बेटियों के जन्म पर पेड़ लगाने वाले पिपलांत्री गांव में अब सरकारी स्कूलों का कायाकल्प, टॉयलेट्स के लिए ऑस्ट्रेलिया से 90 लाख रुपये मिलेंगे

इस पूरे अभियान में टॉयलेट वॉरियर के नाम से विख्यात आस्ट्रेलियन रोटेरियन मार्क बाला की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है।
पिपलांत्री का ‘इको-फेमिनिज्म’ मॉडल पहले से ही विश्वभर में चर्चित रहा है और अब ऑस्ट्रेलिया के रोटेरियन मार्क बाला का इस अभियान से जुड़ना यह दर्शाता है कि पिपलांत्री केवल एक गांव भर नहीं रह गया है, बल्कि यह एक वैश्विक केस स्टडी बन चुका है।
पिपलांत्री का ‘इको-फेमिनिज्म’ मॉडल पहले से ही विश्वभर में चर्चित रहा है और अब ऑस्ट्रेलिया के रोटेरियन मार्क बाला का इस अभियान से जुड़ना यह दर्शाता है कि पिपलांत्री केवल एक गांव भर नहीं रह गया है, बल्कि यह एक वैश्विक केस स्टडी बन चुका है।
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राजसमंद- राजस्थान के राजसमंद जिले के पिपलांत्री गांव से एक बार फिर प्रेरणादायक और सकारात्मक खबर सामने आई है। सामाजिक विकास, स्वच्छता और शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाते हुए इस गांव ने अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहल शुरू की है। ऑस्ट्रेलिया के प्रसिद्ध एक्टिविस्ट और एवीएन “टॉयलेट वॉरियर” मार्क बाला के नेतृत्व में ऑस्ट्रेलिया से फंडिंग का मार्ग प्रशस्त किया गया है, जिसके तहत पिपलांत्री के छह राजकीय विद्यालयों के नवीनीकरण और विकास कार्य किए जाएंगे।

26 मार्च को आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में “हैप्पी स्कूल – हैप्पी लर्निंग” अभियान के अंतर्गत इन विद्यालयों के विकास की घोषणा की गई। लगभग 90 लाख रुपये की लागत से होने वाले इन कार्यों में नए शौचालयों का निर्माण, भवनों की मरम्मत, पेंटिंग, वॉटरप्रूफिंग और आधुनिक फर्नीचर की व्यवस्था शामिल है। इस पूरे अभियान में ऑस्ट्रेलियन रोटेरियन मार्क बाला की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। उन्होंने एवीएन (ऑस्ट्रेलिया) के माध्यम से फंडिंग का रास्ता तैयार किया और इस स्थानीय पहल को वैश्विक स्तर पर मजबूती प्रदान की।

पिपलांत्री गांव पहले से ही दुनिया भर में अपनी अनोखी पिपलांत्री मॉडल के लिए प्रसिद्ध है। यहां हर बेटी के जन्म पर 111 पेड़ लगाए जाते हैं, जो पर्यावरण संरक्षण और बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ की भावना को मजबूत करते हैं।

यह इको-फेमिनिज्म का अनुपम उदाहरण है, जहां बेटियों के जन्म को खुशी के साथ पर्यावरण संवर्धन से जोड़ा जाता है। अभिभावक बेटी की 18 वर्ष की आयु तक शादी न करने और उसे शिक्षा पूरी करने का शपथ-पत्र भी देते हैं। इस मॉडल ने न केवल ग्रामीण भारत में लड़कियों की स्थिति में सुधार किया है, बल्कि विश्व स्तर पर पर्यावरण और महिला सशक्तिकरण का प्रेरणादायक केस स्टडी बन गया है। अब शिक्षा और स्वच्छता के क्षेत्र में यह नई पहल पिपलांत्री मॉडल को और व्यापक आयाम देगी।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में प्रज्ञा मेहता, विशिष्ट अतिथि के रूप में राजसमंद की विधायक दीप्ति किरण माहेश्वरी, निर्मल कुमावत तथा पद्मश्री डॉ. श्याम सुंदर पालीवाल सहित कई गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। पालीवाल, जिन्होंने पिपलांत्री मॉडल की नींव रखी, इस पहल में निरंतर मार्गदर्शन प्रदान कर रहे हैं।

