
नई दिल्ली: बीते 7 अगस्त को रायपुर में संपन्न एक कार्यक्रम की ख़बर क़रीब एक हफ़्ते बाद वायरल हुई वीडियो की वजह से अब सुर्ख़ियां बटोर रही है. राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के मौके पर स्वदेशी कपड़ों को प्रमोट करने के इरादे से छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा आयोजित उस कार्यक्रम में एक फैशन शो भी रखा गया था.
उस फैशन शो में रैंप वॉक करने वाली महिलाएं कोई आम महिलाएं नहीं थीं, बल्कि चंद महीने पहले तक हाथ में बंदूक लेकर जंगलों में घूमने वाली माओवादी गुरिल्ला दस्तों की सदस्य थीं. इसलिए उनकी रैंप वॉक पर इतनी ज़्यादा चर्चा हो रही है और सरकार इसे अपनी सफलता और ‘सशक्तिकरण’ के उदहारण की तरह पेश कर रही है.
हालांकि, द वायर हिंदी से बातचीत में रैंप वॉक में शामिल चार पूर्व माओवादी महिलाओं ने कहा कि उन्हें सिलाई प्रशिक्षण के नाम पर धोखे से सुकमा से रायपुर ले जाया गया था. वहां पहुंचने के बाद उन्हें रैंप वॉक की ट्रेनिंग दी गई. एक महिला ने कहा, ‘अगर पहले से मुझे पता होता तो मैं नहीं जाती.’
सुकमा पुनर्वास केंद्र में काम करने वाली महिला पुलिसकर्मी सीमा पोयाम ने भी पुष्टि की कि महिलाओं को रैंप वॉक के बारे में पहले से जानकारी नहीं थी. उनके मुताबिक, उन्हें बताया गया था कि महिलाओं को सिलाई से संबंधित प्रशिक्षण के लिए ले जाया जा रहा है.
दूसरी ओर, ग्रामोद्योग विभाग के सुकमा प्रभारी सचिव राजेश सिंह राणा का कहना है कि महिलाओं की कार्यक्रम में भागीदारी उनकी सहमति से हुई और जिला कलेक्टर की ओर से इसके लिए सहमति पत्र भी आए थे.
बता दें कि ग्रामोद्योग विभाग ने रायपुर के दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम में इस कार्यक्रम को आयोजित किया था, जिसमें इन महिलाओं को कोसा सिल्क और पारंपरिक हथकरघा वस्त्र पहनाकर, चेहरों पर मेकअप लगाकर रैंप वॉक करवाया गया. इस कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह भी अतिथि के तौर पर उपस्थित थे.
‘हमें सिलाई काम सिखाने के बहाने ले गए थे’
इस रैंप वॉक में भाग लेने वाली कुछ पूर्व माओवादी स्त्रियों से द वायर हिंदी ने संपर्क किया. इनमें से चार युवतियों ने पुष्टि की है कि रैंप वॉक में सुकमा जिले से कुल 10 महिलाओं ने भाग लिया. उनमें से 9 महिलाएं माओवादी थीं जो आत्मसमर्पण के बाद कुछ महीनों से सुकमा में पुलिस द्वारा संचालित ‘पुनर्वास केंद्र’ में रह रही हैं, जबकि एक महिला खुद एक पुलिसकर्मी है जो कभी माओवादी नहीं थीं.
इन 9 महिलाओं ने पिछले एक साल के दौरान छत्तीसगढ़ और तेलंगाना पुलिस के सामने अलग-अलग समय आत्मसमर्पण किया था.
नाम और पहचान ज़ाहिर न करने की शर्त पर इन पूर्व माओवादी महिलाओं ने द वायर हिंदी को यह बताया कि उन्हें जगदलपुर में सिलाई की ट्रेनिंग दिलवाने की बात कहकर सुकमा से ले जाया गया था, लेकिन उन्हें जगदलपुर की जगह सीधा रायपुर ले जाया गया. 11 लोगों के उनके जत्थे में दो पुलिसकर्मी थीं, जिनमें से एक ने रैंप वॉक में भाग लिया. 1 अगस्त शाम को वे वहां पहुंचीं और फिर रायपुर में उन्हें किसी होटल में ठहराया गया और 2 से 6 अगस्त तक रैंप वॉक की ट्रेनिंग दी गई. मुंबई से आए कुछ लोगों ने उन्हें ट्रेनिंग दी. उन्हें यह भी बताया गया कि रैंप वॉक क्या है और यह कैसे और क्यों होता है, जो कि उन्हें बिल्कुल मालूम नहीं था. उन्होंने आगे जोड़ा कि वे हैरान थीं कि क्यों उन्हें सिलाई की बजाय यह ट्रेनिंग दी जा रही थी.
