
भोपाल। मध्य प्रदेश के उमरिया जिले के नौरोजाबाद थाना क्षेत्र स्थित कंचन ओसीएम (ओपन कास्ट माइंस) में कार्यरत 35 मजदूरों ने ठेका कंपनी बघेल इन्फ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड और एलसीसी प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ गंभीर आरोप लगाते हुए नौरोजाबाद थाने में शिकायत दर्ज कराई है। मजदूरों का कहना है कि उनसे पूरे दिन कड़ी मेहनत कराई गई, लेकिन तय मजदूरी से काफी कम भुगतान किया गया। इतना ही नहीं, अब उन्हें बिना किसी पूर्व सूचना के काम से हटा दिया गया है और उनका बकाया भुगतान भी रोक लिया गया है।
मजदूरों के अनुसार, उन्हें प्रतिदिन 1350 रुपये मजदूरी तय की गई थी। लेकिन हकीकत यह रही कि उन्हें केवल 700 से 800 रुपये ही दिए गए। मजदूरों का कहना है कि वे सुबह से शाम तक लगातार काम करते रहे कभी ड्राइवर के रूप में, कभी ऑपरेटर के रूप में, तो कभी अन्य तकनीकी कार्यों में लगाए गए। इसके बावजूद पूरी मजदूरी नहीं दी गई।
एक मजदूर ने बताया, “हम लोग 10-12 घंटे तक मशीनों के साथ काम करते हैं। धूल, धूप और खतरे के बीच मेहनत करते हैं। लेकिन जब मजदूरी मिलती है तो आधी काट ली जाती है। पूछने पर टाल दिया जाता है या कहा जाता है कि बाद में हिसाब होगा।” मजदूरों का आरोप है कि यह स्थिति कई महीनों से चली आ रही थी, लेकिन नौकरी जाने के डर से वे खुलकर शिकायत नहीं कर पा रहे थे।
बिना नोटिस हटाए गए मजदूर
मजदूरों का कहना है कि हाल ही में उन्हें अचानक काम पर आने से मना कर दिया गया। न कोई लिखित सूचना, न कोई मौखिक नोटिस। बस यह कह दिया गया कि अब उनकी जरूरत नहीं है। इससे 35 परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।
मजदूरों में शामिल ऑपरेटर रितेश नायक ने बताया, “मेरी डेली मजदूरी 1350 रुपये तय थी, लेकिन मुझे कभी पूरा पैसा नहीं मिला। हमेशा 700–800 रुपये ही दिए गए। जब हमने सवाल उठाया तो अब हमें काम से निकाल दिया गया। न पुराने पैसे दिए, न कोई लिखित कारण बताया।”
रितेश जैसे कई मजदूरों ने कहा कि उन्होंने गांव और आसपास के इलाकों से आकर यहां काम पकड़ा था। कुछ लोगों ने तो अपने घर-परिवार की जरूरतों के लिए कर्ज तक ले रखा है। अब काम छूटने से उनकी स्थिति और खराब हो गई है।
थाने पहुंचकर दर्ज कराई शिकायत
मजदूरों ने सामूहिक रूप से नौरोजाबाद थाने पहुंचकर लिखित शिकायत दी है। शिकायत में कहा गया है कि ठेका कंपनियों ने श्रम कानूनों का उल्लंघन किया है। मजदूरों की मांग है कि:
तय मजदूरी और दी गई मजदूरी का अंतर उन्हें तुरंत दिया जाए। बिना नोटिस हटाने की कार्रवाई को गलत माना जाए।
भविष्य में उन्हें काम से हटाने से पहले नियमानुसार सूचना दी जाए। मजदूरों का यह भी कहना है कि अगर उन्हें न्याय नहीं मिला तो वे श्रम विभाग और जिला प्रशासन से भी शिकायत करेंगे।
इस पूरे मामले में बघेल इन्फ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंधक सौरभ सिंह ने मजदूरों के आरोपों को निराधार बताया है। उनका कहना है कि नौरोजाबाद क्षेत्र में कंपनी का ठेका समाप्त हो चुका है, इसलिए वहां काम बंद किया गया है।
सौरभ सिंह ने कहा, “हमारा ठेका इस क्षेत्र में खत्म हो गया है। इसलिए मजदूरों को यहां से हटाया जा रहा है। लेकिन हमने उन्हें अनूपपुर में काम देने की पेशकश की है। मजदूरी की दरें पहले से ही साफ-साफ बताई गई थीं। किसी को धोखा नहीं दिया गया है।”
उन्होंने यह भी दावा किया कि मजदूरी भुगतान से जुड़ा सारा हिसाब-किताब नियमों के अनुसार किया गया है और मजदूरों के आरोप तथ्यहीन हैं।
जानिए क्या हैं श्रम कानून?
श्रम कानून वे कानून होते हैं जो काम करने वाले मजदूरों और कर्मचारियों के अधिकारों, सुरक्षा और सम्मानजनक कामकाजी परिस्थितियों को सुनिश्चित करने के लिए बनाए जाते हैं। इन कानूनों का मकसद यह है कि किसी भी मजदूर से जबरदस्ती काम न कराया जाए, उसे तय समय से ज्यादा काम करने पर अतिरिक्त मेहनताना मिले, न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान न हो और काम की जगह पर उसकी सेहत व सुरक्षा का ध्यान रखा जाए। इनमें न्यूनतम मजदूरी, काम के घंटे, छुट्टी, ओवरटाइम, महिला और बाल श्रमिकों की सुरक्षा, और दुर्घटना या बीमारी की स्थिति में मुआवजे जैसे प्रावधान शामिल होते हैं।
भारत में श्रम कानूनों के तहत किसी मजदूर को बिना वजह और बिना सूचना के काम से निकालना गलत माना जाता है, खासकर जब वह लंबे समय से काम कर रहा हो। नियोक्ता की जिम्मेदारी होती है कि वह समय पर पूरी मजदूरी दे, वेतन की पर्ची दे, पीएफ, ईएसआई जैसी सुविधाएं लागू होने पर उपलब्ध कराए और किसी भी तरह का शोषण न करे। अगर कोई कंपनी या ठेकेदार इन नियमों का पालन नहीं करता, तो मजदूर पुलिस, श्रम विभाग या अदालत में शिकायत कर सकता है और उसे कानूनी संरक्षण मिलता है।
भारत में मजदूरों के अधिकारों की रक्षा के लिए कई श्रम कानून बनाए गए हैं, जिनमें न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948, भुगतान अधिनियम 1936, औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947, कारखाना अधिनियम 1948, निर्माण श्रमिक अधिनियम 1996, ईएसआई अधिनियम 1948 और पीएफ अधिनियम 1952 प्रमुख हैं। इन कानूनों के तहत किसी मजदूर को तय न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान नहीं किया जा सकता, समय पर पूरी मजदूरी देना जरूरी है, काम के घंटे सीमित होते हैं, सुरक्षा और स्वास्थ्य की व्यवस्था करना नियोक्ता की जिम्मेदारी होती है, और बिना कारण या बिना सूचना के मजदूर को हटाना गलत माना जाता है। इन नियमों का मकसद मजदूरों को शोषण से बचाना और उन्हें सम्मानजनक जीवन व काम का अधिकार देना है।
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