माहवारी के दिनों में शिक्षा से दूरी: ओडिशा में प्राइवेसी और बुनियादी सुविधाओं के अभाव में 74% छात्राएं कक्षाएं छोड़ने को मजबूर

एक नई रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा: स्कूलों में पैड डिस्पोजल, पानी, साबुन और प्राइवेसी जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण ओडिशा में 74 प्रतिशत छात्राएं हर महीने अपनी पढ़ाई का नुकसान सहने को मजबूर हैं।
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माहवारी (पीरियड्स)[सांकेतिक तस्वीर]
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ओडिशा में माहवारी (पीरियड्स) के दौरान छात्राओं का स्कूल न जाना आज भी एक गंभीर समस्या बनी हुई है। हाल ही में माहवारी स्वास्थ्य पर जारी एक विस्तृत अध्ययन के अनुसार, राज्य की लगभग 74 प्रतिशत छात्राएं अपने हर मासिक चक्र के दौरान एक से आठ दिनों तक स्कूल की कक्षाओं से अनुपस्थित रहने को मजबूर हैं।

इस महत्वपूर्ण रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि स्कूल न जा पाने का प्राथमिक कारण पीरियड्स के दौरान होने वाला शारीरिक दर्द और परेशानी है। इसके साथ ही स्कूलों में प्राइवेसी का अभाव, अपर्याप्त सुविधाएं और माहवारी से जुड़ी सामाजिक धारणाएं लड़कियों की निर्बाध शिक्षा में बड़ी बाधा बन रही हैं।

यह व्यापक सर्वेक्षण 28 अप्रैल से 25 मई के बीच किया गया था। स्थिति का सही आकलन करने के लिए शैक्षणिक संस्थानों के लिए 14 जिलों और सार्वजनिक संस्थानों के लिए 8 जिलों को इसमें शामिल किया गया। इस अध्ययन ने राज्य में मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन, सैनिटेशन इंफ्रास्ट्रक्चर, जागरूकता और संस्थागत सहायता प्रणालियों में मौजूद भारी कमियों को स्पष्ट रूप से उजागर किया है।

ओडिशा के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में किए गए इस सर्वे में कुल 177 उत्तरदाताओं को शामिल किया गया, जिनमें 121 स्कूल और 56 सार्वजनिक संस्थान थे। इस अहम अध्ययन को यूनिसेफ, आईना, वॉटरएड, एम्स भुवनेश्वर और आईआईटी भुवनेश्वर जैसे प्रतिष्ठित संगठनों के एक समूह द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया था।

आंकड़ों के मुताबिक, सर्वेक्षण में शामिल 94 प्रतिशत स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय तो उपलब्ध थे, लेकिन वहां बुनियादी मासिक धर्म स्वच्छता सुविधाओं, पानी और साबुन की भारी कमी पाई गई। इसके अलावा यह चिंताजनक तथ्य भी सामने आया कि लगभग 56 प्रतिशत स्कूलों में या तो माहवारी कचरे (सैनिटरी पैड आदि) के निपटान की कोई उचित व्यवस्था ही नहीं थी, या फिर इसके लिए असुरक्षित तरीके अपनाए जा रहे थे, जो सीधे तौर पर पर्यावरण और जनस्वास्थ्य के लिए खतरा है।

स्कूली स्तर पर स्वास्थ्य कर्मियों की कमी इस स्थिति को और भी चुनौतीपूर्ण बना देती है। रिपोर्ट बताती है कि केवल 27 प्रतिशत स्कूलों में ही कोई नर्स या स्वास्थ्य कार्यकर्ता मौजूद है। वहीं, महज 44 प्रतिशत स्कूलों ने अपने यहां प्राथमिक उपचार (फर्स्ट एड) किट उपलब्ध होने की पुष्टि की है।

दूसरी ओर, पिछले तीन वर्षों के दौरान राज्य की राजधानी भुवनेश्वर में सार्वजनिक स्थानों का भी बारीकी से ऑडिट किया गया है। यह असेसमेंट 800 से अधिक युवाओं के इनपुट के साथ वैश्विक गैर-लाभकारी संस्था 'डब्ल्यूआरआई इंडिया' द्वारा विकसित 'पब्लिक स्पेस असेसमेंट फ्रेमवर्क' का उपयोग करके किशोरों द्वारा ही किया गया है।

डब्ल्यूआरआई इंडिया के अर्बन डेवलपमेंट (सस्टेनेबल सिटीज एंड ट्रांसपोर्ट) के प्रोग्राम एसोसिएट मुक्ति स्वरूप प्रधान ने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि सार्वजनिक स्थानों पर भी सबसे बड़ी समस्या समावेशी और 'पीरियड-फ्रेंडली' शौचालयों की कमी है।

उन्होंने बताया कि तीन साल की फील्ड रिसर्च के आधार पर 'सेफ, वाइब्रेंट और हेल्दी पब्लिक स्पेस प्रोजेक्ट' के तहत भुवनेश्वर की तीन प्रमुख और अधिक भीड़भाड़ वाली जगहों पर समावेशी शौचालयों का एक बेहतरीन मॉडल पेश करने की योजना है।

इस नई पहल का नेतृत्व 'आईना' के किशोर चैंपियन करेंगे। इसका मुख्य उद्देश्य शहर की एजेंसियों को सहयोग प्रदान करना और महिलाओं, लड़कियों व दिव्यांग व्यक्तियों के लिए सुलभ स्वच्छता ढांचे के प्रति जागरूकता बढ़ाना है, ताकि हर किसी को सार्वजनिक स्थानों पर गरिमा, स्वच्छता और आराम मिल सके।

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