
छह साल की उम्र में अधिकतर बच्चे क्या कर पाते हैं- पोएम्स रटना, गिनती और टेबल्स बोलना या पहाड़-झरने का चित्र बना सकते हैं , लेकिन मुंबई की अवंती इस रूढ़ि से अलग है। उसकी जिज्ञासा बचपने की एक नई परिभाषा गढ़ती है।
यह चंचल बच्ची न केवल पेड़ों पर चढ़ने में माहिर है, बल्कि एक्वेरियम के इको सिस्टम को भी समझती है। वह फल सब्जियों को चार्ट्स से नहीं समझती बल्कि अपने पापा के साथ मार्केट में जाकर उनकी पहचान करती है। वह दुनिया को अपने नजरों से देखती है, शायद यही वजह है कि अगर आप उसकी ड्राइंग बुक में देखेंगे तो आपको साइकिल का चित्र साइड एंगल से नहीं दिखेगा बल्कि ऐसा चित्र होगा जो साइकिल चलाते हुए एक व्यक्ति के दृष्टिकोण से बना हो।
अवंती ने कभी स्कूल नहीं देखा। उसकी पढ़ाई का स्कूल उसका अपना परिवेश है। विज्ञान वह प्रकृति की लय से सीखती है, भाषा उसके पसंदीदा कार्टूनों से, और सामाजिकता पड़ोस के दोस्तों के साथ खेलकूद से-- उसकी माँ रितु, जो स्वयं गणित की शिक्षिका हैं, कहती हैं कि आवंती बड़ों-छोटों सभी से आसानी से घुल-मिल जाती है और उसके पड़ोस में कई दोस्त हैं।
फिर इस मेधावी बच्ची को औपचारिक स्कूल से दूर रखने का निर्णय क्यों? इसका कारण हैं उसके माता-पिता – विवेक सकपाल और रितु। कंप्यूटर इंजीनियर से पब्लिशर बने विवेक स्कूली शिक्षा के पैरोकार नहीं हैं। उनका मानना है कि स्कूल ‘सीखने’ का नहीं, बल्कि ‘पढ़ाई’ का एक औपचारिक ढर्रा है। वे कहते हैं, “स्कूल जाना एक नया चलन है, जो महज दो-तीन सौ साल पुराना ही है। लेकिन उससे सैकड़ों साल पहले भी तो हम बांध, रोड और पुल बनाते थे। असली शिक्षा तो चार दीवारों से परे ही मिलती है।”
मुंबई में रहने वाले विवेक पूरे भारत में फैले होमस्कूलिंग समुदाय से जुड़े हैं, जहाँ ऐसे हज़ारों परिवार हैं। देश में करीब दस हज़ार ऐसे परिवार हैं जो अपने बच्चों को घर आधारित शिक्षा दे रहे हैं और विवेक स्वयं करीब 200-300 ऐसे परिवारों से संपर्क में हैं लेकिन उन्होंने एक खास कमी नोट की है, “ज़्यादातर परिवार प्रभावशाली सामाजिक-आर्थिक वर्गों से हैं। आंबेडकरवादी या बहुजन पृष्ठभूमि के परिवार इसमें नहीं दिखते।” एक आंबेडकरवादी होने के नाते, विवेक इस खाई को पाटने के लिए ऐसे ही और परिवारों को जोड़ने में जुटे हैं।
विवेक का स्कूली व्यवस्था पर प्रहार स्पष्ट है। वे कहते हैं, “मैं यह नहीं कहता कि लोग बच्चों को स्कूल न भेजें। लेकिन मेरा दृढ़ विश्वास है कि पढ़ना-लिखना सिखाना कोई बड़ी बात नहीं, यह कोई भी परिवार कर सकता है। असली सवाल यह है कि स्कूल आखिर करता क्या है? और क्या नहीं कर पाता?”
