रायपुर: छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में बच्चों के लिए हर रोज गरमा-गरम 'मिड-डे मील' तैयार करने वाले हजारों हाथ आज खुद खाली हैं। नया रायपुर के तूता स्थित 'नया धरना स्थल' पर पिछले 21 दिनों से रसोइयों का जमावड़ा लगा हुआ है। ये रसोइये अपनी दिहाड़ी को मात्र 66 रुपये से बढ़ाकर 340 रुपये करने की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन हड़ताल पर बैठे हैं।
मैदान में तंबुओं की कतारें लगी हैं, जहां रसोइये जत्थों (बैच) में आ रहे हैं। हर जत्था लगभग तीन दिन तक धरना स्थल पर डटा रहता है और फिर उनकी जगह दूसरे साथी ले लेते हैं। इस भीड़ की जरूरतों को पूरा करने के लिए स्थानीय विक्रेताओं ने भी वहां अपनी दुकानें सजा ली हैं।
30 साल की सेवा और 66 रुपये का मेहनताना
'छत्तीसगढ़ स्कूल मध्याह्न भोजन रसोइया संयुक्त संघ' के बैनर तले हो रहे इस प्रदर्शन की अगुवाई कर रहे संघ के सचिव मेघराज बघेल (45) बस्तर क्षेत्र के कोंडागांव जिले से ताल्लुक रखते हैं। अपनी व्यथा सुनाते हुए बघेल Indin Express के हवाले से कहते हैं, "मैं पिछले 30 सालों से मिड-डे मील रसोइye के रूप में काम कर रहा हूं। अब गुजारा करना मुश्किल हो गया है। बच्चों की पढ़ाई पूरी कराने के लिए मुझ पर 90,000 रुपये का कर्ज हो गया है।"
बघेल ने पुराने दिनों को याद करते हुए बताया कि जब उन्होंने 1995 में काम शुरू किया था, तब उन्हें 15 रुपये प्रतिदिन मिलते थे। आज तीन दशक बाद भी वे 66 रुपये प्रतिदिन पर अटके हुए हैं। उन्होंने इसे घोर अन्याय बताते हुए कहा कि एक और बड़ी समस्या यह है कि अगर स्कूल में बच्चों की संख्या कम हो जाती है, तो उनकी सेवा समाप्त कर दी जाती है, जो कि सरासर गलत है।
संघर्ष का लंबा इतिहास
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उनका पहला आंदोलन 2003-2004 में शुरू हुआ था। छह साल के लंबे संघर्ष के बाद, दैनिक मजदूरी बढ़ाकर 33 रुपये (यानी 1,000 रुपये प्रति माह) की गई थी। इसके बाद 2019 और 2023 में बढ़ोतरी हुई, जिससे यह राशि 66 रुपये प्रतिदिन (2,000 रुपये प्रति माह) तक पहुंची।
बघेल ने जोर देकर कहा, "हमारी पहली और प्रमुख मांग है कि हमें 11,400 रुपये प्रति माह या कम से कम 340 रुपये प्रतिदिन का भुगतान किया जाए।"
'बेटी गुजरी, लेकिन मैं काम पर थी'
रसोइयों की मजबूरियों की दास्तां दिल दहला देने वाली है। मेघराज बघेल ने बताया कि उन पर काम का इतना दबाव होता है कि अपने पिता की मृत्यु वाले दिन भी उन्हें स्कूल में खाना पकाने जाना पड़ा।
यही दर्द राजनांदगांव की 40 वर्षीय सुकृता चवन का भी है। उन्होंने बताया, "2024 में जिस दिन मेरी बेटी की मृत्यु हुई, उस दिन भी मैं काम कर रही थी। हमारी समस्याएं अनंत हैं, लेकिन सरकार सुनने को तैयार नहीं है।"
सुकृता 2003 से कार्यरत हैं। वे कहती हैं, "मुझे अक्टूबर से वेतन नहीं मिला है। मेरे पति मजदूर हैं और दो और बेटियों की पढ़ाई के लिए हमने कर्ज ले रखा है। सरकार को लगता है कि हम सिर्फ दो घंटे काम करते हैं, लेकिन असलियत यह है कि सुबह 10 बजे चावल धोने और साफ करने से हमारा काम शुरू होता है। दाल, चावल, सब्जी, पापड़ और अचार बनाने के बाद, परोसने और बर्तन धोने तक 3 बज जाते हैं। अगर कोई स्कूल का कार्यक्रम हो, तो शाम के 4 बज जाते हैं। 2013 में मैं अकेले 170 बच्चों का खाना बनाती थी, अब 60 बच्चों के लिए बनाती हूं।"
महंगाई की मार और 'बंधुआ मजदूरी' जैसा हाल
कांकेर से आए पंकज प्रमाणिक का कहना है कि उनकी स्थिति बंधुआ मजदूरों जैसी हो गई है। उन्होंने बताया, "चुनावों के दौरान हमसे खाना बनवाया जाता है, लेकिन उसका कोई भुगतान नहीं मिलता। कोविड के बाद, उन्होंने जून के आखिरी 15 दिनों का पैसा देना बंद कर दिया, यह कहकर कि केंद्र सरकार से केवल 10 महीने का पैसा आता है और ये 15 दिन स्कूल की छुट्टियों में समायोजित हो जाते हैं।"
महंगाई का जिक्र करते हुए प्रमाणिक ने कहा, "हम अच्छे कपड़े खरीदना तो दूर, टमाटर खाने से भी कतराते हैं। हम चीजों को देखते हैं, पर खरीद नहीं पाते। हमारे लिए हर चीज महंगी होती जा रही है।"
पैसे की तंगी से छूटी कॉलेज की पढ़ाई
धमतरी की शकुंतला सेन के लिए घर चलाना चुनौती बन गया है। वे बताती हैं, "मेरे 19 और 20 साल के दो बच्चों को कॉलेज छोड़ना पड़ा क्योंकि मेरे पास उन्हें आगे पढ़ाने के लिए पैसे नहीं हैं। मेरे पति एक किसान हैं।"
वहीं, कांकेर की शिप्रा तरफदार का कहना है कि रसोइयों को आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और मितानिनों जैसा सम्मान नहीं मिलता, जिन्हें उनके काम के लिए सराहा जाता है।
क्या कह रही है सरकार?
इस पूरे मामले पर राजस्व और शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने चुप्पी साध रखी है। हालांकि, एक सरकारी सूत्र ने जानकारी दी है कि रसोइयों के वेतन में 1,000 रुपये प्रति माह की बढ़ोतरी का प्रस्ताव है, जिससे कुल वेतन 3,000 रुपये प्रति माह हो जाएगा। लेकिन अभी तक इस पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है।
फिलहाल, हजारों रसोइये अपनी जायज मांगों को लेकर डटे हुए हैं, इस उम्मीद में कि शायद सरकार उनकी सुध ले ले।
द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.