उदयपुर की आदिवासी महिलाएं 4 घंटे इंटरनेट का क्यों करती रहीं इंतजार? वृंदा करात का मनरेगा बंदी को लेकर केंद्रीय मंत्री शिवराज को खत!

'विकसित भारत- रोज़गार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, 2025' यानी VB-G RAM G एक्ट 1 जुलाई से लागू होगा
वृंदा करात ने कहा कि मनरेगा का खत्म होना गाँव के गरीबों के लिए बहुत बुरा साबित हुआ है।
वृंदा करात ने कहा कि मनरेगा का खत्म होना गाँव के गरीबों के लिए बहुत बुरा साबित हुआ है।एआई निर्मित चित्र
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नई दिल्ली/उदयपुर-  भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की वरिष्ठ नेता और राज्यसभा की पूर्व सदस्य वृंदा करात ने केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान को एक पत्र लिखकर विकसित भारत – रोज़गार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) एक्ट (वीबी-ग्रामजी एक्ट) के नियमों को लेकर गंभीर आपत्तियां जताई हैं। यह पत्र नए कानून के लागू होने से एक दिन पहले लिखा गया है, जिसमें उन्होंने ग्रामीण मजदूरों की वास्तविक समस्याओं का हवाला देते हुए नियमों को तत्काल वापस लेने और मनरेगा को बहाल रखने की मांग की है।

करात ने अपने पत्र की शुरुआत राजस्थान के उदयपुर जिले के आदिवासी गाँव बारापाला का जिक्र करते हुए की, जहाँ उन्होंने एक दिन पहले मनरेगा कार्यस्थल पर मजदूरों से बातचीत की थी। उन्होंने बताया कि गर्मी के मौसम में सुबह 6:30 बजे से 10 बजे तक करीब चार घंटे तक कई महिला मजदूर ऑनलाइन उपस्थिति साइट के खुलने का इंतजार करती रहीं, लेकिन इंटरनेट कनेक्शन न मिल पाने के कारण उस दिन काम नहीं हो सका। यह स्थिति आम बात बताई गई।

उन्होंने बताया कि पिछले साल दिसंबर में मनरेगा खत्म होने के बाद इन मजदूरों को जनवरी से जून तक मात्र 18 दिन का ही काम मिला है, हालांकि संसद को आश्वासन दिया गया था कि नया कानून लागू होने तक काम जारी रहेगा। विशेष तौर पर, कम से कम 12 बुजुर्ग महिलाओं ने शिकायत की कि बायोमेट्रिक चेहरा पहचान तकनीक उनकी आँखों को पहचान नहीं पा रही थी, जिसके चलते उन्हें काम से बाहर कर दिया गया। करात ने कहा कि मनरेगा का खत्म होना गाँव के गरीबों के लिए बहुत बुरा साबित हुआ है।

गर्मी के मौसम में सुबह 6:30 बजे से 10 बजे तक करीब चार घंटे तक कई महिला मजदूर ऑनलाइन उपस्थिति साइट के खुलने का इंतजार करती रहीं, लेकिन इंटरनेट कनेक्शन न मिल पाने के कारण उस दिन काम नहीं हो सका। यह स्थिति राजस्थान के आदिवासी इलाकों में आम है।

इन्हीं वास्तविक समस्याओं के मद्देनजर करात ने केंद्रीय मंत्री से कहा कि उनके मंत्रालय ने 22 मई को बिना ग्रामीण और मनरेगा मजदूरों के संगठनों व यूनियनों से कोई सलाह-मशविरा किए वीबी-ग्रामजी एक्ट के आठ नियम प्रकाशित किए। यदि उनसे सलाह ली गई होती तो वास्तविक समस्याओं का समाधान किया जा सकता था, लेकिन नए नियम तो कानून से भी अधिक दोषपूर्ण हैं और मजदूरों की आवाज को पूरी तरह नजरअंदाज करते हैं।

पत्र में करात ने सबसे पहले संवैधानिक सवाल उठाया है कि क्या ये नियम संविधान के अनुच्छेद 258 का उल्लंघन करते हैं, जो राज्यों को 'ड्यूटी प्रदान करने या लगाने' से संबंधित है। उनके अनुसार, वीबी-ग्रामजी कानून न केवल राज्य सरकारों पर आर्थिक बोझ डालता है, बल्कि बिना उनकी सहमति के जिम्मेदारियाँ भी थोपता है। जबकि अनुच्छेद 258(3) के तहत केंद्र सरकार को राज्य को अतिरिक्त खर्च की भरपाई करनी चाहिए, नए नियम राज्यों को निर्णय लेने में किसी भी भूमिका से वंचित कर देते हैं, जो संघीय ढाँचे पर सीधा हमला है।

केरल ने साल में औसतन 66 दिन काम दिया, जो राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है, लेकिन कम आबादी के कारण उसे कम फंड मिलेगा। इसी तरह तमिलनाडु, जो उच्च जीएसडीपी वाला राज्य होने के बावजूद सबसे अधिक सक्रिय मनरेगा मजदूरों वाला राज्य है, को भी कम फंड आवंटित होंगे।