उनमें से एक ने बताया, ‘हमें सिलाई का काम सिखाएंगे बोलकर ले गए थे. वहां जाने के बाद सिलाई मशीन की ट्रेनिंग की बजाय हमें चलने का ट्रेनिंग देने लगे. पहले तो कुछ भी समझ में नहीं आया. बड़ी मुश्किल से थोड़ा बहुत सीख लिया और स्टेज पर दिखाया.’
उन्होंने आगे कहा, ‘मुझे वहां रैंप वॉक नहीं करनी चाहिए थी. अब बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा है. अगर पहले से मुझे पता होता तो मैं नहीं जाती.’
वहीं, एक और महिला ने भी इसी लहजे में कहा, ‘फैशन शो में भाग लेने के लिए ले जा रहे हैं, बताने से हम जाने से मना कर देते. लेकिन ट्रेनिंग के नाम से लेकर गए थे. हमने तो सोचा था कि कुछ नया सीख लेंगे, जो हमारे काम आ जाए.’
एक अन्य महिला ने बताया, ‘वहां हमें जिस होटल में रखा गया था, वहां मुंबई से कुछ लोग आए थे. हमने उनसे मना करके देखा भी, लेकिन उन्होंने हम पर दबाव डाला. हमें ठीक से करना नहीं आता था. वे हमें डांटते-फटकारते हुए सिखाते थे.’
गौरतलब है कि इनमें से किसी को भी ठीक से हिंदी बोलनी नहीं आती है, वे सिर्फ कामचलाऊ और टूटी-फूटी हिंदी ही बोल पाती हैं; इसलिए द वायर हिंदी से उनका पूरा संवाद गोंडी/कोया भाषा में हुआ. इन सभी से अलग-अलग बात करने पर भी एक बात सभी ने साफ तौर पर दोहराई कि उन्हें धोखे से वहां लेकर गए थे- उनकी भाषा, उनके शब्दों में कहा जाए, तो ‘माकिन गत्ति कीसि ओत्तोर.’
पूर्व माओवादी कैडरों की बातों की पुष्टि महिला पुलिसकर्मी सीमा पोयाम ने भी की, जो सुकमा पुनर्वास केंद्र में काम करती हैं. इन महिलाओं को रायपुर तक ले जाने से लेकर रैंप वॉक के बाद वापस सुकमा लाने तक सीमा उनके साथ ही रहीं.
वे बताती हैं कि उन्हें (इन महिलाओं को) रायपुर लेकर जाने के लिए ऊपर से आदेश था तो वह उन्हें लेकर गईं. उन्हें भी नहीं मालूम था कि वहां क्या होने वाला था.
उन्होंने इस बात की भी पुष्टि की है कि पूर्व माओवादी स्त्रियों को भी नहीं पता था कि उन्हें वहां रैंप वॉक करना होगा. ‘उन्हें इतना ही बताया गया था कि सिलाई से संबंधित किसी प्रशिक्षण के लिए ले जाया जा रहा है.’
‘एक पैसा भी नहीं मिला, बस एक झोला दिया’
जब द वायर हिंदी ने इन पूर्व माओवादी महिलाओं से यह पूछा कि वहां परफॉर्म करने के लिए उन्हें पारिश्रमिक के तौर पर क्या मिला, तो सभी ने यही कहा, ‘कुछ नहीं दिया गया. बस एक झोला दिया, जिसमें एक साड़ी थी.’
