
झारखंड: राज्य में शुक्रवार से 2027 की जनगणना के पहले चरण की शुरुआत हो चुकी है। इसी बीच आदिवासी समुदाय की विशिष्ट सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने एक बड़ा कदम उठाया है। उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राज्यपाल संतोष गंगवार को पत्र लिखकर जनगणना फॉर्म के धर्म कॉलम में अलग से 'सरना' कोड को शामिल करने की मांग की है।
अगले साल फरवरी महीने से जनगणना का दूसरा चरण शुरू होने की संभावना है, जिसमें मुख्य रूप से जनसंख्या की गिनती का काम किया जाएगा। झारखंड की इस पुरानी और बहुप्रतीक्षित मांग को एक बार फिर से उठाते हुए मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार इस मुद्दे के पक्ष में विधानसभा से पहले ही प्रस्ताव पारित कराकर केंद्र सरकार को भेज चुकी है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संबोधित अपने पत्र में मुख्यमंत्री ने इस बात पर गहराई से जोर दिया कि किसी भी समाज की पहचान उसके सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और सांस्कृतिक ताने-बाने से तय होती है। उन्होंने याद दिलाया कि आजादी से पूर्व होने वाली जनगणनाओं में विभिन्न समुदायों के धार्मिक रीति-रिवाजों और पहचान को स्पष्ट रूप से दर्ज किया जाता था। हालांकि, स्वतंत्र भारत में आदिवासी समुदाय के धर्म को अलग से अंकित करने की इस अहम परंपरा को आगे नहीं बढ़ाया गया।
जनगणना प्रक्रिया के प्रति अपनी सरकार की प्रतिबद्धता जताते हुए सीएम सोरेन ने कहा कि राज्य सरकार 2027 की जनगणना में पूरी तरह से सहयोग कर रही है। उन्होंने यह भी बताया कि 15 मई तक चलने वाली स्व-गणना प्रक्रिया में उन्होंने खुद भी अपना विवरण दर्ज कराकर इस महाभियान में अपना छोटा सा योगदान दिया है।
मुख्यमंत्री ने पत्र में इस बात का जिक्र किया है कि पहले चरण के दौरान अन्य जानकारियों के साथ यह भी दर्ज किया जा रहा है कि परिवार का मुखिया अनुसूचित जाति (एससी) या अनुसूचित जनजाति (एसटी) वर्ग से आता है या नहीं। इसके बाद दूसरे चरण में प्रत्येक नागरिक का व्यक्तिगत डेटा संकलित किया जाएगा। सरना धर्म की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और इसके प्रति आदिवासियों के गहरे भावनात्मक लगाव को देखते हुए, उन्होंने आगामी जनगणना में एक अलग 'सरना धर्म कोड' का स्पष्ट प्रावधान करने का आग्रह किया है।
उन्होंने अपने पत्र में इस बात को भी स्वीकार किया कि नई श्रेणियों और आयामों को शामिल करने से जनगणना के काम में थोड़ा अतिरिक्त समय लग सकता है। लेकिन इसके साथ ही उन्होंने यह चिंता भी जताई कि अगर किसी खास समुदाय से जुड़े सटीक आंकड़े ठीक से नहीं जुटाए गए, तो भविष्य में उनके लिए नीतियां बनाने की प्रक्रिया पर इसका दूरगामी और बेहद नकारात्मक असर पड़ सकता है।
अपनी इस मांग की गंभीरता और प्रासंगिकता को साबित करने के लिए सीएम सोरेन ने 2011 की जनगणना का एक अहम आंकड़ा भी पेश किया। उन्होंने बताया कि पिछली जनगणना में अलग से सरना कोड का कोई विकल्प मौजूद नहीं था। इसके बावजूद, देश के 21 राज्यों में रहने वाले करीब 50 लाख लोगों ने अपनी मर्जी से धर्म वाले कॉलम में खुद को 'सरना' के रूप में दर्ज कराया था।
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