10 वर्ष पहले बाबासाहब के ऐतिहासिक बुद्ध भूषण प्रेस को तोड़ा गया, बॉम्बे हाईकोर्ट ने पुलिस को दी खरी-खरी | पढ़िए पूरा मामला

“शॉकिंग” हलफनामे पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने पुलिस के हलफनामे पर जताई तीखी नाराजगी
अगली सुनवाई 15 जून 2026 को निर्धारित की गई है।
हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि पुलिस आयुक्त स्वयं विस्तृत हलफनामा दाखिल करें, किसी अधीनस्थ अधिकारी को यह अधिकार न सौंपें।
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मुंबई- बॉम्बे हाईकोर्ट ने दादर स्थित ऐतिहासिक बुद्ध भूषण प्रिंटिंग प्रेस के अवैध ध्वंस मामले में पुलिस के रवैये पर गहरी नाराज़गी जाहिर करते हुए मुंबई के पुलिस आयुक्त को व्यक्तिगत रूप से विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। जस्टिस ए.एस. गडकरी और जस्टिस कमल खाता की खंडपीठ ने यह आदेश 30 अप्रैल को सुनाया।

जस्टिस ए.एस. गडकरी और जस्टिस कमल खाता ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि “यह गहराई से परेशान करने वाला है... पुलिस द्वारा शिकायतकर्ताओं के साथ जो व्यवहार किया गया, वह सोचने योग्य भी नहीं है।” कोर्ट ने कहा कि आधी रात (12 बजे से सुबह 7 बजे तक) किसी इमारत को तोड़ने का काम सामान्यतः नहीं होता।

हाईकोर्ट ने पुलिस की ओर से दाखिल हलफनामे को “शॉकिंग” बताया। हलफनामे में सामान्य इनकार वाले वाक्यों का इस्तेमाल किया गया था। कोर्ट ने टिप्पणी की, “पुलिस अधिकारियों द्वारा शिकायतकर्ताओं से दस्तावेज मांगने का रवैया बुनियादी कानूनी सिद्धांतों के विपरीत है।”

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने 1930 में अपनी निजी संपत्ति से दो प्लॉट खरीदे थे। 1945 में उन्होंने एक भूखंड पर एक ट्रस्ट बनाया, इस भूखंड में तीन इमारतें थीं। एक इमारत में बुद्ध भूषण प्रिंटिंग प्रेस नामक मुद्रण प्रेस थी। दूसरी इमारत में यशोधा संगणक केंद्र और अन्य कार्यालय चल रहे थे और तीसरी इमारत डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर भवन थी। याचिकाकर्ता के मुताबिक ट्रस्ट के न्यासियों के बीच आपसी विवाद थे। वे न केवल एक-दूसरे के विरुद्ध कार्य कर रहे थे, बल्कि ट्रस्ट के उद्देश्य के भी विरुद्ध कार्य कर रहे थे। झूठी संरचनात्मक लेखापरीक्षा रिपोर्ट की आड़ में प्रतिवादी संख्या 1 से 7 ने बीएमसी को एमएमसी अधिनियम की धारा 354 के तहत नोटिस जारी करने के लिए उकसाया, जिसमें कहा गया था कि भवन जर्जर अवस्था में है।

25 जून 2016 की आधी रात को सातों प्रतिवादीगण और 300-400 अज्ञात लोगों ने भारी मशीनरी, बुलडोजर और अर्थमूवर लेकर प्रेस को तोड़ दिया। प्रेस के साथ ही यशोधरा संगणक केंद्र, डॉ. आंबेडकर भवन भी प्रभावित हुए। डॉ. आंबेडकर द्वारा खरीदी गई मशीनें, पंचशील ध्वज, उनके हाथ से लिखे दस्तावेज और बहुमूल्य पांडुलिपियां चोरी या नष्ट हो गईं।

याचिकाकर्ता और बाबा साहब के पौत्र प्रकाश यशवंत आंबेडकर ने बताया कि उनके भाई आनंद आंबेडकर ने घटना के समय भोईवाड़ा पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराने की कोशिश की, लेकिन डीसीपी जोन-4 ने न केवल शिकायत लेने से इनकार किया बल्कि उन्हें जेल भेजने की धमकी भी दी।

तोड़फोड़ में डॉ. बी.आर. अंबेडकर द्वारा खरीदी गई मशीनें, "पंचशील ध्वज", अलमारियाँ, बाबा साहब के हस्तलिखित दस्तावेज और 1910 से 1956 तक सामाजिक अधिकारों के एकीकरण से संबंधित दुर्लभ पांडुलिपियाँ थीं, सब चोरी कर ली गईं या नष्ट कर दी गईं।

पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल

परिसर में सो रहे चार व्यक्तियों ने आधी रात को याचिकाकर्ता के भाई आनंद अंबेडकर को सूचित किया। वे तत्काल भोईवाड़ा पुलिस थाने पहुँचे, लेकिन प्रतिवादी संख्या 10, डीसीपी ज़ोन-IV ने न केवल शिकायत दर्ज करने से इनकार किया, बल्कि उन्हें जेल भेजने की धमकी भी दी और पुलिस बल भेजने से मना कर दिया। जब तक आनंद अंबेडकर वापस पहुँचे, इमारत को ध्वस्त किया जा चुका था।

याचिकाकर्ता ने 25 जून 2016 को दोपहर 1 बजे 7 आरोपियों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कराई। सातवे आरोपी ने अगले दिन एक टेलीविजन साक्षात्कार में इस पूरी कार्रवाई की जिम्मेदारी ली।

सहायक पुलिस आयुक्त द्वारा 28 अप्रैल 2026 को दाखिल हलफनामे पर खंडपीठ ने कड़ी नाराज़गी जताई। कोर्ट ने कहा:

"यह हलफनामा पढ़कर गहरा दुख होता है। पुलिस का जो रवैया रहा, उसकी धृष्टता और तरीके से हम स्तब्ध हैं। आधी रात से सुबह 7 बजे के बीच बीएमसी या किसी भी प्राधिकरण द्वारा ध्वंस कार्य किया जाना दुर्लभ, यदि अभूतपूर्व नहीं, तो है। घटनास्थल पर जाकर इस प्रतीत होने वाले अवैध ध्वंस को रोकने के बजाय, पुलिस की ओर से स्पष्ट निष्क्रियता रही। इस चूक को स्वीकार करने के बजाय, कानून के मूल सिद्धांतों के विपरीत रुख अपनाकर इसे उचित ठहराने का प्रयास किया गया।"

कोर्ट ने यह भी कहा कि हलफनामे के पैराग्राफ 4 में यह दर्ज करना कि थाने में उपस्थित एपीआई ने शिकायतकर्ताओं से ध्वंस रोकने के लिए दस्तावेज प्रस्तुत करने को कहा और दस्तावेज न होने पर पुलिस ने कोई कदम नहीं उठाया, यह रुख कानून के बुनियादी सिद्धांतों के विपरीत है।

कोर्ट ने कहा, “पुलिस की निष्क्रियता स्पष्ट है। इसके बजाय हलफनामे में इसे न्यायोचित ठहराने की कोशिश की गई है।” कोर्ट ने आगे कहा कि “400-500 लोगों की भीड़ के इकट्ठा होने की खबर इंटेलिजेंस विभाग को होनी चाहिए थी। अगर लोकल पुलिस को इंटेलिजेंस रिपोर्ट मिली थी तो उन्होंने क्या कदम उठाए?”

कोर्ट ने दिया ये आदेश

खंडपीठ ने निम्नलिखित आदेश पारित किए:

पुलिस आयुक्त को निर्देश:

  • पुलिस आयुक्त स्वयं विस्तृत हलफनामा दाखिल करें, किसी अधीनस्थ अधिकारी को यह अधिकार न सौंपें।

  • हलफनामा दाखिल करने से पहले जाँच एजेंसियों द्वारा एकत्र संपूर्ण सामग्री का अवलोकन करें।

  • 25 जून 2016 को भोईवाड़ा पुलिस थाने में ड्यूटी पर तैनात अधिकारियों के नाम प्रकट करें।

  • यह स्पष्ट करें कि जब 24-25 जून 2016 की रात लगभग 400 व्यक्तियों की भीड़ घटनास्थल पर एकत्र हुई, तब खुफिया विभाग सक्रिय था या नहीं।

  • यह भी बताएं कि स्थानीय पुलिस को इस भीड़ के संबंध में खुफिया जानकारी मिली थी या नहीं, और यदि मिली थी तो क्या कदम उठाए गए।

  • यह हलफनामा छह सप्ताह के भीतर दाखिल किया जाए।

बीएमसी आयुक्त को निर्देश:

  • बीएमसी आयुक्त को प्रतिवादी संख्या 14 के रूप में पक्षकार बनाया गया।

  • वे हलफनामे में स्पष्ट करें कि क्या आरोपियों को ध्वंस/कब्जे की अनुमति दी गई थी।

  • क्या मुंबई में रात 12 बजे से सुबह 6 बजे के बीच ध्वंस कार्य की अनुमति दी जाती है, या यह कोई अपवाद था।

  • क्या प्रतिवादी संख्या 1 से 7 ने 400-500 व्यक्तियों की सहायता लेने की भी सूचना दी थी।

वरिष्ठ अधिवक्ता मनेशिंदे ने कोर्ट को बताया कि आरोपी व्यक्तियों ने पुलिस विभाग को पहले ही सूचित कर दिया था कि वे 23 जून 2016 की रात संबंधित संपत्ति पर कब्जा लेंगे। अगली सुनवाई 15 जून 2026 को निर्धारित की गई है।

अगली सुनवाई 15 जून 2026 को निर्धारित की गई है।
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