द वायर हिंदी ने ग्रामोद्योग विभाग के सुकमा प्रभारी सचिव राजेश सिंह राणा से बात की, तो उन्होंने बताया कि रैंप वॉक में भाग लेने वाली सभी महिलाओं को प्रति महिला- दस-दस हजार रुपये दिया गया. उन्हें नकद न देकर बैंक अकाउंट में भेजा गया. साथ ही उन्होंने बताया कि गिफ्ट में उन्हें हैंडलूम से तैयार हुए खादी और सिल्क के कपड़े दिए गए थे.
जब इसकी पुष्टि करने के लिए महिलाओं से दोबारा पूछा तो उन्होंने बताया कि अभी तक हमारे बैंक में कोई पैसा नहीं आया है. गिफ्ट में केवल एक सूती की साड़ी दी गई थी. साथ ही एक ट्रैक सूट भी दिया गया था.
जब मीडिया में इस ख़बर के वायरल होने की बात का जिक्र करते हुए पूछा गया कि ये सब कैसा लग रहा है- तो एक महिला ने कहा, ‘धोखे से ले जाकर हमसे यह सब करवाया गया तो कैसे अच्छा लगेगा.’
द वायर हिंदी ने इस बारे में ग्रामोद्योग विभाग के सुकमा प्रभारी सचिव राजेश सिंह राणा से भी बात की. उन्होंने कहा कि इन महिलाओं से उनकी मुलाकात सुकमा के नक्सल पुनर्वास केंद्र में हुई थी.
उन्होंने कहा, ‘उनके साथ चर्चा हुई थी कि वे क्या-क्या रोजगार कर रहे हैं, क्या-क्या सुविधाएं उनको मिल रही हैं. वो क्या बनना चाहती हैं; आगे जिंदगी में क्या करना चाहती हैं. चर्चा में यह निकला कि कुछ लोग इसमें (रैंप वॉक) इच्छुक हैं. कुछ बच्चियां बहुत आत्मविश्वास वाली थीं. वे चाहती थीं कि उन्हें भी मंच मिले. राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर हमारा कार्यक्रम था तो उसमें हमने इन्हें जोड़ लिया.’
जब द वायर हिंदी ने उनसे यह पूछा कि क्या इस कार्यक्रम में रैंप वॉक कराने का आइडिया पहले से शामिल था? इस पर उन्होंने कहा, ‘ये पहले से तय नहीं था. हथकरघा दिवस पर स्वदेशी कपड़ों जैसे- खादी, कोसा सिल्क और सूती कपड़ों का प्रचार करना था. बाद में, इन महिलाओं में जो आत्मविश्वास था उसे देखते हुए लगा कि उन्हें उसमें जोड़ा जा सकता है.’
जब उनसे यह पूछा गया कि क्या उन महिलाओं को सिलाई मशीन की ट्रेनिंग के नाम से वहां ले जाया गया था तो राणा ने बताया कि जिला कलेक्टर की तरफ से सहमति पत्र आए थे कि ये महिलाएं उस कार्यक्रम में भाग लेने के लिए इच्छुक हैं.
इस रैंप वॉक के संबंध में द वायर हिंदी को कुछ कथित सहमति पत्र भी मिले हैं, जिनमें ‘स्वदेशी फ़ैशन शो/प्रदर्शनी’ में भागीदारी की इच्छा जतलाते हुए कुछ लोगों के नाम, फोटो, हस्ताक्षर आदि थे. इस बारे में जब द वायर हिंदी ने एक पूर्व माओवादी महिला से पूछा, तो उन्होंने कहा, ‘उसमें हिंदी में क्या-क्या लिखा था हमें कुछ नहीं मालूम, अधिकारियों ने दस्तख़त करने को कहा तो हमने कर दिया.’
रैंप वॉक करवाकर खुश होना मज़ाक है: बेला भाटिया
द वायर हिंदी से इस पर बात करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता और वकील बेला भाटिया ने कहा कि बस्तर की महिलाओं को, वह भी माओवादी पृष्ठभूमि से आने वाली महिलाओं को फैशन शो में इस तरह दिखाना भद्दा मज़ाक है.
