
नई दिल्ली: नरेगा संघर्ष मोर्चा और जॉइंट प्लेटफॉर्म फॉर एग्रीकल्चरल एंड रूरल वर्कर्स यूनियन्स ने बुधवार को एक बड़ा ऐलान किया है। इन मजदूर संगठनों ने आगामी 1 जुलाई से पूरे देश में अनिश्चितकालीन विरोध प्रदर्शन शुरू करने की घोषणा की है। यह आंदोलन केंद्र सरकार की नई योजना 'विकसित भारत-रोजगार एवं आजीविका मिशन गारंटी (ग्रामीण)' यानी VB-G RAM G को वापस लेने की मांग को लेकर किया जा रहा है।
गौरतलब है कि साल 2006 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार द्वारा शुरू किए गए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) को अब समाप्त किया जा रहा है। इसकी जगह पर 1 जुलाई से यह नई VB-G RAM G योजना देश भर में लागू हो जाएगी।
नई दिल्ली में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान संगठनों ने सरकार के उन दावों को सिरे से खारिज कर दिया, जिनमें कहा गया था कि नई योजना के तहत ग्रामीण परिवारों के लिए गारंटीकृत कार्य दिवस 100 से बढ़ाकर 125 कर दिए जाएंगे। हालिया बजटीय आवंटन का हवाला देते हुए कार्यकर्ताओं ने बताया कि मौजूदा फंड के हिसाब से किसी भी वित्तीय वर्ष में बेहतर से बेहतर स्थिति में भी अधिकतम 42 दिन का ही काम मिल सकेगा।
मजदूर यूनियनों ने स्पष्ट किया है कि जब तक इस नए प्रस्तावित कानून को पूरी तरह से रद्द नहीं किया जाता, तब तक उनका यह विरोध प्रदर्शन रुकने वाला नहीं है। कार्यकर्ताओं के मुताबिक, इस आंदोलन को विकेंद्रीकृत तरीके से संचालित किया जाएगा और मुख्य रूप से पंचायत स्तर पर इसका आयोजन होगा।
बीते 9 जून को केंद्र द्वारा घोषित प्रस्तावित अंतरिम आवंटन के विश्लेषण से एक बड़ी खामी उजागर हुई है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार द्वारा किए गए 125 दिनों के रोजगार के वादे और वास्तविक रूप से पैदा होने वाले रोजगार के बीच एक भारी अंतर है। बड़े राज्यों के आंकड़ों पर नजर डालें तो प्रति सक्रिय जॉब कार्ड बहुत ही कम कार्य दिवसों का समर्थन मिलेगा। इनमें आंध्र प्रदेश में 42.35 दिन, छत्तीसगढ़ में 39.07, बिहार में 30.94, कर्नाटक में 26.44, मध्य प्रदेश में 25.66, उत्तर प्रदेश में 27.50, महाराष्ट्र में 14.40 और हरियाणा में महज 13.78 दिन के काम का ही बजट मौजूद है।
नरेगा संघर्ष मोर्चा के निखिल डे ने बताया कि VB-G RAM G के मसौदा नियमों के तहत राज्यों को कार्यक्रम की कुल लागत का 40 प्रतिशत हिस्सा खुद वहन करना होगा। यह शर्त राज्य सरकारों पर एक अभूतपूर्व और भारी आर्थिक बोझ डालेगी। संगठनों का दावा है कि किसी भी बड़े राज्य के पास इतना बजट आवंटन नहीं है कि वे वादे के मुताबिक 125 दिनों का आधा हिस्सा भी रोजगार मुहैया करा सकें।
इस प्रस्तावित गारंटी को पूरा करने के लिए राज्यों को भारी अतिरिक्त धन की आवश्यकता होगी, जो इस योजना की फंडिंग में भारी कमी को भी दर्शाता है। अनुमानों के अनुसार, उत्तर प्रदेश को 27,987 करोड़ रुपये, महाराष्ट्र को 31,013 करोड़ रुपये, राजस्थान को 22,549 करोड़ रुपये और तमिलनाडु को 27,212 करोड़ रुपये के अतिरिक्त फंड की जरूरत पड़ेगी।
