक अधिकार थोपने की कोशिश कर रहा है।
वहीं, तृणमूल कांग्रेस की सांसद जून मालिया ने कहा कि इस बिल का सबसे खतरनाक प्रावधान 'स्वयं-पहचान' (सेल्फ-आइडेंटिफिकेशन) का अधिकार छीनना है। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि यह बिल प्रगति नहीं ला रहा, बल्कि समुदाय के अधिकार छीन रहा है।
एनसीपी (शरद पवार गुट) की बारामती से सांसद सुप्रिया सुले ने संसद में इस बिल को लाए जाने की जल्दबाजी पर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि इस बिल को लेकर कोई जल्दबाजी नहीं होनी चाहिए थी और सबसे अहम बात यह है कि समुदाय के लोगों से व्यापक स्तर पर विचार-विमर्श ही नहीं किया गया।
चर्चा का जवाब देते हुए मंत्री वीरेंद्र कुमार ने स्पष्ट किया कि ये प्रावधान उन लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए लाए गए हैं जिन्हें अपनी जैविक स्थिति के कारण बिना किसी गलती के गंभीर सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह कानून कानूनी अधिकारों के साथ-साथ सम्मान और गरिमा भी प्रदान करता है।
मंत्री ने आगे कहा कि सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि ट्रांसजेंडर लोग समानता के साथ जिएं और उन्हें वे सभी अधिकार मिलें जो दूसरों को मिलते हैं। उन्होंने पश्चिमी देशों से तुलना करते हुए कहा कि भारत इस दिशा में काफी तेजी से आगे बढ़ा है।
अपनी बात खत्म करते हुए वीरेंद्र कुमार ने कहा कि ये कदम समाज के हर उस वर्ग की मदद करने के हमारे व्यापक प्रयास का हिस्सा हैं जो पीछे छूट गए हैं, ताकि सभी को उनका उचित और गौरवपूर्ण स्थान मिल सके।
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