उन्होंने कहा, ‘यहां के लोग भूख से लड़ रहे हैं, बेरोज़गारी से लड़ रहे हैं. तरह-तरह के शोषण से लड़ रहे हैं. उनके संसाधनों के दोहन के लिए सारे नियम तोड़े जा रहे हैं. उनके अधिकारों को कुचला जा रहा है. उनके अधिकारों को कुचलने के कारण ही माओवाद पैदा हुआ था. भले ही आज सरकार यह बोल रही हो कि उसने माओवाद को खत्म कर दिया, समाज को इसका जवाब अभी तक नहीं दिया कि माओवाद आखिर शुरू क्यों हुआ था. और इसमें बस्तर के लोग, खासकर महिलाएं ही ज्यादा संख्या में जुड़ी थी, वे क्यों जुड़ी थीं? क्यों उन्होंने हथियार तक उठाए? इन सारी बातों को छुपाकर उन महिलाओं को रैंप वॉक करते हुए दिखाकर खुश होना एक मज़ाक भर है.’
उन्होंने कहा, ‘रैंप वॉक में महिलाओं को शामिल करने का मतलब है उनके शरीर को तथाकथित सुंदरता के खांचे में रखना. यह पितृसत्तात्मक सोच का परिणाम है कि एक समय बंदूक उठाने वाली, राजनीतिक मुद्दे उठाने वाली औरतों को सौंदर्य और शृंगार के दायरे में लाकर उसे उनके सशक्तिकरण की दिशा में कदम बताया जा रहा है. अगर वो लोग फूलन देवी को भी इस तरह क़ैद करके रैंप पर चलवाते, तो यह सचाई बदल जाती कि उनके साथ कैसे बलात्कार हुआ था. क्या उससे उनके समुदाय की महिलाएं जिस सामाजिक शोषण का शिकार हो रही हैं, वह बदल जाती?’
बेला आगे जोड़ती हैं, ‘इन महिलाओं को रैंप पर तो 10-15 मिनट चलवाया गया, लेकिन सरकार ने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की होगी कि इन्होंने किन परिस्थितियों में हथियार उठाए. जंगलों में सालों साल क्यों चलीं? कई लोग इस रास्ते में मारे भी गए, क्यों उन्होंने यह रास्ता अपनाया?’
‘मुख्यधारा’ में लाने के मुद्दे पर बेला ने कहा, ‘ये सब लोग हाशिए पर रहने वाले लोग थे. अपने अधिकारों के लिए लड़ेंगे सोचकर हथियार उठाए थे, क्योंकि इस लोकतंत्र में उनके अधिकारों का हनन हो रहा था. आज उन्होंने हथियार छोड़ दिए लेकिन अधिकारों का मसला हल नहीं हुआ. क्योंकि आबादी की ज्यादातर संख्या अभी भी हाशिए में है. वे लोग मुख्यधारा में नहीं हैं. जिनकी जरूरतें पूरी हो रही हैं वही लोग मेनस्ट्रीम में हैं. इसलिए सरकार से पूछना पड़ेगा कि जिनके अधिकारों का हनन हो रहा है उन्हें मेनस्ट्रीम में कब लाएंगे?’ हाशिए पर खड़े लोगों के अधिकारों को बचाने के लिए सभी लोगों को आगे आना चाहिए. उनके लिए सबको लड़ना चाहिए.’
पूर्व माओवादियों के पुनर्वास पर उठी चर्चा
‘मुख्यधारा’ में लौटी पूर्व नक्सली महिलाओं के रैंप वॉक को सरकार उनके पुनर्वास और सशक्तिकरण के प्रयास के रूप में पेश कर रही है. लेकिन सवाल उठ रहे हैं कि दशकों से जारी हिंसा के दुष्चक्र से बाहर निकली इन महिलाओं के पुनर्वास का प्रतीक रैंप वॉक कैसे हो सकता है? उन्हें मंच पर लाकर, उनकी आदिवासी संस्कृति और उनकी जीवन-पद्धति से कहीं से भी मेल न खाने वाले माहौल में, अनजान भाषाएं बोलने वाली शहरी और ग़ैर-आदिवासी ऑडिएंस के सामने, उनके लिए बिल्कुल अजीब और असहज मुद्राओं में चलावाकर, फोटो-वीडियो खिंचवाकर वायरल कर देना कहां तक उचित है?