उनके अनुसार, स्कूल सत्ता के अनुरूप बनाए गए पाठ्यक्रम का ज्ञान थोपते हैं। वे उदाहरण देते हैं, “पाठ्यक्रम से गोडसे का नाम हटा दिया गया, तो बच्चे गांधीजी के बारे में तो पढ़ेंगे, पर उनकी हत्या किसने और क्यों की, यह नहीं जान पाएंगे। इसी तरह, वे आंबेडकर के बारे में जानेंगे, लेकिन यह नहीं जानेंगे कि उन्होंने बौद्ध धर्म क्यों और कब अपनाया।”
अवंती के जन्म के बाद ही विवेक ने इस वैकल्पिक रास्ते पर चलने का फैसला किया। उनके शोध ने उन्हें इस निष्कर्ष पर पहुँचाया कि स्कूल बच्चे की सहज जिज्ञासा को दबा देते हैं। उनका तर्क है, “स्कूलों की शुरुआत ही एक खास उद्देश्य से हुई थी – कारखानों के लिए अनुशासित कर्मचारी तैयार करना। सीखना तो छात्र के स्वभाव और रुचि से होना चाहिए। रोज़मर्रा के जीवन में पाइथागोरस प्रमेय किस काम आती है? असली शिक्षा तो व्यावहारिक ज्ञान है।”
वे एक वाकया साझा करते हैं, “एक बार ट्रेन में अवंती ने पूछा कि पटरियों के नीचे छोटे-छोटे पत्थर क्यों बिछे होते हैं। स्कूल ऐसे सवाल पूछने की जिज्ञासा ही खत्म कर देते हैं।”
शिक्षकों के सम्मान और गुणवत्ता में गिरावट भी उनकी चिंता का एक बड़ा कारण है। वे व्यंग्य करते हुए कहते हैं, “ क्वालिटी ऑफ़ स्कूल तो सुधरा है लेकिन क्वालिटी ऑफ़ एजुकेशन गिर चूका है, स्कूलों में एसी और डिजिटल क्लासरूम तो आ गए हैं, पर अच्छे शिक्षक कहाँ हैं? ज़्यादातर शिक्षक वे होते हैं जो अपने स्कूली दिनों में औसत या उससे नीचे रहे होते हैं। फिर वे बच्चों से हर विषय में श्रेष्ठता की उम्मीद कैसे रख सकते हैं? अगर शिक्षकों को सम्मानजनक वेतन मिले, तो शायद शिक्षा का स्तर सुधरे।”
स्वयं एक नामी स्कूल में पढ़ा चुकी रितु भी अपने पति की इस बात से सहमत हैं। उन्हें वहाँ की शिक्षा-पद्धति देखकर यह विश्वास हो गया था कि वे अपनी बेटी को वैसा माहौल नहीं देना चाहतीं।
क्या अवंती को दोस्तों और स्कूली माहौल- खेलकूद की कमी खलती है? रितु मुस्कुराते हुए कहती हैं, “बिल्कुल नहीं। उसके पड़ोस में कई दोस्त हैं। कभी-कभार उसके स्कूल न जाने पर दूसरे बच्चे टोकते भी हैं, तो वह बड़ी सहजता से कह देती है कि उसकी पढ़ाई घर से ही होती है।” रितु भी अवन्ती को सीखाने के लिए रोचक तरीके अपनाती है, मसलन अवन्ती को जोड़ना और घटाना सीखाने के लिए गाड़ियों के नंबर प्लेट से बेहतर क्या तरीका हो सकता है? रितु कहती हैं, " मैं अवंती को कहती हूँ अमुक नंबर प्लेट में जो अंक है उनको जोड़ो या घटाओ- वह खेल खेल में यह कर लेती है।"
क्या भारत में घर पर पढ़ाना (होमस्कूलिंग) कानूनी है? विवेक एक सवाल का सीधा जवाब देते हैं, वे पूरे विश्वास के साथ कहते हैं,"हां, बिल्कुल कानूनी है। शिक्षा के अधिकार (आरटीई) और नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) में, दोनों में ही इसकी इजाजत है।"
वे आगे बताते हैं कि घर पर पढ़ने वाले बच्चे बाद में मान्यता प्राप्त डिग्री कैसे ले सकते हैं। "जब बच्चा दसवीं कक्षा के स्तर तक पहुंच जाए, तो वह तीन रास्तों से परीक्षा दे सकता है: कैम्ब्रिज इंटरनेशनल बोर्ड, महाराष्ट्र सरकार का बोर्ड, या फिर एनआईओएस (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग)। इनमें से किसी से भी वह परीक्षा पास करके सरकारी मान्यता वाली सर्टिफिकेट हासिल कर सकता है।"
अवंती के भविष्य को लेकर उनकी योजना बहुत साफ और सीधी है। वे उसे कम से कम दसवीं कक्षा तक किसी रेगुलर स्कूल में नहीं भेजेंगे। विवेक कहते हैं, "जब अवंती बड़ी हो जाएगी और खुद समझदारी से फैसला ले सकेगी, तब उसे पूरी आजादी होगी कि वह आगे की पढ़ाई कैसे और कहाँ से करना चाहती है।" उनका मकसद बच्ची पर अपनी मर्जी थोपना नहीं, बल्कि उसे अपनी पसंद का रास्ता चुनने की आजादी देना है।
