
नई दिल्ली: जातिगत उत्पीड़न, बायोडाटा में फर्जीवाड़ा और संस्थान पर बेवजह वित्तीय बोझ डालने के गंभीर आरोपों के बाद बर्खास्त किए गए उत्तराखंड के एक संस्थान के पूर्व प्रिंसिपल की अब बहाली हो गई है। राज्य सरकार ने नई टिहरी स्थित स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ होटल मैनेजमेंट, केटरिंग टेक्नोलॉजी एंड अप्लाइड न्यूट्रिशन के पूर्व प्रिंसिपल यशपाल सिंह नेगी को दो साल बाद फिर से उनके पद पर बहाल करने का फैसला किया है।
तत्कालीन पर्यटन सचिव ने 28 मई 2024 को एक आदेश जारी कर नेगी की सेवाएं समाप्त कर दी थीं। यह संस्थान पर्यटन विभाग के ही अधिकार क्षेत्र में आता है। बर्खास्तगी के आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि अनुबंध पर निदेशक और प्रिंसिपल के रूप में कार्य करते हुए नेगी अपने आधिकारिक कर्तव्यों तथा जिम्मेदारियों का पूरी निष्ठा से निर्वहन करने में विफल रहे।
अब 10 अप्रैल 2026 को पर्यटन सचिव द्वारा जारी एक पत्राचार के माध्यम से उनकी बहाली का आदेश दिया गया है। यह फैसला तब आया जब नेगी ने सरकार को पत्र लिखकर अनुरोध किया कि उन्हें वापस काम पर लिया जाए। उन्होंने आश्वस्त किया कि इसके एवज में वह उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत अपना अदालती मामला वापस ले लेंगे।
बर्खास्तगी के बाद पूर्व प्रिंसिपल ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जहां से उन्हें विभाग के आदेश पर स्टे मिल गया था। इसके बाद पर्यटन विभाग ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की, जिसके परिणामस्वरूप हाई कोर्ट का स्टे तो रद्द कर दिया गया, लेकिन मामले की सुनवाई पूरी होने तक वेतन वसूली के आदेश पर रोक लगा दी गई।
इस बीच 2 जनवरी 2026 को पर्यटन सचिव की अध्यक्षता में संस्थान के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स की एक बैठक भी आयोजित हुई थी। बैठक के मिनट्स से पता चलता है कि बोर्ड ने नियमित नियुक्ति के माध्यम से प्रिंसिपल का चयन करने और इसके लिए नया विज्ञापन जारी करने का निर्णय लिया था।
यशपाल सिंह नेगी साल 2016 में एसोसिएट प्रोफेसर के पद से पदोन्नत होकर निदेशक बने थे। 6 मई 2024 को हुई एक विभागीय जांच के बाद जारी उनके बर्खास्तगी आदेश में कई गंभीर आरोप सूचीबद्ध किए गए थे। जांच समिति की रिपोर्ट में कहा गया था कि नेगी ने अधीनस्थ शैक्षणिक और गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों का उत्पीड़न किया था।
रिपोर्ट के अनुसार, नेगी ने एसोसिएट प्रोफेसर के पद के लिए अपने बायोडाटा में झूठा दावा किया था कि उनके पास पीएचडी की डिग्री है। इसके अलावा, निदेशक पद के लिए भी उन्होंने गलत जानकारी दी कि उन्होंने कम से कम दो पीएचडी उम्मीदवारों का पर्यवेक्षण या सह-पर्यवेक्षण किया है।
जांच में यह भी सामने आया कि उन्होंने संस्थान में लागू मूल्यांकन प्रणाली के लिए अखबारों में विज्ञापन देकर बेवजह का वित्तीय बोझ डाला। वह रोजाना बायोमेट्रिक उपस्थिति दर्ज नहीं करते थे और अनुपस्थित रहने पर एक साथ कई दिनों के मैनुअल रजिस्टर पर हस्ताक्षर कर देते थे।
अनुसूचित जाति आयोग ने एक सहायक प्रोफेसर अनिल कुमार टम्टा को परेशान करने के लिए भी उन्हें जिम्मेदार ठहराया था। जांच रिपोर्ट के अनुसार, नेगी ने नियमों का घोर उल्लंघन करते हुए एक सहायक प्रोफेसर के निजी बैंक खाते में 49,800 रुपये ट्रांसफर किए थे। समिति का मानना था कि उनके कार्यकाल में संस्थान का माहौल पूरी तरह से खराब हो गया था।
