नई दिल्ली। विश्व पुस्तक मेला में शनिवार को राजकमल प्रकाशन समूह के स्टॉल पर पुष्पेश पंत की संस्मरणात्मक पुस्तक ‘नैनीताला नैनीताला’, संतोष मेहरोत्रा की किताब ‘भारत में ग़रीबी’, प्रज्ञा के कहानी संग्रह ‘दाग़ दाग़ उजाला’, नेहा दीक्षित की अनूदित किताब ‘कोई एक सईदा’, राकेश तिवारी की किताब ‘जिरह अजुधिया’, पुष्यमित्र की किताब ‘गांधी का सैंतालीस’, सुशील कुमार की किताब ‘साइबर कथाएँ : डिजिटल सुरक्षा की राह’ और उमेश पंत की किताब ‘छानी खरीकों में’ का लोकार्पण हुआ। वहीं गौतम चौबे के उपन्यास ‘चक्का जाम’ और बलवन्त कौर की किताब ‘स्मृति और दंश’, की किताबों पर चर्चा हुई।
कार्यक्रम की शुरुआत गौतम चौबे के उपन्यास ‘चक्का जाम’ पर चर्चा के साथ हुई। इस दौरान लेखक ने घोषणा की कि वे अपनी नई किताब में चक्का जाम से आगे की कहानी लिख रहे हैं। ‘चक्का जाम’ बड़े ऐतिहासिक घटनाक्रमों के बीच उलझे आम आदमी के छोटे सपनों और व्यक्ति–समाज के जटिल रिश्तों को रंगून से जे.पी. आंदोलन तक विस्तार में उभारने वाला उपन्यास है।
चर्चा के दौरान लेखक ने कहा, चक्का जाम के प्रकाशन के बाद मुझे कई पाठकों के पत्र आते रहे और लोगों ने कहा कि आप इसके बाद की कहानी ज़रूर लिखें। इस उपन्यास में मैंने आज़ादी के बाद से लेकर 1970 तक की कहानी को दिखाया है, रेलवे क्वार्टर्स में रहते हुए मैंने विविध संस्कृतियों में जो परिवर्तन देखें, उसने भी इस उपन्यास पर प्रभाव डाला था। इस समय खेल की दुनिया में एक बड़ा ट्रांजिशन देखने को मिल रहा है। आज फुटबॉल बाहर जा रहा है और क्रिकेट बाहर से यहाँ आ रहा है। आज युवा द्रविड़ और सचिन तेंदुलकर से प्रेरित होते हैं। मुझे लगता है आने वाला समय खेल का है। मैं इस समय जिस किताब पर काम कर रहा हूँ, वह खेल और 1980 के बाद से खेल संस्कृति में आ रहे परिवर्तन से संबंधित होगी।
दूसरे सत्र में सुपरिचित अर्थशास्त्री संतोष मेहरोत्रा की किताब ‘भारत में ग़रीबी’ का लोकार्पण हुआ। यह किताब आज़ादी के बाद मध्यवर्ग और सामान्य जीवन में आए सुधारों के बावजूद भारत के विकसित देश न बन पाने के मूल कारणों की पड़ताल करती है। चर्चा के दौरान लेखक ने कहा, सरकार पिछले कुछ सालों से एक नैरेटिव गढ़ने की कोशिश में है कि देश में भारी स्तर पर ग़रीबी कम हुई है। जब हम ग़रीबों की बात करते हैं तो यह ज़रूरी हो जाता है कि हम यह तय करें कि ग़रीबी रेखा क्या है? इसके मापदंड क्या है? वह कौन से मानक हैं जिसके आधार पर सरकार यह क्लेम कर रही है कि ग़रीबी में बड़ी गिरावट आई है। ऐसे तमाम कारणों पर विस्तार से बात करते हुए इस पुस्तक में इनके निवारण पर भी विचार किया गया है। यह बात तो सही है कि देश ने बहुत तरक्की कर ली है, लेकिन वे कौन लोग हैं जो पीछे रह गए और क्यों पीछे रह गए, यह किताब इस बात की पड़ताल करती है।
तीसरे सत्र में प्रज्ञा के कहानी-संग्रह ‘दाग़ दाग़ उजाला’ का लोकार्पण हुआ। यह कहानी-संग्रह भूमंडलीकरण और पूँजीवादी व्यवस्था के दबावों से जूझते आम जन-जीवन की व्यथा और जिजीविषा को सशक्त रूप में सामने रखता है। इस मौके पर कथाकार हरियश राय ने कहा कि समकालीन कहानी परिदृश्य में प्रज्ञा एक अलग स्थान रखती हैं। उनकी रचनाओं में प्रखर वैचारिकता और संवेदनशीलता है, जिसके सहारे वे समाज और उसे असंवेदनशील बनाने वाले राजनीतिक सूत्रों को पकड़ती हैं।
उन्होंने कहा कि रचना में विचार एक स्फुलिंग की तरह आता है, जिसे कल्पना नए आयाम देती है। लेखक ने बातचीत में कहा कि उनके लिए लेखन केवल आनंद नहीं, बल्कि एक चुनौतीपूर्ण और जिम्मेदारी भरा कार्य है—अपने समय की बेचैन करने वाली घटनाओं, शब्दों और अदृश्य होती मनुष्यता को पहचानने का प्रयास। स्त्री पात्रों के संदर्भ में उन्होंने कहा कि यथार्थ से जुड़े होने के बावजूद उन्हें कल्पना के रंगों से गढ़ा गया है; उनकी रचनाओं की स्त्रियाँ पितृसत्ता, धर्मसत्ता और राजसत्ता के विरुद्ध संघर्षरत हैं और एक वैकल्पिक दुनिया की आकांक्षा रखती हैं।
