TM Mega Report | क्या जीतू मुंडा की दास्तान से सबक लेगा सिस्टम? RBI का वादा- वंचितों की ज़रूरतों के प्रति सजग होगी बैंकिंग प्रणाली!

राज्यसभा सांसद सस्मित पात्रा की RBI गवर्नर से मुलाकात के बाद आया आधिकारिक जवाब | राइट टू फूड कैंपेन की फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट ने भी उठाए गंभीर सवाल
जीतू मुंडा का अपनी बहन की हड्डियाँ उठाकर बैंक तक चलना किसी पागलपन का नहीं, बल्कि उस इंसान की आखिरी पुकार थी जिसने हर दरवाजा खटखटाया था और हर बार खाली हाथ लौटा था। यह उस व्यवस्था की विफलता है जो तभी जागती है जब तस्वीरें वायरल हो जाएँ।
जीतू मुंडा का अपनी बहन की हड्डियाँ उठाकर बैंक तक चलना किसी पागलपन का नहीं, बल्कि उस इंसान की आखिरी पुकार थी जिसने हर दरवाजा खटखटाया था और हर बार खाली हाथ लौटा था। यह उस व्यवस्था की विफलता है जो तभी जागती है जब तस्वीरें वायरल हो जाएँ।ग्राफिक- आसिफ़ निसार/ द मूकनायक
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नई दिल्ली - ओडिशा के क्योंझर जिले के दियानाली गाँव के एक गरीब आदिवासी बुजुर्ग जीतू मुंडा ने जो कदम 27 अप्रैल को उठाया, उसने पूरे देश को झकझोर दिया। अपनी मृत बहन कलरा मुंडा की कब्र खोदकर, उनकी हड्डियाँ एक जूट की बोरी में भरकर, तपती दोपहर में नंगे पैर 2–3 किलोमीटर पैदल चलकर वे ओडिशा ग्रामीण बैंक, मल्लीपोशी शाखा पहुँचे ताकि बहन की मौत का सबूत बैंक कर्मियों को देकर उसके खाते में जमा ₹19,600 निकाल सकें। यह पैसा उन्होंने अपनी दो बैलों को बेचकर जमा किया था।

इस मार्मिक घटना ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को भी झकझोर दिया है। राज्यसभा सांसद एवं बीजू जनता दल के प्रवक्ता सस्मित पात्रा ने हाल ही में मुंबई में RBI गवर्नर से मुलाकात कर इस मामले को औपचारिक रूप से उठाया और 7 मई को एक विस्तृत प्रतिवेदन सौंपा। इसके जवाब में RBI ने 15 मई को एक पत्र में लिखा जिसमे कहा गया कि जीतू मुंडा की इस "दुखदायी घटना" को गंभीरता से लिया गया है और बैंकिंग प्रणाली में सुधार के लिए सुझावों पर "सक्रियता से विचार" हो रहा है। RBI की ओर से सोनाली सेन गुप्ता द्वारा हस्ताक्षरित इस पत्र में कहा गया है कि वंचित और कमजोर नागरिकों तक बेहतर बैंकिंग सेवाएँ पहुँचाने के लिए "उपयुक्त उपाय किए जाएंगे।"

" हमारे लिए भरपेट खाना मेहमान समान, भूख घर की सदस्य"

जीतू मुंडा और उनकी बहन कलरा मुंडा की कहानी महज एक घटना नहीं, यह सरकारी तंत्र की विफलता की कहानी है। राइट टू फूड कैंपेन की फैक्ट-फाइंडिंग टीम ने 8 मई को दियानाली गाँव का दौरा किया और जो तथ्य सामने आए, वे रोंगटे खड़े करने वाले हैं।

कलरा मुंडा विधवा थीं और अपने भाई जीतू के साथ रहती थीं। उनके पास न खेती की जमीन थी, न कोई स्थायी आजीविका। दोनों रोजमर्रा की मजदूरी और कभी-कभी भीख माँगकर गुजारा करते थे। जीतू मुंडा के शब्दों में, "पेट भरना तो मेहमान की तरह है, जबकि भूख घर की सदस्य बन गई है।" ऐसे में कलरा के बैंक खाते में जमा ₹19,600 उनका एकमात्र सहारा था।