उनकी इच्छा क्या है, उनका पक्ष क्या है, उनकी मज़बूरियां क्या हैं, जाने या सुने बग़ैर ही उनकी तरफ से यह घोषणा कर देना कि यह उनकी मुख्यधारा में वापसी की सफलता का प्रतीक है, क्या यह जायज है?
बस्तर संभाग के अलग-अलग जिलों के पुनर्वास केंद्रों में रह रहे पूर्व माओवादियों को अपने आगे के जीवन और रोजगार के बारे में जब स्वतंत्र रूप से फैसला लेने का मौका ही नहीं है, तो इस रैंप वॉक को उनके सशक्तिकरण की दिशा में कदम बताना क्या हास्यास्पद नहीं है?
सुकमा पुनर्वास केंद्र में रहने वाली कुछ पूर्व माओवादी महिलाओं ने द वायर हिंदी को यह भी बताया कि उन्हें कई पाबंदियों के बीच, सुरक्षाकर्मियों की निगरानी में जिंदगी गुजारनी पड़ रही है. उन्हें स्वेच्छा से कहीं आने-जाने की भी अनुमति नहीं है. आदिवासी अपने स्वभाव से एक जगह बंधे हुए रहना नहीं पसंद करते हैं. उनका कहना है कि कौशल विकास की बात तो चल रही है लेकिन अभी तक उन्हें कोई खास ट्रेनिंग नहीं मिली है. कुछ ही लोगों को ड्राइवर और किसानी की ट्रेनिंग मिल रही है.
एक महिला ने बताया, ‘ऊपर से देखने से सब अच्छा दिखता है लेकिन ऐसा कुछ नहीं है. हम बचपन से जंगलों में जीने के आदी रहे हैं. अब यहां बहुत मुश्किल लग रहा है. अपने गांव-घर में रहने जैसा बिल्कुल नहीं है. ऊपर से खुश दिखते हैं लेकिन हम खुश नहीं हैं. हम चाहते हैं कि हम अपने घर लौट जाएं और वहां खेती-किसानी का काम करके गुजारा करें.’
इस विषय पर उस्मानिया यूनिवर्सिटी आर्ट्स कॉलेज, हैदराबाद के प्रिंसिपल प्रोफेसर चिंतकिंदी कासिम कहते हैं, ‘मुख्यधारा में लौटने की सरकार के आह्वान पर या मजबूरीवश सैकड़ों माओवादियों ने अलग-अलग राज्यों में पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया, जिनमें बड़ी संख्या महिलाओं की है. जिस तरह पूर्वोत्तर के राज्यों में सरेंडर करने वाले मिलिटेंट्स को मुख्यधारा से जोड़ा गया, उन्हें सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर प्रदान किया गया, इन्हें भी अपनी मर्जी से घर-गांव जाने की छूट देनी चाहिए. केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को इस नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए ताकि समाज में अशांति की स्थिति पैदा न हो.’
संस्कृति का सवाल
माओवादियों का बड़ी संख्या में आत्मसमर्पण और सरकारी पुनर्वास के दावों के बीच आदिवासियों का जल-जंगल-जमीन और उनकी संस्कृति की चर्चा दब-सी गई. बस्तर में आज जिस तेज़ी से बाज़ारवाद, माइनिंग और पर्यटन पैर पसार रहे हैं, इससे आदिवासियों के लिए नई चिंताएं उत्पन्न हो रही हैं.
प्रोफेसर कासिम मानते हैं कि इन आदिवासी महिलाओं के सालों के राजनीतिक और सामाजिक आचरण को नीचा दिखाने का उद्देश्य भी इसमें छिपा हुआ है. रैंप वॉक को वो बाजार की संस्कृति या वस्तुवादी संस्कृति का हिस्सा मानते हैं.
वे कहते हैं, ‘एक समय था जब ऐश्वर्या रॉय, सुष्मिता सेन जैसी महिलाओं को लगातार मिस वर्ल्ड या मिस यूनिवर्स के ख़िताब मिलते जा रहे थे. वह ऐसा समय था जब उदारीकरण की बहार चली हुई थी और बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपनी चीज़ें धड़ल्ले से भारत के विशालकाय बाज़ार में उतार रही थीं. अब माओवादी पृष्ठभूमि से आने वाली आदिवासी महिलाओं को भी यहां लागू हो रहे तथाकथित विकास के मॉडल के चीयरलीडर्स के तौर पर पेश करने की कोशिश चल रही है.’
