आदिवासियों की दशा पर पिघला राजस्थान के इस सांसद का दिल, पोस्ट में छलका दर्द!

भारत आदिवासी पार्टी के सांसद राजकुमार रोत ने सीएम भजनलाल शर्मा के दौरे को लेकर भी साधा था निशाना, भाजपा केबिनेट मंत्री का पलटवार- रोत ने एमएलए और एमपी रहते हुए क्षेत्र के लिए क्या किया?
मध्यप्रदेश और गुजरात के कई इलाकों में आदिवासी महिलाएं और बच्चियां अपने घरों से 2-3 किलोमीटर दूर गहरे कुओं से जान जोखिम में डालकर पानी निकालने को मजबूर हैं।
मध्यप्रदेश और गुजरात के कई इलाकों में आदिवासी महिलाएं और बच्चियां अपने घरों से 2-3 किलोमीटर दूर गहरे कुओं से जान जोखिम में डालकर पानी निकालने को मजबूर हैं।सोशल मीडिया/बीबीसी रिपोर्ट
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नई दिल्ली-  राजस्थान के बांसवाड़ा- डूंगरपुर से सांसद राजकुमार रोत ने देश के आदिवासियों की धरातलीय हकीकत को लेकर एक भावुक पोस्ट लिखकर एक बार फिर से मौजूदा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सांसद रोत ने सोशल मीडिया पर साझा की गई एक चौंकाने वाली वीडियो का हवाला देते हुए लिखा कि जब वह संसद में 14-15 करोड़ आदिवासियों की पीड़ा उठाते हैं, तो कई लोग उनसे कहते हैं कि "आप किस जमाने की बात कर रहे हैं, अब तो देश विश्वगुरु बनने जा रहा है।"

"जंगल-जमीन छीने जाने का दर्द"

अपनी पोस्ट में रोत ने साफ किया कि आदिवासी विकास के नाम पर सिर्फ कागजी दावे देखना चाहते हैं, जबकि असल जमीन पर उनके अस्तित्व को खतरा है। रोत ने मध्य प्रदेश और गुजरात के आदिवासी इलाकों की बहनों का दर्द सुनाते हुए लिखा, "यह तस्वीर हमारे ही भारत देश की है। यह उसी भारत की तस्वीर है, जहां नेता 'घर-घर नल और हर नल में जल' की बात करते हैं और जहां नारी शक्ति के सम्मान की बातें बड़े जोर-शोर से की जाती हैं।" उन्होंने कहा कि बहनें अपने घरों से 2-3 किलोमीटर दूर गहरे कुओं से जान जोखिम में डालकर पानी निकालने को मजबूर हैं।

सांसद ने आगे लिखा, "इन विपरीत परिस्थितियों के बावजूद इस देश का आदिवासी सरकारों से अधिक अपेक्षा नहीं करता है। वह सिर्फ यह चाहता है कि विकास के नाम पर उसके जंगल और जमीन न छीनी जाए। आदिवासियों का विकास केवल कागजों में हुआ है, जबकि धरातल पर स्थिति आज भी जस की तस बनी हुई है। सरकारों की दृष्टि में आदिवासी क्षेत्रों में खनन के लिए उद्योगपतियों को जमीन आवंटित करना, फैक्ट्रियां लगाना और संसाधनों का दोहन करना ही विकास माना जाता है। वहीं जो आदिवासी अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं, जंगल-जमीन की रक्षा, आदिवासी संस्कृति, इतिहास तथा संवैधानिक अधिकारों को लागू करने की बात करते हैं, उन्हें विकास विरोधी या देश विरोधी मान लिया जाता है। वर्तमान में टीवी चैनलों और सड़कों पर लगे होर्डिंगों में देश के विकास मॉडल को दिखाया जा रहा है, लेकिन धरातलीय हकीकत इससे बिल्कुल विपरीत है। झूठे सपनों से बाहर निकलिए और देश के दुर्गम क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी, दलित एवं गरीब तबके के लोगों के संघर्षमय जीवन को देखिए, समझिए और महसूस कीजिये।"

रोत ने सरकारों पर उद्योगपतियों को खनन के लिए जमीन देकर आदिवासियों का शोषण करने का आरोप लगाया, जबकि जो लोग शिक्षा, स्वास्थ्य और संवैधानिक अधिकारों की बात करते हैं, उन्हें विकास विरोधी करार दिया जाता है।

गौरतलब है कि इस पोस्ट से पूर्व एक अन्य पोस्ट में रोत ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के हालिया बांसवाड़ा दौरे पर भी तीखा तंज कसा था। रोत का आरोप है कि मुख्यमंत्री का डूंगरपुर-बांसवाड़ा दौरा महज एक ड्रामा साबित हुआ है। रात्रि चौपाल में आमजन को प्रवेश तक नही दिया गया। घंटों इंतजार करते लोग प्रशासन की दीवार से बाहर ही खड़े रहे। चौपाल केवल उन्हीं के लिए थी, जिन्हें पहले से सब कुछ मिल चुका है। चौरासी के निर्वाचित विधायक महोदय ने कलक्टर और CMO के जरिए समय मांगा तो उन्हें भी नही मिला। जब एक जनप्रतिनिधि से ही मिलने से बचा जाए, तो उस आदिवासी किसान की बात कौन सुनेगा जो मीलों चलकर आया था ? माही-कडाणा बांध में जिनकी जमीनें डूबी और जो विस्थापित हुए, उन्हें आज तक सिंचाई का पानी नही मिला और अब अनुसूचित क्षेत्र से माही-अनास का पानी 700 किलोमीटर दूर ले जाने की योजना बना रहे है। इस आलोचना के तुरंत बाद राजनीतिक घमासान शुरू हो गया।

जनजाति क्षेत्र विकास मंत्री बाबूलाल खराड़ी ने रोत पर पलटवार करते हुए कहा, " राजकुमार रोत की राजनीतिक ज़मीन खिसक रही है इसलिए जनता के बीच अनर्गल बयानबाजी कर रहे हैं। वे पांच साल विधायक रहे और अब सांसद हैं लेकिन उन्होंने क्षेत्र के विकास के लिए क्या किया है - वे इसका जवाब जनता को दें।"

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