अक्टूबर-नवंबर 2025 में जब कलरा की तबियत बिगड़ने लगी, तो जीतू बार-बार बैंक गए। हर बार उन्हें यह कहकर लौटा दिया गया कि वे खाताधारक नहीं हैं, इसलिए पैसे नहीं निकाल सकते। बैंक ने कहा कि कलरा खुद आकर पैसे निकालें लेकिन कलरा तब तक बिस्तर पर पड़ी थीं और खुद उठ भी नहीं सकती थीं। जीतू ने उन्हें बैंक ले जाने के लिए एक छोटी गाड़ी का इंतजाम करने की कोशिश की, लेकिन कोई राजी नहीं हुआ।

 फैक्ट-फाइंडिंग टीम ने रिपोर्ट में लिखा कि यह घटना निराशा का कोई आकस्मिक कृत्य नहीं, बल्कि संस्थागत विफलताओं की एक लंबी श्रृंखला की परिणति थी।
फैक्ट-फाइंडिंग टीम ने रिपोर्ट में लिखा कि यह घटना निराशा का कोई आकस्मिक कृत्य नहीं, बल्कि संस्थागत विफलताओं की एक लंबी श्रृंखला की परिणति थी।
27 अप्रैल को जीतू मुंडा ने वह कदम उठाया जो शायद किसी इंसान के लिए सबसे कठिन होता है। उन्होंने बहन की कब्र खोदी, हड्डियाँ जूट की बोरी में रखीं और कंधे पर उठाकर तपती दोपहर में नंगे पैर बैंक पहुँचे।
टीम ने माना कि जीतू मुंडा को पात्ररता के बावजूद सभी  देय लाभ वर्षों से नकारे गए लेकिन मीडिया का ध्यान आकर्षित होने के कुछ ही दिनों में सभी परिलाभ  प्रदान कर दिए गए,जो इस बात का सबसे सशक्त प्रमाण है कि वहाँ कोई वास्तविक कानूनी या प्रक्रियागत बाधा नहीं थी, केवल प्रशासनिक उपेक्षा थी।
टीम ने माना कि जीतू मुंडा को पात्ररता के बावजूद सभी देय लाभ वर्षों से नकारे गए लेकिन मीडिया का ध्यान आकर्षित होने के कुछ ही दिनों में सभी परिलाभ प्रदान कर दिए गए,जो इस बात का सबसे सशक्त प्रमाण है कि वहाँ कोई वास्तविक कानूनी या प्रक्रियागत बाधा नहीं थी, केवल प्रशासनिक उपेक्षा थी।

राइट टू फूड कैंपेन की फैक्ट-फाइंडिंग टीम द्वारा एकत्रित किए गए दस्तावेजी साक्ष्यों के अनुसार, कलरा मुंडा दो प्रमुख सामाजिक सुरक्षा योजनाओं की हकदार थीं:

  1. अंत्योदय अन्न योजना (AAY) जो राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) के अंतर्गत आता है। राशन कार्ड के अनुसार, उनका अंतिम राशन वितरण 2 दिसंबर 2025 को हुआ था, जब उन्हें जनवरी, फरवरी और मार्च 2026 के महीनों के लिए 105 किलोग्राम चावल का कोटा प्राप्त हुआ था।

  2. राज्य सामाजिक सुरक्षा योजना के तहत विधवा पेंशन ₹1,000 प्रति माह की दर से। उनकी पेंशन पासबुक के अनुसार, उन्हें अपनी अंतिम मासिक पेंशन 17 जनवरी 2026 को प्राप्त हुई थी।

  3. इसके अलावा कलरा और जीतू उस मकान में रहते थे, जो कलरा मुंडा को ग्रामीण आवास योजना के तहत वर्ष 2021-22 में आवंटित किया गया था।

