
नई दिल्ली- सुप्रीम कोर्ट ने 30 जनवरी को एक बहुत महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाते हुए मासिक धर्म स्वास्थ्य (Menstrual Health) को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार और अनुच्छेद 21A के तहत शिक्षा के अधिकार का अभिन्न अंग घोषित कर दिया है। जस्टिस जे.बी. परदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने डॉ. जया ठाकुर बनाम भारत सरकार मामले में 126 पेज का विस्तृत फैसला दिया, जिसमें कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि मासिक धर्म यानी पीरियड्स के कारण लड़कियों की स्कूल से अनुपस्थिति या पूरी तरह पढ़ाई छोड़ देना संविधान के खिलाफ है। कोर्ट ने कहा, “एक पीरियड वाक्य को खत्म करता है – लड़की की पढ़ाई को नहीं।”
फैसले में कोर्ट ने माना कि मासिक धर्म प्रबंधन (MHM) की कमी से लड़कियां स्कूल नहीं जा पातीं, जिससे उनकी गरिमा, गोपनीयता, शारीरिक स्वायत्तता और प्रजनन स्वास्थ्य का हनन होता है। यह स्थिति अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15(3) (महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष प्रावधान), अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) और अनुच्छेद 21A (शिक्षा का अधिकार) का स्पष्ट उल्लंघन है। कोर्ट ने कहा कि गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार तभी संभव है जब लड़कियां मासिक धर्म के दौरान बिना शर्मिंदगी, डर या असुविधा के स्कूल जा सकें।
कोर्ट ने RTE एक्ट (2009) की धारा 3 और 19 का भी विश्लेषण किया और स्पष्ट किया कि “मुफ्त शिक्षा” का मतलब केवल स्कूल फीस नहीं, बल्कि मासिक धर्म प्रबंधन से जुड़े सभी खर्च और सुविधाएं भी शामिल हैं। अगर लड़कियों को सेनेटरी नैपकिन नहीं मिलतीं या स्कूल में अलग, साफ-सुथरे शौचालय नहीं हैं, तो यह RTE एक्ट का उल्लंघन है। कोर्ट ने कहा कि स्कूलों में “बैरियर-फ्री एक्सेस” का मतलब सिर्फ भवन तक पहुंच नहीं, बल्कि ऐसी सभी बाधाओं का निवारण है जो बच्चे को नियमित रूप से स्कूल आने-जाने से रोकती हैं।
इस फैसले के तहत सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को तीन महीने के अंदर निम्नलिखित सुविधाएं अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराने के सख्त निर्देश दिए हैं:
हर स्कूल (सरकारी हो या निजी) में लड़के-लड़कियों के लिए अलग-अलग, पूरी तरह कार्यात्मक (functional) टॉयलेट्स होने चाहिए, जिनमें पानी की सुविधा, साबुन और गोपनीयता हो। विशेष रूप से दिव्यांग बच्चों के लिए भी शौचालय सुलभ होने चाहिए। हर स्कूल में ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सेनेटरी नैपकिन (ASTM D-6954 स्टैंडर्ड वाली) मुफ्त उपलब्ध कराई जाएंगी, आदर्श रूप से वेंडिंग मशीन के जरिए। अगर मशीन लगाना तुरंत संभव न हो तो स्कूल में एक निर्धारित स्थान या व्यक्ति के पास ये नैपकिन रखी जाएंगी।
हर स्कूल में “MHM कॉर्नर” बनाया जाएगा, जहां स्पेयर अंडरगारमेंट, स्पेयर यूनिफॉर्म, डिस्पोजेबल बैग और अन्य जरूरी सामग्री रखी जाएगी ताकि मासिक धर्म के दौरान आने वाली किसी भी आपात स्थिति से निपटा जा सके। सेनेटरी नैपकिन के सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल निपटान की व्यवस्था हर स्कूल में होनी चाहिए, जो Solid Waste Management Rules के अनुरूप हो।
कोर्ट ने जागरूकता और शिक्षा पर बहुत जोर दिया। NCERT और SCERT को निर्देश दिए गए हैं कि पाठ्यक्रम में मासिक धर्म, प्यूबर्टी, PCOS/PCOD जैसी समस्याओं को शामिल किया जाए ताकि लड़कियों में इससे जुड़ी शर्म और मिथकों को खत्म किया जा सके। सभी शिक्षकों (पुरुष और महिला दोनों) को मासिक धर्म स्वास्थ्य पर संवेदनशीलता और सहायता देने का प्रशिक्षण अनिवार्य होगा। कोर्ट ने खास तौर पर कहा कि लड़कों को भी पढ़ाना जरूरी है कि मासिक धर्म एक सामान्य जैविक प्रक्रिया है, ताकि वे अपनी सहपाठिनियों के प्रति सहानुभूति और सम्मान दिखा सकें।
निगरानी के लिए जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) को हर साल स्कूलों का निरीक्षण करने और छात्राओं से गुमनाम फीडबैक (सर्वे) लेने का आदेश दिया गया है। NCPCR और SCPCR को पूरे देश में इस फैसले के क्रियान्वयन की निगरानी करने का जिम्मा सौंपा गया है। गैर-अनुपालन पर RTE एक्ट की धारा 18 के तहत स्कूल की मान्यता रद्द करने तक की कार्रवाई हो सकेगी।
कोर्ट ने अंत में भावुक अपील करते हुए कहा कि यह फैसला सिर्फ कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि हर उस लड़की के लिए है जो मासिक धर्म के कारण स्कूल छोड़ने को मजबूर हुई। कोर्ट ने कहा, “गलती तुम्हारी नहीं है। अब बदलाव शुरू हो चुका है।” यह मामला अब भी “पार्ट-हर्ड” है। तीन महीने बाद सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से अनुपालन रिपोर्ट मांगी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को सभी हाईकोर्ट्स, राज्य सरकारों, शिक्षा, स्वास्थ्य, जल शक्ति और महिला-बाल विकास मंत्रालयों तक पहुंचाने के निर्देश दिए हैं।
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