चौथे सत्र में बलवन्त कौर की किताब ‘स्मृति और दंश’ पर चर्चा हुई। बातचीत के दौरान लेखक ने कहा, यह बात सही है कि विभाजन धार्मिक आधार पर हुआ लेकिन विभिन्न समुदायों और वर्गों के लिए विभाजन की पीड़ा अलग-अलग रही। इस किताब में जिसे केंद्र में रखा गया है, वह हैं― दलित, स्त्रियाँ और शरणार्थी। विभाजन के समय पुरुषों के पास अधिकार था कि वे चुन सकें कि वह हिंदुस्तान में रहना चाहते हैं या पाकिस्तान में लेकिन स्त्रियों के पास यह अधिकार नहीं था। यदि दलितों की बात करें तो वह एक अलग आइडेंटिटी है लेकिन उसे कभी उस रूप में देखा ही नहीं गया। इसी तरह शरणार्थियों ने जो भोगा और आज इतने वर्षों बाद भी उनकी पहचान शरणार्थी के रूप में ही है।
उन्होंने आगे कहा, इस समय विभाजन से संबंधित साहित्य इसलिए भी पढ़ना चाहिए ताकि हम सजग हो सके और उसके मानवीय पहलुओं को समझ सकें। कहते हैं कि साहित्य हमें अंधेरों से पहचान करना सिखाता है। विभाजन का साहित्य पढ़ते हुए विभाजन के दंश, त्रासदी और पीड़ा से ज़्यादा ज़रूरी है उन लोगों के बारे में सोचना जिन्होंने बचाया था।
अगले सत्र में नेहा दीक्षित की अनूदित किताब ‘कोई एक सईदा’ का लोकार्पण हुआ। यह किताब नए भारत के शहरी जीवन के उस कठोर यथार्थ को सामने लाती है, जो अभिजात तबके की नज़र से ओझल रहता है और उन लाखों अनकही ज़िंदगियों की कहानी कहती है।
किताब के अनुवादक प्रभात सिंह से बातचीत के क्रम में लेखक ने कहा, जब नौकरी के लिए पलायन की बात की जाती है तो आमतौर पर पुरुषों का चेहरा सामने आता है। परंतु स्त्रियाँ भी कामकाज के लिए बड़ी संख्या में पलायन करती हैं। हम जानते हैं कि स्त्रियाँ ज़्यादातर कृषि कार्यों में लगी हुई है लेकिन कृषि के बाद जिस काम में उनकी सबसे बड़ी संख्या है वह इंडस्ट्रियल एरिया है। इंडस्ट्रीज़ में काम करते हुए उन्हें दिहाड़ी का पूरा पैसा भी नहीं मिल पाता है। पुरुषों में एक स्वाभिमान होता है, वह एक राशि से कम पैसे में काम नहीं करते हैं लेकिन समाज में जिस तरह औरतों का विकास हुआ है, उन्हें बग़ैर पैसों के काम करने की आदत है, वे कम पैसे में भी काम करने को तैयार हो जाती है।
कार्यक्रम के छठे सत्र में राकेश तिवारी की किताब का ‘जिरह अजुधिया’ लोकार्पण हुआ। इस किताब में ‘रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद’ की पूरी प्रक्रिया और उससे सम्बन्धित अदालती जिरह का ब्योरेवार विवरण दिया गया है। यह किताब इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जब न्यायालय ने राम मंदिर विवाद को लेकर पुरावशेषों की जाँच का काम पुरातत्त्व विभाग को सौंपा गया, उस समय लेखक विभाग के निदेशक थे।
बातचीत के क्रम में डॉ. बुद्ध रश्मि मणि ने कहा, राम मंदिर विवाद को लेकर इतिहासकारों, पुरातत्ववेत्ताओं, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में हुई बहस साथ ही राकेश तिवारी का अयोध्या से जो संबंध है, उन सबका विवरण इस किताब में है। इस किताब में आपको अयोध्या से संबंधित हर वह जानकारी मिलेगी जो आपको जाननी चाहिए। इसी कड़ी में हेमंत शर्मा ने कहा, अभी तक अयोध्या पर इतिहासकारों ने अपने-अपनी दृष्टियों के अनुसार लिखा है। यह किताब इसलिए विशेष है क्योंकि राकेश तिवारी ने इसे सबूतों और प्रमाणों के आधार पर लिखा है।