इसके विपरीत, जीतू मुंडा के पास घटना से पहले न तो कोई राशन कार्ड था और न ही वृद्धावस्था पेंशन, हालाँकि वह दोनों के लिए पात्र था। अतः भाई-बहन अपनी जीवन-निर्वाह के लिए लगभग पूरी तरह से कलरा के राशन कोटे और पेंशन पर ही निर्भर थे। चूँकि ये संसाधन उनका पेट भरने के लिए कभी पर्याप्त नहीं थे, इसलिए वे कभी-कभी भीख माँगने को मजबूर हो जाते थे।

3 महीने बाद भी नहीं बना बहन का डेथ सर्टिफिकेट, घटना के 48 घंटे में हो गया जारी

नियमानुसार मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने की मानक प्रक्रिया सात दिनों में पूरी हो जानी चाहिए। किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद, आशा कार्यकर्ता को निम्नलिखित प्रक्रिया अपनानी होती है:  आशा कार्यकर्ता मृतक के परिवार से मिलती है और मृतक का आधार कार्ड तथा परिवार के अभिभावक/सदस्य का आधार कार्ड एकत्र करती है। ये दस्तावेज़ उप-केंद्र (Sub-Centre) में जमा किए जाते हैं।

उप-केंद्र द्वारा दस्तावेज़ों का सत्यापन किया जाता है और फिर उन्हें प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) / सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) को अग्रेषित किया जाता है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) या सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) से मृत्यु प्रमाण पत्र जारी किया जाता है।

26 जनवरी को कलरा मुंडा चल बसीं। उसकी मौत की खबर गाँव के हर व्यक्ति को थी, ASHA कार्यकर्ता, आँगनवाड़ी कार्यकर्ता, पंचायत के नुमाइंदे, सबको इसकी जानकारी थी। फिर भी तीन महीने से अधिक समय तक मृत्यु प्रमाण पत्र नहीं बन पाया। ASHA कार्यकर्ता ने दस्तावेज उपकेंद्र को सौंपे, लेकिन ANM ने आगे नहीं बढ़ाया। जब भी जीतू बैंक गए, उन्हें यही कहा गया - मृत्यु का प्रमाण लाओ।

तब 27 अप्रैल को जीतू मुंडा ने वह कदम उठाया जो शायद किसी इंसान के लिए सबसे कठिन होता है। उन्होंने बहन की कब्र खोदी, हड्डियाँ जूट की बोरी में रखीं और कंधे पर उठाकर तपती दोपहर में नंगे पैर बैंक पहुँचे। बैंक के बरामदे पर करीब दो घंटे बैठे रहे। भीड़ जुटने लगी तो बैंककर्मियों ने गेट बंद कर लिया।

जब पुलिस आई तो उन्होंने जीतू को कहा, "हड्डियाँ वापस ले जाओ और पैदल चलकर गाँव जाओ।" पुलिसकर्मी खुद गाड़ी में बैठकर चले गए, और जीतू मुंडा एक बार फिर नंगे पैर, भरी गर्मी में, बहन की हड्डियाँ कंधे पर उठाए वापस चले।

जैसे ही यह मामला मीडिया में आया, पूरी मशीनरी हरकत में आ गई। 29 अप्रैल को मृत्यु प्रमाण पत्र बना जो तीन महीने पहले बनाया जा सकता था। उसी दिन जीतू का बैंक खाता खोला गया और बहन के खाते का पैसा उसमें ट्रांसफर किया गया। 30 अप्रैल को उन्हें ₹1,000 मासिक वृद्धावस्था पेंशन के लिए नामांकित किया गया और अप्रैल माह की पेंशन उसी दिन जारी हुई। राशन कार्ड भी मिल गया। यह सब वही हक थे जो जीतू को कब का मिल जाने चाहिए थे।

घटना के बाद से प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बने जीतू मुंडा के एक कमरे के घर में बहुत कुछ बदल गया। नेता, अधिकारी, पत्रकार सभी उनसे मिलने आने लगे। उन्हें एक लोहे का पलंग, गद्दा, पेडस्टल पंखा, साइकिल, एल्युमीनियम का बक्सा और चावल, आलू, प्याज के बोरे मिले। जब वायरल हुए वीडियो में उनके नंगे पैर दिखे तो किसी ने चप्पल भी भेजी। लेकिन जीतू ने फैसला किया है कि जो दान मिला है उसे वे परिवार के बच्चों की शिक्षा पर खर्च करेंगे।

