पुण्यतिथि विशेष | रमाई और सविता: एक ने गरीबी में गढ़ा, दूसरी ने बीमारी में थामा! इनके बिना कौन होते बाबासाहेब?

मई का यह सप्ताह बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के जीवन की दो सबसे अहम स्त्रियों की याद दिलाता है- रमाबाई आंबेडकर, जिनकी पुण्यतिथि 27 मई को है, और सविता आंबेडकर, जिनकी पुण्यतिथि 29 मई को। बाबासाहेब की ये दोनों जीवन-संगिनियाँ भले ही अलग-अलग युगों और पृष्ठभूमियों से आई थीं, लेकिन दोनों ने एक ही काम किया- उस महान इंसान को थामे रखा, जो करोड़ों वंचितों की आवाज़ बनने वाला था।
इस पुण्यतिथि सप्ताह पर, हम याद करते हैं उन दो हमसफ़रों को जिनके बिना 'डॉ. आंबेडकर' का इतिहास अधूरा है।
इस पुण्यतिथि सप्ताह पर, हम याद करते हैं उन दो हमसफ़रों को जिनके बिना 'डॉ. आंबेडकर' का इतिहास अधूरा है।
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इतिहास के पन्नों में डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर का नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज है: संविधान के शिल्पी, दलित आंदोलन के सूर्य, और सामाजिक न्याय के महानायक। लेकिन इस महानायक के जीवन की असली नींव में दो ऐसी स्त्रियाँ थीं जिनका नाम इतिहास में उतनी रोशनी नहीं पाता जितना वे हकदार हैं - रमाबाई आंबेडकर (रमाई) और सविता आंबेडकर (माई साहब)। बाबासाहेब की ये दो जीवन-संगिनियाँ - एक ने उनके संघर्ष के पहले दौर में अपना सब कुछ होम कर दिया, दूसरी ने उनके अंतिम और सर्वाधिक रचनात्मक वर्षों में उनकी देह और आत्मा दोनों को थामे रखा।

रमाबाई का जन्म महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के पास दापोली के निकट एक दलित परिवार में हुआ था। उनके पिता भिकू धोत्रे दाभोल बंदरगाह से मछलियाँ बाजार ढोकर जीवन-यापन करते थे। माँ-बाप की जल्दी मृत्यु के बाद वे अपने चाचा के साथ मुंबई आ गईं। 1906 में महज नौ साल की उम्र में उनकी शादी 15 साल के भीमराव से मुंबई में हुई।

रमाई अपने पति को प्यार से "साहेब" कहती थीं, और बाबासाहेब उन्हें "रामू" पुकारते थे। यह सम्बन्ध सिर्फ़ वैवाहिक नहीं था, यह एक ऐसी साझेदारी थी जिसमें रमाई ने खुद को पूरी तरह उड़ेल दिया। जब बाबासाहेब उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका और लंदन गए, तब घर में जो भूख और अभाव था, वह रमाई ने अकेले सहा। वे नहीं चाहती थीं कि पति की पढ़ाई बाधित हो। रात के अँधेरे में वे पड़ोसियों की नज़र से बचकर यशवंत को लेकर लकड़ी लेने जाती थीं, और जब रोटी के लिए भी दाने नहीं होते थे, तो वोरली में जाकर गोबर के उपले बनाती थीं।

रमाई के जीवन की सबसे गहरी पीड़ा थी उनके बच्चों की मृत्यु। पाँच संतानों में से केवल यशवंत ही जीवित रह सके। गंगाधर, रमेश, इन्दु और राजरत्न एक-एक करके सबने माँ की गोद में दम तोड़ा। गरीबी, कुपोषण और अपर्याप्त चिकित्सा ने इन मासूमों को छीन लिया। बाबासाहेब का प्रिय पुत्र राजरत्न मात्र एक वर्ष की आयु में निमोनिया से चल बसा, यह घाव कभी भरा नहीं। फिर भी रमाई टूटी नहीं। उन्होंने अपना दुख अपने पति को जानने नहीं दिया।