ऑनलाइन स्कूलिंग को भी विवेक एक सतही बदलाव मानते हैं, जहाँ सिर्फ जगह बदलती है, पाठ्यक्रम का ढाँचा नहीं। उनके लिए अवंती का पूरा परिवेश ही उसकी कक्षा है। रितु बताती हैं, “विवेक उसे बाज़ार ले जाते हैं, मिस्त्री के पास ले जाते हैं। वहाँ वह सवाल पूछती है और चीज़ें अपने ढंग से सीखती रहती है, बिना यह जाने कि वह ‘पढ़ाई’ ही कर रही है।”
क्या यह राह आंबेडकर के ‘शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो’ के सिद्धांत से भटकाव है? विवेक इससे इनकार करते हैं। उनका कहना है कि बाबासाहेब का आशय महज किताबी पढ़ाई से नहीं था। विवेक वर्तमान व्यवस्था को पक्षपातपूर्ण मानते हैं। "शिक्षा का वर्तमान पैटर्न एक विशेष समुदाय के अनुकूल बनाया गया है। यह समुदाय एक चीज में अच्छा है: रटो और बोलो। वे कुछ और नहीं जानते, इसलिए उन्होंने एक ऐसी व्यवस्था बनाई जो उनके अनुकूल हो। उनकी एक परीक्षा होती है; मुझे उस व्यवस्था में घुसना होगा, उसे पास करना होगा, और फिर योग्यता के लिए लड़ना होगा।"
वह एक निष्पक्ष योग्यता-आधारित व्यवस्था की कल्पना करते हैं: "अगर मिट्टी के बर्तन बनाने के 50 अंक, मछली पकड़ने के 50 अंक, चमड़े से उत्पाद बनाने के 50 अंक होते - तो देखते हैं कि वे तब कितने कुशल हैं। केवल तभी हमें पता चलेगा कि योग्यता किसे मिलनी चाहिए। जब आरक्षण का पैटर्न बदलेगा, तो योग्यता का पैटर्न बदल जाएगा।" वे जोर देकर कहते हैं कि पारंपरिक कौशल में स्वाभाविक रूप से विज्ञान और गणित समाहित होते हैं। "खेती में विज्ञान है; मछली पकड़ने और मशीनरी में गणित है। सीखने के प्राकृतिक तरीके हैं - स्कूली शिक्षा ही एकमात्र स्रोत नहीं है।"
विवेक मानते हैं कि पारंपरिक कौशलों में भी विज्ञान और गणित का गहरा ज्ञान छिपा है। उनका अफसोस है कि होमस्कूलिंग का चलन अभी भी मुख्य रूप से कथित उच्च वर्गों विशेषकर व्यवसायिक समुदायों तक सीमित है, जो अक्सर अपने बच्चों को समाज के अन्य वर्गों से अलग-थलग रखना चाहते हैं। वे इस भय से होम स्कूलिंग को प्रोत्साहित कर रहे हैं क्योंकि वे नहीं चाहते उनके बच्चे अन्य समुदायों से अपने लिए लाइफ पार्टनर का चयन करें।
एक प्रकाशक के तौर पर वे भविष्य को लेकर चिंतित भी हैं। उनका कहना है कि वर्तमान सरकारी पाठ्यपुस्तकों से वास्तविक इतिहास और संस्कृति को धीरे-धीरे मिटाया जा रहा है। "वर्तमान पीढ़ी ने एक निष्पक्ष सेटअप में शिक्षा हासिल की, समाज को उस नजरिये से देखा, पढ़ा और शिक्षा पाई है। लेकिन वर्तमान शासन द्वारा पाठ्यपुस्तकों से धीरे-धीरे वास्तविक इतिहास और संस्कृति को मिटाया जा रहा है, कोई नहीं जानता कि 10 साल में पाठ्यपुस्तकें कैसी दिखेंगी।" विवेक एक ऐसा पाठ्यक्रम बनाने पर जोर देते हैं जो "राष्ट्र के वास्तविक इतिहास और संस्कृति को संरक्षित करे। वह कहते हैं यह सही समय है - हम अभी कर सकते हैं; अन्यथा, अब से एक दशक बाद, हम लड़ने की स्थिति में भी नहीं होंगे क्योंकि नई पीढ़ी ने वास्तविक इतिहास नहीं पढ़ा होगा।" इसी आशा के साथ विवेक समान विचार वाले अम्बेडकरवादी परिवारों की तलाश में हैं ताकि एक मजबूत फिलोसोफिकल आदार वाला नेटवर्क तैयार हो सके।
रितु के लिए, सबसे बड़ी खुशी आवंती के स्वाभाविक और प्रसन्नचित्त विकास में है। वे हँसते हुए कहती हैं, “एकमात्र ‘समस्या’ यह है कि उसकी कोई नियमित दिनचर्या नहीं है। वह सुबह जब मन करे उठती है। पढ़ने का कोई निर्धारित समय नहीं। रात के समय वह अक्सर गहन सवाल पूछने लगती है। मैं उसे कागज-कलम तभी देती हूँ जब वह माँगती है। उसके लिए सीखना और जीना एक ही हैं।” अवंती की कहानी एक सवाल खड़ा करती है: क्या ज्ञान की तलाश में, हम बच्चों के लिए पिंजरे बनाते हैं, या फिर उनके उड़ान भरने के लिए पंख?
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