इतनी सहानुभूति के बावजूद जीतू थके हुए नजर आते हैं। एक ही कहानी बार-बार सुनानी पड़ती है। हर नई मुलाकात उस दर्द को फिर से ताजा कर देती है।

आधार बना हक का अवरोध

फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट में एक और गंभीर खामी उजागर हुई: आधार कार्ड। अपनी बहन की मृत्यु के बाद जीतू मुंडा और भी अधिक संकट में पड़ गया। उसके पहले से ही अल्प संसाधनों का एक हिस्सा उसके अंतिम संस्कार पर खर्च हो गया था। उसने स्थानीय राशन की दुकान के डीलर और ग्राम पंचायत से संपर्क किया, ताकि अपने लिए राशन कार्ड और वृद्धावस्था पेंशन का अनुरोध कर सके – ये वे लाभ थे जिनका वह एक बेसहारा, भूमिहीन, वृद्ध व्यक्ति होने के नाते स्पष्ट रूप से पात्र था। लेकिन उसे यह कहते हुए दोनों से वंचित कर दिया गया कि वह अपना आधार कार्ड प्रस्तुत नहीं कर सकता। जीतू का आधार कहीं खो गया था। जिस व्यक्ति की पहचान, पता और गरीबी गाँव के हर किसी को मालूम थी, उसे उसी गाँव में आधार न होने की वजह से राशन से वंचित किया गया। गाँव के पूर्व वार्ड सदस्य हरिबंधु महंता की सहायता से, अंततः आधार का पता लगाकर उसे अपडेट किया गया, और घटना से महज दो दिन पहले उसे आधार मिला।

अपनी बहन की नवनिर्मित कब्र के पास जीतू मुंडा
अपनी बहन की नवनिर्मित कब्र के पास जीतू मुंडाराइट टू फूड कैंपेन- फैक्ट-फाइंडिंग टीम

तस्वीरें वायरल होने के बाद कैसे जागा प्रशासन?

एक बार जब इस घटना ने मीडिया का ध्यान आकर्षित किया, तो स्थानीय प्रशासन ने जीतू मुंडा की लंबे समय से लंबित शिकायतों के निवारण के लिए असामान्य गति से कार्य किया:

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC), पटना ने कलरा मुंडा का मृत्यु प्रमाण पत्र दो दिनों के भीतर, 29 अप्रैल को जारी कर दिया।

जीतू मुंडा के लिए 29 अप्रैल को एक बैंक खाता खोला गया, और उसकी बहन के खाते में पड़ा हुआ पैसा, साथ ही विभिन्न सरकारी और निजी दाताओं से प्राप्त अतिरिक्त सहायता, उस खाते में जमा कर दी गई। जीतू मुंडा को राशन कार्ड जारी कर दिया गया। उसे 30 अप्रैल को सामाजिक सुरक्षा पेंशन के लिए नामांकित किया गया, और उसी दिन अप्रैल माह के लिए ₹1000 की पेंशन राशि जारी कर दी गई। जिन लाभों से वर्षों से वंचित रखा गया था, वे केवल मामले के सार्वजनिक होने के बाद, कुछ ही दिनों में प्रदान कर दिए गए। यह तथ्य अपने आप में सबसे गरीब नागरिकों के प्रति प्रणाली की प्रतिक्रियाशीलता (responsiveness) पर एक स्पष्ट टिप्पणी है।

जीतू मुंडा को राशन कार्ड जारी कर दिया गया। उसे 30 अप्रैल को सामाजिक सुरक्षा पेंशन के लिए नामांकित किया गया, और उसी दिन अप्रैल माह के लिए ₹1000 की पेंशन राशि जारी कर दी गई।
जीतू मुंडा को राशन कार्ड जारी कर दिया गया। उसे 30 अप्रैल को सामाजिक सुरक्षा पेंशन के लिए नामांकित किया गया, और उसी दिन अप्रैल माह के लिए ₹1000 की पेंशन राशि जारी कर दी गई। राइट टू फूड कैंपेन- फैक्ट-फाइंडिंग टीम