जब बाबासाहेब के साथी दलित छात्रों के लिए खाने का इन्तजाम मुश्किल हुआ, रमाई ने अपने गहने गिरवी रखने की पेशकश की। जब 1930 के आसपास मुंबई में 'राजगृह' बनाने के लिए पैसे नहीं थे, तब भी उन्होंने अपने आभूषण बेच दिए। पंढरपुर की तीर्थयात्रा उनकी गहरी इच्छा थी पर जाति के कारण मंदिर में प्रवेश वर्जित था। इस अपमान ने बाबासाहेब को तड़पा दिया और उन्होंने प्रतिज्ञा ली कि वे रमाई के लिए एक नया पंढरपुर बनाएँगे- यही संकल्प आगे चलकर बौद्ध धर्म की दीक्षा का बीज बना।

27 मई 1935 को, दादर के हिन्दू कॉलोनी स्थित राजगृह में, रमाई ने अंतिम साँस ली। वे मात्र 37 वर्ष की थीं। बाबासाहेब ने उनके अंतिम संस्कार में हरे की जगह उनकी प्रिय सफेद साड़ी पहनाई। उस रात वे अपने कमरे में बंद होकर फूट-फूटकर रोए। बाद में उन्होंने अपनी किताब Thoughts on Pakistan (1941) रमाई को ही समर्पित की और प्रस्तावना में लिखा कि रमाई ने ही एक साधारण भीम को 'डॉ. आंबेडकर' बनाया।

रमाई ने अपनी भूख, अपने बच्चों का शोक, अपने अरमान सब कुछ इस महामिशन में समाहित कर दिए। सविता ने अपना ब्राह्मण परिचय, अपना करियर, अपनी व्यक्तिगत पहचान सब कुछ 'सविता आंबेडकर' नाम में ढाल दिया और अंत तक उस विरासत की रक्षा करती रहीं।

सविता का वास्तविक नाम शारदा कृष्णराव कबीर था। वे रत्नागिरी जिले के दोरला गाँव की एक सारस्वत ब्राह्मण परिवार की सुशिक्षित महिला थीं। उनके पिता भारतीय चिकित्सा परिषद के रजिस्ट्रार थे। पुणे में प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने मुंबई के ग्रांट मेडिकल कॉलेज से MBBS किया और गुजरात के एक अस्पताल में मुख्य चिकित्सा अधिकारी के रूप में कार्य किया।

सन् 1947 में, जब बाबासाहेब संविधान निर्माण के महाकार्य में लगे थे, उनका स्वास्थ्य गंभीर रूप से बिगड़ रहा था- मधुमेह, उच्च रक्तचाप और न्यूरोपैथी ने उन्हें जर्जर कर दिया था। मुंबई में उपचार के दौरान उनकी भेंट शारदा कबीर से हुई। उपचार के क्रम में दोनों में मित्रता हुई, बौद्ध दर्शन के प्रति समान अनुराग ने इस सम्बन्ध को और गहरा किया। 40-50 पत्रों के आदान-प्रदान के बाद, बाबासाहेब ने विवाह का प्रस्ताव रखा।

15 अप्रैल 1948 को दोनों ने नई दिल्ली में विवाह कर लिया। उस समय बाबासाहेब 57 वर्ष के थे और शारदा 39 की। विवाह के बाद शारदा ने अपना नाम बदलकर सविता आंबेडकर रख लिया। जाति-भेद की दीवारों के बावजूद एक ब्राह्मण महिला का एक दलित नेता से विवाह- सविता ने बिना हिचकिचाए यह क़दम उठाया।

सविता ने बाबासाहेब की देखभाल को एक मिशन की तरह लिया। वे उनके भोजन में औषधीय गुण ध्यान में रखकर खाना बनाती थीं, योगासन सिखाए, तेल मालिश की, अनावश्यक मुलाकातें रोकीं ताकि वे आराम कर सकें। The Buddha and His Dhamma की अप्रकाशित प्रस्तावना में बाबासाहेब ने लिखा कि सविता और उनके निजी चिकित्सक डॉ. मालवणकर ने उनके जीवन को आठ से दस वर्ष बढ़ाया। यह प्रस्तावना बाद में बाबासाहेब के कुछ राजनीतिक अनुयायियों ने हटा दी पर भगवान दास ने इसे 'दुर्लभ प्रस्तावना' के रूप में प्रकाशित किया।