अधीनस्थ कर्मचारियों के बयानों के आधार पर यह पाया गया कि वह उनके साथ अभद्र भाषा का प्रयोग करते थे। कर्मचारियों के वेतन भुगतान में देरी के लिए भी उन्हीं को जिम्मेदार माना गया। जिला और पुलिस प्रशासन के माध्यम से समय-समय पर उनकी कई शिकायतें मिलीं, जिससे संस्थान की प्रतिष्ठा को भारी नुकसान पहुंचा।
इन तमाम शिकायतों के बाद टिहरी गढ़वाल के जिलाधिकारी को पत्र भेजकर नेगी की नियुक्ति की तारीख से उन्हें किए गए वेतन और अन्य भुगतानों की वसूली करने के लिए कहा गया था। इसी कार्रवाई के खिलाफ नेगी ने जून 2024 में उत्तराखंड हाई कोर्ट में याचिका दायर कर आदेश को चुनौती दी थी।
उनका तर्क था कि सेवाएं समाप्त करने से पहले उन्हें न तो कोई कारण बताओ नोटिस दिया गया और न ही कोई चार्जशीट सौंपी गई। उनका कहना था कि उन पर लगे गंभीर आरोपों को लेकर एक कलंकपूर्ण आदेश पारित कर दिया गया है।
दूसरी ओर, उत्तराखंड पर्यटन विकास बोर्ड के वकील ने अदालत को बताया कि एक जांच समिति गठित की गई थी और याचिकाकर्ता का पक्ष सुनने के बाद ही कार्रवाई की गई। हालांकि, 19 जून 2024 को हाई कोर्ट ने विभाग के आदेश पर यह कहते हुए रोक लगा दी कि सरकार इस बात का संतोषजनक जवाब नहीं दे सकी कि बर्खास्तगी से पहले चार्जशीट जारी की गई थी या नहीं।
इसके तुरंत बाद पर्यटन विकास बोर्ड ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। 22 जुलाई 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने वेतन वसूली पर रोक तो बरकरार रखी, लेकिन हाई कोर्ट के स्टे को रद्द करते हुए दोनों पक्षों को चार सप्ताह के भीतर अपनी दलीलें पूरी करने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वसूली की कार्रवाई रिट याचिका के अंतिम परिणाम पर निर्भर करेगी।
यह कानूनी मामला अभी लंबित है, लेकिन इसी बीच विभाग ने नेगी की बहाली का नया आदेश जारी कर दिया है। पर्यटन सचिव धीरज गर्ब्याल द्वारा जारी आदेश में कहा गया है कि नेगी ने 5 मार्च 2026 और 7 अप्रैल 2026 को पत्र लिखकर अनुरोध किया था।
नेगी ने अपने पत्र में लिखा था कि यदि सरकार उन्हें समान सेवा शर्तों के तहत उनके पिछले पद पर बहाल करती है, तो वह कानूनी प्रक्रिया के अनुसार हाई कोर्ट से अपनी याचिका और सभी संबंधित कार्यवाही वापस ले लेंगे। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि सरकारी स्तर पर विचार-विमर्श के बाद 2024 के बर्खास्तगी आदेश को तत्काल प्रभाव से रद्द करने का निर्णय लिया गया है।
नेगी की सेवाएं उन्हीं पुरानी शर्तों पर बहाल की गई हैं। उन्हें अपने तैनाती स्थल पर कार्यभार ग्रहण करने के लिए एक महीने का समय दिया गया है। आदेश में शर्त रखी गई है कि इस अवधि के भीतर उन्हें हाई कोर्ट में दायर रिट याचिका वापस लेने के कानूनी दस्तावेज भी विभाग को जमा करने होंगे।
संस्थान के एक प्रोफेसर के उत्पीड़न का मामला जुलाई 2023 में अनुसूचित जाति आयोग के समक्ष पहुंचा था। अनिल कुमार टम्टा ने आरोप लगाया था कि प्रिंसिपल उन्हें अपने कार्यालय में बुलाकर गाली-गलौज करते थे और जातिसूचक टिप्पणियां कर उन्हें अपमानित करते थे।
इस लगातार होने वाले उत्पीड़न से वह मानसिक दबाव और अवसाद का शिकार हो गए, जिसके लिए उन्हें चिकित्सा सहायता लेनी पड़ी। यह भी आरोप था कि फूड प्रोडक्शन का प्रोफेसर होने के बावजूद, टम्टा को छुआछूत के बहाने अपना विषय पढ़ाने से रोक दिया गया था।
उस समय आयोग ने माना था कि यहां प्रोफेसर के संवैधानिक अधिकारों का घोर उल्लंघन हुआ है। आयोग ने सख्त आदेश दिया था कि यदि यह उत्पीड़न आगे भी जारी रहता है, तो एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत आपराधिक मामला दर्ज किया जाएगा।
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