AI भी जातिवादी? पुस्तक विमोचन पर डॉ. विजेंद्र चौहान की स्पीच के बाद 'एल्गोरिदम बायस' पर क्यों मच रहा है बवाल

"केवल कुलपतियों, ब्यूरोक्रेट्स, मुख्यमंत्रियों और प्रधानमंत्रियों से नहीं – एल्गोरिदम बायस से भी जंग"
डॉ. चौहान ने अपने वक्तव्य में AI तकनीक को जाति व्यवस्था से जोड़ते हुए कहा, "चैटजीपीटी जैसे टूल 'बायस्ड' हैं। उनके क्रिएटर्स और ट्रेनर्स सवर्ण हैं, इसलिए डेटा भी सवर्णवादी नजरिए से भरा है।
डॉ. चौहान ने अपने वक्तव्य में AI तकनीक को जाति व्यवस्था से जोड़ते हुए कहा, "चैटजीपीटी जैसे टूल 'बायस्ड' हैं। उनके क्रिएटर्स और ट्रेनर्स सवर्ण हैं, इसलिए डेटा भी सवर्णवादी नजरिए से भरा है।सोशल मीडिया
Published on

नई दिल्ली – सोशल मीडिया पर 'AI भी जातिवादी है' वाली बहस ने अचानक जोर पकड़ लिया है। प्रमुख सामाजिक न्याय कार्यकर्ता और शिक्षाविद् डॉ. विजेंद्र सिंह चौहान ने बेस्टसेलर किताब 'प्रोफेसर की डायरी' के लेखक प्रो लक्ष्मण यादव की नई किताब " 'जाति जनगणना' " के विमोचन समारोह में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) टूल चैटजीपीटी को 'सवर्ण' बताते हुए इसके डेटा बायस पर सवाल उठाए, तो भाजपा-संघ समर्थक ट्रोल्स ने इसे मजाक उड़ाने का मौका तलाश लिया।

लेकिन यह विवाद महज एक वायरल क्लिप से आगे बढ़ चुका है – यह जाति जनगणना, तकनीकी दुनिया में सामाजिक असमानता और राजनीतिक दमन की गहरी पड़ताल का रूप ले चुका है। डॉ. चौहान की पूरी स्पीच सुनाए बिना ट्रोलिंग का शिकार बनाए जाने पर समर्थक इसे जातिवादी मानसिकता और 'राज्य की दमनकारी राजनीति' का हथियार करार दे रहे हैं।

14 साल से सामाजिक न्याय आंदोलन से जुड़े डॉ. चौहान की पृष्ठभूमि दिलचस्प है। दिल्ली विश्वविद्यालय से पीएचडी, चौहान सवर्ण होते हुए भी बहुजन मुद्दों पर मुखर रहे हैं।

यूँ हुई विवाद की शुरुआत

सब कुछ शुरू हुआ 17 जनवरी को दिल्ली में आयोजित एक साहित्यिक समारोह से जहाँ लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ लक्ष्मण यादव की नई किताब 'जाति जनगणना' के विमोचन में मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. विजेंद्र सिंह चौहान ने उदबोधन दिया। यह किताब भारत में जाति-आधारित जनगणना की आवश्यकता, आरक्षण नीति और सामाजिक न्याय पर केंद्रित है, जो वर्तमान राजनीतिक माहौल में एक संवेदनशील विषय है।

डॉ. चौहान, जो स्वयं एक सवर्ण पृष्ठभूमि से आते हैं, ने अपने 14 मिनट के वक्तव्य में AI तकनीक को जाति व्यवस्था से जोड़ते हुए कहा, "चैटजीपीटी जैसे टूल 'बायस्ड' हैं। उनके क्रिएटर्स और ट्रेनर्स सवर्ण हैं, इसलिए डेटा भी सवर्णवादी नजरिए से भरा है। अगर तकनीकी दुनिया की जाति जनगणना हो, तो 'न्यूट्रल टेक्नोलॉजी' का मिथक टूट जाएगा।" उन्होंने उदाहरण दिया कि AI मॉडल इंटरनेट डेटा पर ट्रेन होते हैं, जहां इतिहास, साहित्य और सामाजिक विज्ञान का अधिकांश कंटेंट ऊपरी जातियों के वर्चस्व में है – जैसे मनुस्मृति को 'प्राचीन कानून' के रूप में ग्लोरिफाई करना। उन्होंने कहा कि जातिवादी सोच के विरुद्ध केवल कुलपतियों, ब्यूरोक्रेट्स, मुख्यमंत्रियों और प्रधानमंत्री से ही लड़ाई नहीं है– एल्गोरिदम बायस से भी जंग लड़नी होगी।"