14 अक्तूबर 1956 को नागपुर की दीक्षाभूमि पर जब बाबासाहेब ने बौद्ध धर्म अपनाया, तो सविता उनके साथ थीं। 6 लाख से अधिक अनुयायियों के उस ऐतिहासिक धर्मांतरण की साक्षी वही थीं। उसी वर्ष 6 दिसम्बर 1956 को बाबासाहेब का महापरिनिर्वाण हुआ: The Buddha and His Dhamma के पन्नों पर अभी स्याही भी नहीं सूखी थी।

पति की मृत्यु के बाद कुछ अनुयायियों ने सविता को अपमानित किया, षड्यंत्र रचे और उन्हें कोने में धकेला। पर सविता चुप नहीं रहीं। उन्होंने 1970 में सार्वजनिक जीवन में वापसी की, दलित-बौद्ध आंदोलन में भाषण दिए, पुणे में बाबासाहेब का संग्रहालय बनवाने में अहम भूमिका निभाई, उनकी निजी वस्तुएँ — वायलिन, चाँदी के फ्रेम वाला चश्मा, भारत रत्न पदक संरक्षित कराईं। उनकी आत्मकथा 'डॉ. आंबेडकरांच्या सहवासात' पहली बार 1990 में मराठी में प्रकाशित हुई, जो बाद में अंग्रेजी में 'Babasaheb: My Life With Dr Ambedkar' के रूप में आई। 29 मई 2003 को 94 साल की उम्र में मुंबई के जे.जे. हॉस्पिटल में उनका निधन हो गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें बाबासाहेब की "प्रमुख प्रेरणा" और "अपने आप में एक महान समाजसेवी" कहा।

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भिन्न परिस्थितियाँ, समान समर्पण

रमाई और सविता दोनों के जीवन की परिस्थितियाँ अलग थीं, पर दोनों का समर्पण एक था। रमाई ने अपनी गरीबी में बाबासाहेब को सींचा, और सविता ने अपनी बौद्धिक सम्पन्नता से उनके अंतिम वर्षों को उर्वर बनाया। रमाई के पास न साधन थे, न शिक्षा, न सामाजिक स्वतंत्रता फिर भी उन्होंने वह किया जो इतिहास के किसी भी महान पुरुष के पीछे की महान स्त्री ने किया। सविता के पास शिक्षा थी, व्यवसाय था, स्वतंत्र अस्तित्व था उन्होंने यह सब स्वेच्छा से एक बड़े मिशन के लिए अर्पित किया।

एक विरोधाभास यह भी है कि जहाँ रमाई को लोक-मानस में 'रमाई' और 'माता' का दर्जा मिला, वहीं सविता को उनके पति के कुछ अनुयायियों ने ही अपमानित किया, उन्हें 'बाहरी' और 'ब्राह्मण' कहकर षड्यंत्रपूर्वक हाशिए पर धकेला गया। यह विडम्बना बाबासाहेब के उस सन्देश का उल्लंघन था जिसमें उन्होंने जाति और पूर्वग्रह से ऊपर उठकर मनुष्य को देखने की शिक्षा दी थी।

दोनों महिलाओं में एक गहरी समानता यह थी कि दोनों ने स्वयं को मिटाकर एक विचार को जीवित रखा। रमाई ने अपनी भूख, अपने बच्चों का शोक, अपने अरमान सब कुछ इस महामिशन में समाहित कर दिए। सविता ने अपना ब्राह्मण परिचय, अपना करियर, अपनी व्यक्तिगत पहचान सब कुछ 'सविता आंबेडकर' नाम में ढाल दिया और अंत तक उस विरासत की रक्षा करती रहीं।

Summary

जब हम बाबासाहेब को याद करते हैं, तो रमाई और सविता दोनों को भी उसी श्रद्धा और आदर के साथ याद करना चाहिए। रमाई बिना किसी मान्यता की माँग किए, चुपचाप एक क्रांति की धुरी बनीं। सविता ने एक बुझते हुए दीपक को जीवित रखा और उस रोशनी को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाया।

मई के इन दो पुण्य दिवसों पर 27 और 29 को हम न केवल उनकी स्मृति में नतमस्तक होते हैं, बल्कि यह संकल्प भी लेते हैं कि इतिहास उन्हें वह स्थान दे जिसकी वे हकदार हैं: हाशिए पर नहीं, केन्द्र में।

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