सरकार ने 22 मई को इस नई योजना के मसौदा नियम जारी किए थे और इस पर प्रतिक्रिया देने के लिए 20 जून तक का समय दिया है। ग्रामीण विकास मंत्रालय को भेजे जाने वाले फीडबैक की जानकारी देते हुए निखिल डे ने कहा कि उनकी पहली मांग यही है कि VB-G RAM G को वापस लिया जाए। इसके बजाय मांग आधारित रोजगार गारंटी कार्यक्रम यानी मनरेगा को दोबारा बहाल किया जाए। उन्होंने आलोचना करते हुए कहा कि नई योजना ने पूरी तरह से मांग-आधारित बुनियादी ढांचे को ही खत्म कर दिया है।
नई योजना के मसौदे में मजदूरी दरों में संशोधन को लेकर पूरी तरह से चुप्पी साधी गई है, जो बेहद चिंताजनक है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अधिकांश राज्यों में मनरेगा मजदूरों की दिहाड़ी न्यूनतम मजदूरी से भी कम रही है। इसके अलावा, मसौदे में केवल ई-केवाईसी (e-KYC) के माध्यम से सत्यापित जॉब कार्ड को ही जारी रखने पर जोर दिया गया है। डे के मुताबिक, ई-केवाईसी के आधार पर नए जॉब कार्ड बनाने की डिजिटल अनिवार्यता ने पूरे देश में मजदूरों के लिए भारी तबाही मचाई है।
कई राज्यों के मजदूरों ने हाल के वर्षों में पेश की गई डिजिटल प्रणालियों को लेकर लगातार आने वाली कठिनाइयों का जिक्र किया है। विडंबना यह है कि नए मसौदा नियमों में इन प्रणालियों को और अधिक संस्थागत बनाने का प्रयास किया जा रहा है। राजस्थान असंगठित मजदूर यूनियन की मधुलिका ने बताया कि फेशियल-रिकग्निशन सिस्टम यानी चेहरा पहचानने वाली मशीनों में मजदूरों के चेहरे में मामूली बदलाव होने पर उन्हें पहचाना ही नहीं जाता।
उन्होंने कहा कि कई महिलाओं को मशीन द्वारा पहचाने जाने के लिए हर दिन एक ही साड़ी और ब्लाउज पहनने को मजबूर होना पड़ता है। इसके अलावा, सॉफ्टवेयर अपडेट के कारण आधिकारिक रिकॉर्ड से कई कार्यस्थलों के अचानक गायब होने की भी शिकायतें मिली हैं।
अखिल भारतीय कृषि श्रमिक संघ (AIAWU) के महासचिव बी. वेंकट ने इस देशव्यापी आंदोलन का आह्वान करते हुए एक अहम सामाजिक पहलू भी सामने रखा। उन्होंने कहा कि इस योजना में काम करने वाले बहुसंख्यक मजदूर महिलाएं हैं, जबकि इनमें 25 प्रतिशत आबादी दलितों और आदिवासियों की है। वेंकट ने स्पष्ट तौर पर कहा कि मजदूरों पर किया जा रहा यह हमला सीधे तौर पर सामाजिक न्याय पर बड़ा प्रहार है।
सरकार ने दावा किया था कि मनरेगा और VB-G RAM G के बीच के बदलाव की अवधि (ट्रांजिशन पीरियड) में कोई भी मजदूर रोजगार के बिना नहीं रहेगा। नरेगा संघर्ष मोर्चा ने इस दावे को भी खुली चुनौती दी है। साल 2026 के पहले पांच महीनों के आंकड़ों का हवाला देते हुए कार्यकर्ताओं ने बताया कि उत्तर प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, केरल, आंध्र प्रदेश और झारखंड जैसे कई बड़े राज्यों में 2025 की समान अवधि की तुलना में रोजगार सृजन में भारी गिरावट दर्ज की गई है।
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