करात ने आवंटन के मानदंडों (नियम 396 ई) को भी बेहद आपत्तिजनक बताया। उन्होंने कहा कि कानून पहले से ही मांग के आधार पर काम देने की जगह फंड आवंटन पर निर्भर करता है, लेकिन नियम 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर आवंटन तय करते हैं, जिसमें प्रति व्यक्ति सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) को 42.5 प्रतिशत भारांश दिया गया है और आबादी को 17.5 प्रतिशत। उन्होंने कहा कि इन मानदंडों का काम मांगने वाले ग्रामीण मजदूरों से कोई लेना-देना नहीं है।

उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि केरल ने साल में औसतन 66 दिन काम दिया, जो राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है, लेकिन कम आबादी के कारण उसे कम फंड मिलेगा। इसी तरह तमिलनाडु, जो उच्च जीएसडीपी वाला राज्य होने के बावजूद सबसे अधिक सक्रिय मनरेगा मजदूरों वाला राज्य है, को भी कम फंड आवंटित होंगे। करात ने इसे भेदभावपूर्ण बताते हुए तत्काल पुनर्विचार की मांग की है।

इसके अलावा, 'अतिरिक्त व्यय' (नियम 403ई) को करात ने राज्य सरकारों के अपमान के रूप में देखा। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार अपने फंड से काम के विस्तार और नवाचार पर खर्च करना चाहती है, लेकिन नियम उसे केंद्रीय वित्तीय निगरानी से बाँध देते हैं। उन्होंने तीखा सवाल किया कि क्या काम का अधिकार केंद्र सरकार द्वारा तय की गई राज्य सरकारों की दक्षता या अक्षमता का बंधक बना दिया जाएगा?

मजदूरी के भुगतान और श्रमिकों की पहचान (नियम 397ई और 402ई) को लेकर करात ने कहा कि नियम मजदूरी दरों के वास्तविक निर्धारण, मजदूरी में वृद्धि की समयसीमा या मूल्य सूचकांक से जुड़ाव जैसे जरूरी मुद्दों पर पूरी तरह मौन हैं। उन्होंने कहा कि ऑनलाइन पंजीकरण और उपस्थिति पर अत्यधिक जोर ग्रामीण हकीकत से कोसों दूर है। अच्छे इंटरनेट होने पर भी पंजीकरण में 1-3 घंटे लग सकते हैं, क्या यह समय मजदूरी में शामिल किया जाएगा?

उन्होंने सवाल किया कि अधिकारियों की बेईमानी की सजा मजदूरों को क्यों मिले? करात ने कहा कि तकनीक के इस्तेमाल का यह तरीका अभिजात्यवादी सोच पर आधारित है, जबकि लाखों मनरेगा मजदूरों का अनुभव बताता है कि यह सोच गलत है। उन्होंने चेताया कि उत्पादकता के मनमाने और ऊँचे मानदंडों के कारण मजदूरों के लिए न्यूनतम मजदूरी कमाना भी असंभव हो सकता है, इसलिए नियमों में समय-उपयोग सर्वेक्षण का प्रावधान होना चाहिए। यह विशेष रूप से महिला मजदूरों के लिए और भी जरूरी है, क्योंकि इन कार्यस्थलों पर अधिकतर महिलाएँ ही काम करती हैं।

करात ने नेशनल लेवल स्टीयरिंग कमेटी (एनएलएससी) के गठन (नियम 397ई) को भी नौकरशाही का जाल बताया। उन्होंने कहा कि इस समिति में राज्यों का न्यूनतम प्रतिनिधित्व (सिर्फ पाँच सदस्य) है और मजदूरों या किसी हितधारक का कोई स्थान नहीं है। जबकि 50 प्रतिशत से अधिक महिलाएँ, 18 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति और 17 प्रतिशत अनुसूचित जाति के मजदूर हैं, उनके मंत्रालयों को इस समिति से बाहर रखा गया है। राज्य 40 प्रतिशत लागत वहन कर रहे हैं, लेकिन केवल पाँच सदस्यों के साथ उनके साथ अन्याय हुआ है, मानो केंद्र कह रहा हो, 'लागत साझा करो, लेकिन फैसले हमारे होंगे।' सेंट्रल काउंसिल की कोई बाध्यकारी शक्ति नहीं है और सामाजिक ऑडिट के लिए कोई स्वतंत्र प्राधिकरण नहीं बनाया गया है, जो पारदर्शिता और भ्रष्टाचार नियंत्रण के लिए जरूरी है।

अंत में करात ने कहा कि ये नियम पूरी तरह ऊपर से थोपे गए, नौकरशाही-प्रधान हैं और पंचायतों के अधिकारों को भी नकारते हैं। उन्होंने माँग की कि सभी आठों नियमों को तुरंत वापस लिया जाए और मनरेगा को यथावत बहाल रखा जाए। उन्होंने चेतावनी दी कि जैसा कि योजना बनाई गई थी, 1 जुलाई को मनरेगा को रद्द करना देश के गाँवों के मेहनतकश लोगों पर सबसे बड़ा हमला होगा।

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