प्रोजेक्ट का उद्घाटन करते हुए  मार्क बाला (L) और पद्मश्री डॉ. श्याम सुंदर पालीवाल (R)
प्रोजेक्ट का उद्घाटन करते हुए मार्क बाला (L) और पद्मश्री डॉ. श्याम सुंदर पालीवाल (R)

इस पहल के माध्यम से पिपलांत्री एक बार फिर साबित कर रहा है कि स्थानीय प्रयासों को यदि अंतरराष्ट्रीय सहयोग मिल जाए, तो ग्रामीण विकास के नए आयाम स्थापित किए जा सकते हैं। मार्क बाला की यह पहल न केवल पिपलांत्री के स्कूलों को बेहतर बनाने जा रही है, बल्कि पूरे ग्रामीण भारत के लिए शिक्षा और स्वच्छता का मॉडल प्रस्तुत कर रही है। स्वच्छ शौचालयों, सुंदर भवनों और आधुनिक सुविधाओं से युक्त स्कूल बच्चों की सीखने की क्षमता बढ़ाएंगे तथा नामांकन दर में भी इजाफा करेंगे।

विशेषज्ञों का मानना है कि पिपलांत्री का यह कदम अन्य पंचायतों के लिए भी एक रोडमैप साबित होगा। जहां ग्राम पंचायतें सरकारी योजनाओं पर निर्भर रहने के बजाय अपने स्तर पर नवाचार करके विश्व भर से संसाधन जुटा सकती हैं।

पिपलांत्री मॉडल अब केवल पर्यावरण और महिला सशक्तिकरण तक सीमित नहीं रहा है। शिक्षा, स्वच्छता और बुनियादी ढांचे के विकास के साथ यह गांव समग्र ग्रामीण विकास का प्रतीक बनता जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया से आई इस फंडिंग ने पिपलांत्री को वैश्विक पटल पर और मजबूती दी है। स्थानीय नेतृत्व और वैश्विक विजन के संगम से परिवर्तन की जो लहर उठ रही है, वह निश्चित रूप से आने वाले वर्षों में कई अन्य गांवों को प्रेरित करेगी।

पिपलांत्री ने एक बार फिर दिखा दिया है कि जब स्थानीय समुदाय की मेहनत के साथ अंतरराष्ट्रीय सहयोग जुड़ता है, तो सकारात्मक बदलाव कितने प्रभावशाली हो सकते हैं। “हैप्पी स्कूल – हैप्पी लर्निंग” अभियान न केवल बच्चों के भविष्य को उज्ज्वल बनाएगा, बल्कि पूरे क्षेत्र में शिक्षा और स्वच्छता की नई संस्कृति को बढ़ावा देगा।

पिपलांत्री का ‘इको-फेमिनिज्म’ मॉडल पहले से ही विश्वभर में चर्चित रहा है और अब ऑस्ट्रेलिया के रोटेरियन मार्क बाला का इस अभियान से जुड़ना यह दर्शाता है कि पिपलांत्री केवल एक गांव भर नहीं रह गया है, बल्कि यह एक वैश्विक केस स्टडी बन चुका है।
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पिपलांत्री का ‘इको-फेमिनिज्म’ मॉडल पहले से ही विश्वभर में चर्चित रहा है और अब ऑस्ट्रेलिया के रोटेरियन मार्क बाला का इस अभियान से जुड़ना यह दर्शाता है कि पिपलांत्री केवल एक गांव भर नहीं रह गया है, बल्कि यह एक वैश्विक केस स्टडी बन चुका है।
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