
भोपाल। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए संविधान में दिए गए आरक्षण अधिकारों पर फर्जी जाति प्रमाण पत्रों के जरिए हो रही हकमारी को लेकर मध्य प्रदेश की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अनुसूचित जाति विभाग के प्रदेश अध्यक्ष और राज्य अनुसूचित जाति आयोग के पूर्व सदस्य प्रदीप अहिरवार ने भोपाल में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि फर्जी और कूटरचित जाति प्रमाण पत्रों के जरिए बड़ी संख्या में अपात्र लोग आरक्षण का लाभ ले रहे हैं, जिससे वास्तविक एससी-एसटी समाज के अधिकारों पर सीधा हमला हो रहा है।
प्रदीप अहिरवार ने कहा कि यह सिर्फ किसी व्यक्ति या पार्टी का मुद्दा नहीं, बल्कि संविधान, सामाजिक न्याय और बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों की रक्षा की लड़ाई है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने समय रहते कार्रवाई नहीं की, तो वे न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगे।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में अहिरवार ने कहा कि संविधान ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्गों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व, शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण इसलिए दिया ताकि सदियों से वंचित समुदायों को मुख्यधारा में लाया जा सके। लेकिन आज स्थिति यह है कि बड़ी संख्या में ऐसे लोग, जो इन वर्गों से नहीं आते, झूठे दस्तावेजों और फर्जी प्रमाण पत्रों के जरिए इन अधिकारों का लाभ उठा रहे हैं।
उनका कहना था कि इससे एक ओर वास्तविक एससी-एसटी युवाओं के अवसर छीने जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पूरी आरक्षण व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं। “जब गलत लोग आरक्षण का फायदा उठाते हैं, तो समाज में यह भ्रम फैलता है कि आरक्षण ही गलत है, जबकि असल दोषी फर्जीवाड़ा करने वाले लोग हैं,”
प्रदीप अहिरवार ने 1996 में आए सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले माधुरी पाटिल बनाम आयुक्त, जनजाति विकास विभाग, महाराष्ट्र का जिक्र करते हुए कहा कि इस निर्णय में जाति प्रमाण पत्र जारी करने और उसके सत्यापन की पूरी प्रक्रिया तय की गई थी। कोर्ट ने सभी राज्यों में उच्च स्तरीय जाति छानबीन समिति बनाने के निर्देश दिए थे और यह भी कहा था कि यदि किसी व्यक्ति के फर्जी जाति प्रमाण पत्र की शिकायत आती है, तो अधिकतम दो महीने के भीतर उसकी जांच कर फैसला देना अनिवार्य होगा।
उन्होंने कहा कि यह फैसला आज भी पूरी तरह लागू है और देश का कानून है, लेकिन मध्य प्रदेश में इन निर्देशों की खुलेआम अवहेलना हो रही है।
अहिरवार ने आरोप लगाया कि वर्तमान में मध्य प्रदेश की उच्च स्तरीय जाति छानबीन समिति के पास 233 से ज्यादा मामले लंबित हैं। इनमें से कई मामलों की जांच सालों से जानबूझकर लटकाई जा रही है। उन्होंने कहा कि यह सीधे-सीधे सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन है।
उनका कहना था कि जिन मामलों में तुरंत फैसला होना चाहिए, वे फाइलों में दबे पड़े हैं और इसी का फायदा उठाकर फर्जी प्रमाण पत्र वाले लोग नौकरी, पद और राजनीतिक लाभ लेते जा रहे हैं।
प्रदीप अहिरवार ने यह भी आरोप लगाया कि जो नागरिक किसी के फर्जी जाति प्रमाण पत्र की शिकायत करता है, उसे उल्टा परेशान किया जाता है। शिकायतकर्ता से कहा जाता है कि वह संबंधित व्यक्ति के जाति प्रमाण पत्र की प्रति लाए और शपथ पत्र दे। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश शासन का ऐसा कोई नियम या आदेश नहीं है, जिसमें शिकायतकर्ता के लिए जाति प्रमाण पत्र की प्रति या शपथ पत्र देना अनिवार्य हो। “यह प्रक्रिया सिर्फ शिकायत को दबाने और दोषियों को बचाने का तरीका बन गई है,”
प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह मुद्दा भी उठाया गया कि अन्य राज्यों के लोग फर्जी जाति प्रमाण पत्र बनवाकर मध्य प्रदेश के मूल अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के लोगों के अधिकारों पर कब्जा कर रहे हैं। अहिरवार ने कहा कि यह न सिर्फ आरक्षण व्यवस्था के लिए, बल्कि प्रदेश की सामाजिक संरचना के लिए भी गंभीर खतरा है।
प्रदीप अहिरवार ने कहा कि उन्होंने 1 अप्रैल 2025 को मध्य प्रदेश शासन की मंत्री प्रतिमा बागरी के फर्जी जाति प्रमाण पत्र के संबंध में विधिवत शिकायत दर्ज कराई थी। इसके बाद उन्होंने प्रमुख सचिव, अनुसूचित जाति कल्याण विभाग, प्रमुख सचिव, मध्य प्रदेश शासन और मुख्यमंत्री मोहन यादव को भी लिखित रूप से अवगत कराया।
लेकिन उनका आरोप है कि इतने समय बाद भी किसी स्तर पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। “जब एक मंत्री के मामले में ही कार्रवाई नहीं हो रही, तो आम आदमी के मामलों का क्या हाल होगा?”
अहिरवार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में घोषणा की कि प्रतिमा बागरी प्रकरण में वे जल्द ही हाईकोर्ट में याचिका दायर करेंगे। इसमें मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव और उच्च स्तरीय जाति छानबीन समिति के संबंधित अधिकारियों को पक्षकार बनाया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि जिन मामलों में समिति के अध्यक्ष और सदस्यों ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना की है, उनके खिलाफ जनहित याचिका (PIL) दायर की जाएगी।
प्रदीप अहिरवार ने कहा कि यह संघर्ष किसी एक व्यक्ति या पार्टी के खिलाफ नहीं, बल्कि व्यवस्था में फैले फर्जीवाड़े के खिलाफ है। “यह लड़ाई संविधान की रक्षा की है, बाबा साहब अंबेडकर के सामाजिक न्याय के विचारों की है और वास्तविक एससी-एसटी समाज के अधिकारों की है,” उन्होंने कहा।
अंत में उन्होंने सरकार से मांग की कि सभी लंबित मामलों का समयबद्ध निपटारा किया जाए, दोषियों पर सख्त कानूनी कार्रवाई हो और आरक्षण व्यवस्था को फर्जी जाति प्रमाण पत्रों से मुक्त किया जाए।
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