एक छोटी क्लिप से फैलाई गफलत

यह बयान किताब के संदर्भ में था, जहां लेखक ने तर्क दिया कि जाति जनगणना न केवल सामाजिक न्याय के लिए जरूरी है, बल्कि डिजिटल दुनिया में भी 'जातिगत बायस' को उजागर करने का हथियार बन सकती है। लेकिन ट्रोल्स ने भाषण के महज 5-6 सेकंड की एक क्लिप काट ली– जिसमें चौहान का 'चैटजीपीटी सवर्ण है' वाला हिस्सा हाइलाइट था – और इसे 'बकवास' या 'नर्सरी लेवल लॉजिक' बताकर वायरल कर दिया। एक ट्रोल पोस्ट में लिखा गया, "नाम: चैटजीपीटी, जाति: जनरल (सवर्ण), खोजकर्ता: विजेंद्र सिंह चौहान।" इस क्लिप को हजारों रीपोस्ट्स मिले, और #SavarnaAI जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे।

ट्रोलिंग का केंद्र बिंदु भाजपा-आरएसएस समर्थक यूजर्स बने, जो जाति जनगणना और आरक्षण के कट्टर विरोधी माने जाते हैं। डॉ. लक्ष्मण यादव ने इसे 'राजनीतिक बदनीयती' करार देते हुए एक विस्तृत पोस्ट साझा की। उन्होंने लिखा, "क्लिप काटना आज महज ट्रोलिंग नहीं, राज्य की दमनकारी राजनीति का हथियार है, जिससे डर, धमकी और मुकदमे खड़े किए जाते हैं।" यादव ने खुलासा किया, "मैं उनके साथ 14 साल काम कर चुका हूं। ऐसे सवर्णों की देश को जरूरत है, तभी विश्वगुरु बनेगा।"

यादव ने डॉ. चौहान को 'सवर्ण होते हुए भी हिम्मत रखने वाला' बताया और कहा कि ऐसे लोग साबित करते हैं कि समस्या 'जाति' नहीं, 'जातिवादी सत्ता' है। इस पोस्ट को 1,600 से ज्यादा लाइक्स और 50,000 व्यूज मिले, साथ ही पूरे भाषण का वीडियो भी शेयर किया गया।

ट्रोल्स पर हमला बोलते हुए सोशलिस्ट ए.के. स्टालिन ने इसे 'डिजिटल लिंचिंग' कहा। उन्होंने पोस्ट किया, "AI में कास्ट बायस पर दर्जनों पीयर-रिव्यूड रिसर्च पेपर हैं। बिना पढ़े विद्वान के खिलाफ भीड़ खड़ी करना बौद्धिक दिवालियापन है।" स्टालिन ने अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों का हवाला दिया, जहां 'नेचर' जर्नल में प्रकाशित एक पेपर ने साबित किया कि AI सामाजिक पदानुक्रमों को दोहराता है। इसी तरह, लखन मीणा जैसे कार्यकर्ताओं ने समर्थन में लिखा, "डॉ. चौहान 100% सही हैं। AI डेटा मनुवादी है, इसलिए जवाब भी मनुवादी।"

ट्रोलिंग के पीछे राजनीतिक मकसद साफ दिखता है। जाति जनगणना की मांग तेज होने के बीच विपक्षी दल इसे चुनावी मुद्दा बना रहे हैं। ट्रोल्स का दावा है कि चौहान का बयान 'वोटबैंक पॉलिटिक्स' का हिस्सा है, लेकिन समर्थक इसे 'सच बोलने की हिम्मत' बता रहे हैं। एक पोस्ट में लिखा गया, "संघी ट्रोल्स इस बहस के काबिल ही नहीं। उनका वैचारिक बहिष्कार जरूरी है।"

सीनियर साइंटिस्ट संतोष यादव ने 'नेचर' जर्नल का हवाला देकर लिखा, "AI बायस वैज्ञानिक तथ्य है। जल्दबाजी में टिप्पणी न करें।" ट्रोल पोस्ट्स पर काउंटर-ट्रोलिंग तेज हो गई, जहां यूजर्स पूछ रहे हैं, "चैटजीपीटी से पूछो – ब्राह्मण मुंह से कैसे पैदा होते हैं? पहले मनुस्मृति कोट करेगा, फिर साइंस!"

डॉ. चौहान ने अपने वक्तव्य में AI तकनीक को जाति व्यवस्था से जोड़ते हुए कहा, "चैटजीपीटी जैसे टूल 'बायस्ड' हैं। उनके क्रिएटर्स और ट्रेनर्स सवर्ण हैं, इसलिए डेटा भी सवर्णवादी नजरिए से भरा है।
UP में रविदास जयंती आयोजनों पर अनुमति न दिए जाने की अटकलें: सांसद चंद्रशेखर ने कहा- ये बहुजन समाज का अपमान!
डॉ. चौहान ने अपने वक्तव्य में AI तकनीक को जाति व्यवस्था से जोड़ते हुए कहा, "चैटजीपीटी जैसे टूल 'बायस्ड' हैं। उनके क्रिएटर्स और ट्रेनर्स सवर्ण हैं, इसलिए डेटा भी सवर्णवादी नजरिए से भरा है।
14 साल के 'बाल पत्रकार' पर सरकार से सवाल पूछने का 'अपराध': सोशल मीडिया पर क्यों ट्रेंड हो रहा अश्वमित गौतम?

द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.

The Mooknayak - आवाज़ आपकी
www.themooknayak.com