MP के इंदौर हाईकोर्ट का फैसला: शादी के बाद दूसरे राज्य से आकर बसने वाली महिलाओं को आरक्षण से वंचित नहीं किया जा सकता, जानिए क्या है मामला?

यह निर्णय संविधान के उन मूल सिद्धांतों की याद दिलाता है, जिनमें- समानता का अधिकार, लैंगिक न्याय, और सामाजिक न्याय शामिल हैं।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट इंदौर.
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट इंदौर.इंटरनेट.
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भोपाल। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने आरक्षण से जुड़े एक महत्वपूर्ण और दूरगामी असर वाले मामले में महिलाओं के पक्ष में साफ और मजबूत रुख अपनाया है। अदालत ने कहा है कि जो महिलाएं शादी के बाद किसी दूसरे राज्य से मध्य प्रदेश आकर स्थायी रूप से निवास कर रही हैं, उन्हें केवल इस आधार पर आरक्षण का लाभ देने से इनकार नहीं किया जा सकता कि उनका जाति प्रमाण पत्र किसी दूसरे राज्य से जारी हुआ है, बशर्ते उनकी जाति या समुदाय दोनों राज्यों में एक ही आरक्षित श्रेणी में शामिल हो।

यह फैसला न सिर्फ हजारों महिला अभ्यर्थियों के लिए राहत लेकर आया है, बल्कि सरकारी भर्तियों में अपनाई जा रही कठोर और कई बार अनुचित प्रशासनिक व्याख्याओं पर भी सवाल खड़े करता है।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला उच्च माध्यमिक शिक्षक भर्ती से जुड़ा हुआ है। कुछ महिला अभ्यर्थियों ने मध्य प्रदेश में शिक्षक भर्ती के लिए आवेदन किया था। उन्होंने खुद को आरक्षित वर्ग जैसे अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) या अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के अंतर्गत दर्शाया था।

इन महिलाओं ने लिखित परीक्षा दी और उसमें सफलता भी हासिल की। यानी वे मेरिट में चयन के योग्य थीं। लेकिन जब दस्तावेज सत्यापन का समय आया, तब अधिकारियों ने उनकी उम्मीदवारी यह कहकर निरस्त कर दी कि उनका जाति प्रमाण पत्र मध्य प्रदेश का नहीं, बल्कि उनके मूल राज्य, जहां वे शादी से पहले रहती थीं वहाँ से जारी हुआ है।

अधिकारियों का कहना था कि मध्य प्रदेश में आरक्षण का लाभ केवल उन्हीं को दिया जा सकता है, जिनके पास मध्य प्रदेश शासन द्वारा जारी जाति प्रमाण पत्र हो।

इस फैसले से आहत होकर महिला अभ्यर्थियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की और अदालत के सामने यह स्पष्ट किया कि शादी के बाद उन्होंने मध्य प्रदेश में स्थायी रूप से निवास करना शुरू कर दिया है तथा उनके पास मध्य प्रदेश का डोमिसाइल यानी स्थायी निवास प्रमाण पत्र भी मौजूद है। उन्होंने यह भी बताया कि उनकी जाति या समुदाय उनके मूल राज्य और मध्य प्रदेश दोनों में एक ही आरक्षित श्रेणी में शामिल है, इसलिए उनके सामाजिक दर्जे में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है।

साथ ही उन्होंने दलील दी कि उनका जाति प्रमाण पत्र पूरी तरह वैध और विधिसम्मत है, भले ही वह किसी दूसरे राज्य से जारी हुआ हो, और उसे केवल इस आधार पर अमान्य नहीं ठहराया जा सकता कि वह मध्य प्रदेश का नहीं है। याचिकाकर्ताओं ने जोर देकर कहा कि केवल प्रशासनिक सुविधा या अधिकारियों की मनमानी व्याख्या के आधार पर उनके संवैधानिक आरक्षण अधिकार छीने नहीं जा सकते और ऐसा करना समानता और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ होगा।