चर्चा के दौरान लेखक ने कहा, मुझे इस विवाद से जुड़े पुरावशेषों का डॉक्यूमेंटेशन करके कोर्ट में सबमिट करने का आदेश मिला था। उस समय मैंने यह काम किया लेकिन रिटायर होने के बाद मैंने सोचा कि जो मेरी जिरह है, मैं कैसे अयोध्या को देखता हूँ? किस तरह से सोचता हूँ? यह भी सामने आना चाहिए। मैंने तथ्यों में अपनी तरफ़ से कुछ नहीं जोड़ा है। जो तथ्य थे, उन्हें उसी रूप में समेटकर इस किताब में रखा है।
अगले सत्र में पुष्यमित्र की नई किताब ‘गांधी का सैंतालीस’ का लोकार्पण हुआ। इस मौके पर पुष्पेश पंत और रामशरण जोशी भी उपस्थित रहे। किताब के नाम पर प्रकाश डालते हुए लेखक ने कहा कि 1947 में महात्मा गांधी की चिंता अहिंसा, भाईचारे और देश की आत्मा को बचाने की थी। इस किताब में गांधी का राजनीतिक चरित्र उभरता है और उनसे जुड़े अनेक प्रसंग सामने आते हैं, जिनके ज़रिए गांधी को लेकर चले आ रहे कई विवादों का समाधान किया गया है।
लेखक के अनुसार गांधी ने हमेशा प्रेम, संवाद और शहादत का रास्ता अपनाया; उनके लिए यह किताब इतिहास से अधिक एक ‘मेडिकल साइंस’ की तरह है, जो सुकून देती है। वहीं रामशरण जोशी ने कहा कि मुझे गर्व है कि लेखक मेरे विद्यार्थी रहे हैं और उन्होंने एक बेहतरीन किताब लिखी है। उन्होंने कहा कि यह किताब गांधी की समकालीन प्रासंगिकता पर विचार करती है।
इसके बाद पुष्पेश पंत की किताब ‘नैनीताला नैनीताला’ का लोकार्पण हुआ। इस मौके पर लेखक ने कहा कि मुझे नैनीताल घूमते हुए बार-बार बचपन की यादें आईं। उन्होंने कहा कि इस किताब की खासियत यह है कि यह जीवन के अनेक तौर-तरीकों को सामने लाती है और नैनीताल के इतिहास पर एक विमर्श प्रस्तुत करती है। किताब यह सवाल उठाती है कि क्या सिर्फ पहाड़ का जीवन बदला है या दिल्ली का भी। इस तरह यह एक शहर का समग्र मूल्यांकन करती है। किताब का नाम नैनीताल के एक लोकगीत से लिया गया है; इसके अंशों के पाठ में मौसम, ठंड और गरमी सब एक साथ महसूस होते हैं।
अगले सत्र में सुशील कुमार की किताब ‘साइबर कथाएँ’ का लोकार्पण हुआ। लेखक ने कहा कि वर्षों के अनुभव और देश के विभिन्न हिस्सों में हुई घटनाओं के आधार पर यह किताब लिखी गई है। बढ़ते साइबर अपराध के मद्देनज़र इसमें उनसे बचने के उपायों पर विशेष ज़ोर दिया गया है और अंत में प्रश्नों का एक परिशिष्ट भी जोड़ा गया है, जिससे पाठक सजग हो सकें। एक कहानी का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि किताब का उद्देश्य पाठकों को जागरूक करने के साथ साहित्यिक आनंद भी देना है। उन्होंने बताया कि बिहार में एक महीने में ही तेरह लाख साइबर अपराध से जुड़ी कॉल दर्ज हुई हैं; तकनीकी रूप से आगे युवाओं के साथ सोशल मीडिया से जुड़े फ्रॉड बढ़ रहे हैं, इसलिए सतर्क रहना ज़रूरी है।
अंतिम सत्र में उमेश पंत की किताब ‘छानी ख़रीकों में’ का लोकार्पण हुआ। लेखक ने बताया कि इसमें उत्तराखंड में दस वर्षों में एक बार होने वाली दुर्लभ यात्रा के अनुभव दर्ज हैं। इस यात्रा के दौरान मैंने लोगों, पर्यावरण और समाज में हो रहे बदलावों को करीब से देखा। उन्होंने कहा कि यात्रा में सुख-दुख और कठिनाइयों से गुजरते हुए ही सीख संभव होती है; आज सुविधाजनक बना दी गई यात्राएँ इस अनुभव को सीमित कर देती हैं। किताब के नाम के बारे में उन्होंने बताया कि पहाड़ों में पशुओं के रहने के स्थान को ‘छानी-ख़रीक’ कहा जाता है, वहीं से यह नाम लिया गया है। लेखक के अनुसार यात्रा ने यह बोध कराया कि डर और इच्छाएँ व्यक्तिगत नहीं, साझा होती हैं और हर कोई सहयात्री चाहता है। किताब पहाड़ों में जीवन की कठिनाइयों, वहाँ की भाषा-संस्कृति और शब्द-परंपरा को सामने लाते हुए पाठकों को पहाड़ों की ओर एक भावनात्मक दृष्टि देती है।
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