सवाल यहीं तक खत्म नहीं हुए. राज्य में सत्तारूढ़ भाजपा और उसका पितृ संगठन आरएसएस अमूमन भारतीय संस्कृति पर पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव का विरोधी होने का दावा करते हुए स्वदेशी के पहलू को हमेशा तवज्जो देते हुए दिखते हैं. ऐसे में, कुछ आलोचक यह सवाल भी उठा रहे हैं कि हथकरघा दिवस पर हुई यह रैंप वॉक क्या पश्चिमी संस्कृति का हिस्सा नहीं थी?
अपनी एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान रखने वाली आदिवासी महिलाओं पर पश्चिमी देशों की फैशन संस्कृति को थोपना उनके पुनर्वास में किस तरह का योगदान हो सकता है? अगर सचमुच आदिवासी संस्कृति और स्वदेशी संस्कृति पर उन्हें गर्व है तो क्यों भारतीय पारंपरिक कला, वेशभूषा, गीत, नृत्य और स्थानीय हुनर को मंच नहीं बनाया गया?
माओवाद और ऑपरेशन कगार
उल्लेखनीय है कि देश में लगभग पांच दशकों से जारी नक्सल या माओवादी आंदोलन के चलते, ख़ासतौर पर मध्य भारत के आदिवासी इलाकों में पुलिस व अर्धसैनिक बलों और माओवादियों के बीच हिंसक संघर्ष होते रहे. नक्सलवादियों पर सुरक्षा बलों पर हमले और मुखबिरों के नाम पर आम नागरिकों की हत्या के आरोप हैं, जबकि सुरक्षा बलों पर फर्जी मुठभेड़ और मानवाधिकारों के हनन के आरोप लगते रहे.
केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा लगातार चलाए जा रहे काउंटर इंसर्जेंसी ऑपरेशन्स में 2024 को एक महत्वपूर्ण मोड़ आया, जब ऑपरेशन कगार के नाम से एक व्यापक अभियान छेड़ा गया और 31 मार्च 2026 तक देश को नक्सल मुक्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था.
इसके बाद बस्तर क्षेत्र में कई बड़ी ‘मुठभेड़ें’ हुईं जिसमें दर्जनों की संख्या में कथित माओवादी कैडर और नेता मारे गए. इसके बाद पोलित ब्यूरो सदस्य मल्लोजुला वेणुगोपाल के नेतृत्व में माओवादी संगठन का एक धड़ा सशस्त्र संघर्ष छोड़ने की घोषणा करके, अक्टूबर 2025 में सरकार के सामने शस्त्रों के साथ आत्मसमर्पण किया. लेकिन संगठन के दूसरे लीडर जैसे देवजी, हिड़मा ने इसका विरोध किया और संघर्ष को जारी रखने की बात कही.
लेकिन बाद में हुए घटनाचक्र में हिड़मा की मौत आंध्र प्रदेश के जंगलों में एक कथित मुठभेड़ में हुई और देवजी समेत कुछ अन्य नेताओं ने तेलंगाना पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया. इसके बाद धीरे-धीरे बस्तर क्षेत्र में काम करने वाले छोटे-बड़े स्तर के सभी कैडरों ने सरेंडर कर दिया.
इसके बाद लगभग सभी आत्मसमर्पित कैडरों को सरकार ने जिला मुख्यालयों में पुलिस लाइंस में खोले गए ‘पुनर्वास केंद्रों’ में रखा हुआ है. इनमें एक बड़ी संख्या महिलाओं की है. बताते हैं कि अकेले सुकमा के पुनर्वास केंद्र में ही सौ से अधिक महिलाएं हैं जिनमें अधिकतर पूर्व माओवादी हैं. उनमें कुछ संख्या ऐसी ग्रामीण महिलाएं की भी है जिन पर माओवादी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप हैं.
उक्त लेख मूल रूप से द वायर हिंदी द्वारा प्रकाशित किया गया है. जनजागरूकता के उद्देश्य से इसे पुनः पब्लिश किया गया है.
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