नई दिल्ली में 3 मई को दलित महिला सफाई कर्मियों के जीवन और उनके कार्यस्थल पर होने वाले शोषण को लेकर एक महत्वपूर्ण जन-सुनवाई का आयोजन किया गया। दलित आदिवासी शक्ति अधिकार मंच (DASAM) और महिला कामकाजी मंच (MKM) द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम का मुख्य विषय 'सुरक्षा के बिना श्रम, गरिमा के बिना जीवन: संरचनात्मक शोषण का सामना और अधिकारों की पुनः प्राप्ति' रखा गया। यह कार्यक्रम दिल्ली में पिछले कई महीनों से चल रही एक जमीनी प्रक्रिया का परिणाम रहा।
यह विशेष जन-सुनवाई 'संडे कैंपेन विद वुमन वर्कर्स' नामक पहल से उभरी है, जिसके तहत विभिन्न झुग्गी बस्तियों में दलित महिला सफाई कर्मियों के साथ साप्ताहिक संवाद किए गए थे। समय के साथ ये अनौपचारिक बातचीत सामूहिक चिंतन के संगठित मंचों में बदल गई। जो महिलाएं पहले औपचारिक मंचों से बाहर थीं, उन्होंने अपने जीवन की वास्तविकताओं और व्यक्तिगत संघर्षों को साझा करना शुरू किया, जिससे संरचनात्मक अन्याय की पहचान संभव हो सकी।
इन संवादों के दौरान वेतन में देरी, मनमाना निष्कासन, असुरक्षित कार्य परिस्थितियाँ, उत्पीड़न और मान्यता के अभाव जैसी कई गंभीर समस्याएँ सामने आईं। जैसे-जैसे शोषण के ये पैटर्न स्पष्ट होते गए, जन-सुनवाई का विचार विकसित हुआ। इसका मुख्य उद्देश्य महिलाओं की निजी पीड़ा को सार्वजनिक गवाही और जवाबदेही में बदलना था ताकि व्यवस्था को आईना दिखाया जा सके।
इस जन-सुनवाई में वाल्मीकि समुदाय की सैकड़ों दलित महिला श्रमिकों ने भाग लिया। ये महिलाएं सफाई कर्मी, हाउसकीपिंग स्टाफ और घरेलू कामगार के रूप में स्कूलों, मॉल, मेट्रो, अस्पतालों और MCD, NDMC व DDA जैसे प्रमुख सार्वजनिक संस्थानों में कार्यरत हैं। कार्यक्रम में पत्रकारों, नागरिक समाज के सदस्यों, शोधकर्ताओं और कानूनी विशेषज्ञों की उपस्थिति रही ताकि इन गवाहियों का दस्तावेजीकरण किया जा सके।
सुनवाई की गंभीरता को देखते हुए एक प्रतिष्ठित जूरी पैनल का गठन किया गया था। इस पैनल में सर्वोच्च न्यायालय की वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर, कॉलिन गोंसाल्वेस, आईआईटी दिल्ली की प्रो. रीतिका खेड़ा, नारीवादी शिक्षिका पूर्णिमा गुप्ता, मानवाधिकार रक्षक मंजुला प्रदीप, सामाजिक कार्यकर्ता इंदु प्रकाश सिंह और नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी की प्रो. सोफी के. जे. शामिल रहे। इन विशेषज्ञों ने गवाहियों को व्यापक कानूनी व नीतिगत संदर्भ में परखा।
कार्यक्रम का मुख्य केंद्र महिलाओं की गवाहियाँ रहीं, जिन्होंने व्यवस्थागत अन्याय की गहराई को उजागर किया। NDMC की पूर्व सफाई कर्मी लाली ने बताया कि वर्षों तक बिना लिखित अनुबंध के काम करने के बाद भी उन्हें कोई आधिकारिक मान्यता नहीं मिली और नौकरी बचाने के लिए रिश्वत तक देनी पड़ी। वाल्मीकि समुदाय की गीता ने साझा किया कि 2018 में उनके पति और फिर बेटे की मृत्यु के बावजूद उन्हें कोई मुआवजा नहीं मिला।
अन्य गवाहियों में अनिता ने निजी स्कूलों में कम वेतन और बिना छुट्टी के काम करने की समस्या उठाई। वहीं नीतू सिंह ने कार्यस्थल पर होने वाले अत्यधिक कार्यभार, जातिगत भेदभाव और शारीरिक उत्पीड़न के दर्दनाक अनुभव साझा किए। इन गवाहियों से यह स्पष्ट हुआ कि आउटसोर्सिंग और ठेका प्रणाली ने श्रमिकों को अदृश्य बना दिया है, जिससे सरकारी और निजी संस्थाएं अपनी जिम्मेदारी से आसानी से बच निकलती हैं।
सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि इन श्रमिकों की मासिक आय 8,000 से 16,000 रुपये के बीच है, जो अत्यंत अस्थिर है। असुरक्षित कार्य परिस्थितियों के कारण उन्हें गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कार्यस्थल के बाहर भी ये महिलाएं पूरे परिवार का बोझ उठाती हैं, जिसका सीधा असर उनके बच्चों की शिक्षा और भविष्य पर पड़ता है। यह स्थिति जाति, लिंग और वर्ग के जटिल संबंधों को दर्शाती है।
जूरी ने इस स्थिति को सुधारने के लिए कई महत्वपूर्ण सिफारिशें पेश कीं। इनमें नियमित स्वास्थ्य शिविरों का आयोजन, क्षमता निर्माण, कानूनी कार्रवाई हेतु दस्तावेजीकरण और सोशल मीडिया अभियानों पर जोर दिया गया। साथ ही वेतन भुगतान का डिजिटल रिकॉर्ड रखने, ठेका श्रम प्रणाली का अध्ययन करने और कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के खिलाफ प्रभावी तंत्र बनाने की सलाह दी गई।
अंत में यह स्पष्ट किया गया कि यह जन-सुनवाई केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि दिल्ली में अपनी तरह की पहली ऐसी पहल है जो विशेष रूप से दलित महिला सफाई कर्मियों के मुद्दों पर केंद्रित है। DASAM और MKM ने इन महिलाओं की आवाज को नीतिगत बदलाव तक पहुंचाने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। इस प्रक्रिया के माध्यम से हाशिए पर खड़ी महिलाओं को उनके अधिकारों के लिए संगठित और जागरूक बनाने का प्रयास जारी रहेगा।
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