वहीं राज्य सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि आरक्षण राज्य-विशेष की नीति है और हर राज्य अपने-अपने नियमों के आधार पर आरक्षण का लाभ देता है। सरकार ने कहा कि मध्य प्रदेश में आरक्षण का लाभ केवल उन्हीं अभ्यर्थियों को दिया जा सकता है, जिनके पास मध्य प्रदेश शासन द्वारा जारी जाति प्रमाण पत्र हो, क्योंकि वही प्रमाण पत्र राज्य की आरक्षण नीति के अनुसार मान्य माने जाते हैं। सरकार का यह भी कहना था कि अगर दूसरे राज्य से जारी जाति प्रमाण पत्रों को स्वीकार किया जाने लगा, तो इससे व्यवस्था में भ्रम, असमानता और प्रशासनिक अनियमितता पैदा हो सकती है। इसी आधार पर राज्य सरकार ने अपने रुख को सही ठहराते हुए कहा कि उसने जो निर्णय लिया है, वह भर्ती नियमों और निर्धारित प्रक्रिया के पालन में ही किया गया है।

हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

मामले की सुनवाई जस्टिस जयकुमार पिल्लई की खंडपीठ ने की। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद बेहद स्पष्ट और संतुलित टिप्पणी की।

कोर्ट ने कहा- भर्ती नियमों और विज्ञापन में जो पात्रता शर्तें तय की गई हैं, उनके अलावा कोई नई शर्त जोड़ना उचित नहीं है।

अगर विज्ञापन या नियमों में यह साफ नहीं लिखा है कि जाति प्रमाण पत्र केवल मध्य प्रदेश से जारी होना चाहिए, तो अधिकारियों को अपनी तरफ से यह शर्त लगाने का अधिकार नहीं है। केवल इस आधार पर कि जाति प्रमाण पत्र किसी दूसरे राज्य से जारी हुआ है, महिला अभ्यर्थियों को आरक्षण के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने यह भी कहा कि शादी के बाद महिलाओं का दूसरे राज्य में बसना एक सामाजिक वास्तविकता है। इसे नज़रअंदाज कर प्रशासनिक फैसले लेना न सिर्फ असंवेदनशील है, बल्कि संविधान के समानता और न्याय के सिद्धांतों के भी खिलाफ है।

अदालत का निर्देश

हाईकोर्ट ने मामले में अंतिम निर्णय देते हुए अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि संबंधित अधिकारी यह जांच करें कि महिला अभ्यर्थियों की जाति या समुदाय उनके मूल राज्य और मध्य प्रदेश दोनों में एक ही आरक्षित श्रेणी में आता है या नहीं। अदालत ने कहा कि अगर जांच में यह पाया जाता है कि दोनों राज्यों में उनकी जाति समान आरक्षित वर्ग में शामिल है, तो उन्हें आरक्षण का लाभ देने से इनकार नहीं किया जा सकता। इसके बाद अधिकारियों को निर्देश दिए गए कि भर्ती नियमों और विज्ञापन में तय प्रक्रिया के अनुसार उनकी उम्मीदवारी पर आगे की कार्रवाई की जाए और उन्हें अनावश्यक रूप से परेशान न किया जाए।

महिलाओं के लिए क्यों है यह फैसला खास?

यह फैसला खास तौर पर उन महिलाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण है जो शादी के बाद अपने पति के राज्य में जाकर बसती हैं, नौकरी या शिक्षा के लिए नए राज्य में आवेदन करती हैं, लेकिन पुराने राज्य के दस्तावेज होने के कारण बार-बार प्रशासनिक अड़चनों का सामना करती हैं।

अब यह साफ हो गया है कि महिला की पहचान और अधिकार केवल इस बात से तय नहीं हो सकते कि उसका प्रमाण पत्र किस राज्य से जारी हुआ है। अगर वह उस राज्य की स्थायी निवासी बन चुकी है और उसकी जाति दोनों जगह समान श्रेणी में आती है, तो उसे बराबरी का हक मिलेगा।

यह निर्णय संविधान के उन मूल सिद्धांतों की याद दिलाता है, जिनमें- समानता का अधिकार, लैंगिक न्याय, और सामाजिक न्याय शामिल हैं। कोर्ट ने यह संदेश दिया है कि प्रशासनिक सुविधा या संकीर्ण व्याख्या के नाम पर किसी को उसके संवैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।

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