बैंक का आचरण सवालों के घेरे में

ओडिशा ग्रामीण बैंक, मल्लीपोशी शाखा में केवल तीन नियमित कर्मचारी हैं - शाखा प्रबंधक (जो दौरे के दिन छुट्टी पर थे), एक कैशियर और एक संदेशवाहक - साथ ही एक बैंक मित्र। फैक्ट-फाइंडिंग टीम ने निम्नलिखित बिंदुओं को नोट किया:

  •  जीतू मुंडा के शाखा में बार-बार आने के बावजूद, ऐसा प्रतीत नहीं होता कि बैंक स्टाफ के किसी सदस्य ने उसकी परिस्थितियों को समझने या उसकी समस्या का समाधान करने के लिए कोई वैकल्पिक प्रक्रियागत मार्ग खोजने का वास्तविक प्रयास किया हो।

  •  बैंक स्टाफ जानता था, या उसे पता होना चाहिए था, कि कलरा मुंडा एक गरीब, बीमार विधवा थी जो शाखा के तत्काल क्षेत्र में रहती थी, और उसका भाई उसकी देखभाल करने वाला था।

  •  घटना के सार्वजनिक होने के बाद, बैंक अधिकारियों ने कथित तौर पर जीतू मुंडा के घर का दौरा किया और जमा धनराशि को निकालने की व्यवस्था की। टीम का सवाल था कि

    घटना के बाद यह किस नियम के तहत किया गया? और उन महीनों के दौरान, जब यही धनराशि निकालना असंभव माना जाता था, वह किस नियम के तहत असंभव था?

RBI ने क्या कहा?

डॉ. सस्मित पात्रा ने मुंबई में RBI गवर्नर से मुलाकात कर जीतु मुंडा प्रकरण उठाया था। उन्होंने मुंबई जाकर RBI गवर्नर से मुलाकात की और एक विस्तृत प्रतिवेदन सौंपा, जिसमें "कमजोर नागरिकों के लिए मानवोचित, सुगम और नागरिक-केंद्रित बैंकिंग एसओपी" की माँग की गई। RBI ने अपने जवाब में माना कि इस तरह के संवेदनशील मामलों में कमजोर लोगों को प्रक्रियागत कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है और बैंकिंग प्रणाली को इसके प्रति अधिक जवाबदेह बनाया जाएगा।

RBI ने उनके 07 मई 2026 के पत्र के जवाब में लिखा: “हमने दिवंगत जमाकर्ताओं के दावों के निपटान जैसे संवेदनशील मामले में कमजोर व्यक्तियों के सामने आने वाली प्रक्रियात्मक कठिनाइयों के संबंध में आपके द्वारा प्रकट की गई चिंताओं को गंभीरता से लिया है। आपके सुझावों पर वर्तमान में सक्रियता से विचार किया जा रहा है ताकि मौजूदा अंतरालों को प्रभावी ढंग से दूर किया जा सके। हम यह सुनिश्चित करने के लिए दृढ़ता से प्रतिबद्ध हैं कि बैंकिंग प्रणाली वंचित ग्राहकों की आवश्यकताओं के प्रति सजग रहे और उन्हें प्रभावी ढंग से सेवा प्रदान करे। ग्राहक जागरूकता बढ़ाने और सुविधा तंत्र को बेहतर बनाने के लिए समुचित उपाय किए जाएंगे।”

फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट की प्रमुख सिफारिशें

अपने निष्कर्षों के आधार पर टीम ने निम्नलिखित सिफारिशें सबमिट की है। टीम ने प्रत्येक स्तर पर तत्काल और समयबद्ध कार्रवाई का अनुरोध किया।

1. मृत्यु पंजीकरण पर

ASHA, आँगनवाड़ी और पंचायत कार्यकर्ताओं को सात दिनों के भीतर हर मृत्यु की सूचना अनिवार्य रूप से दर्ज करनी होगी, चाहे परिवार आए या नहीं। पेंशन और राशन कार्ड धारकों का मृत्यु प्रमाण पत्र स्वतः और निःशुल्क जारी किया जाए।

2. आधार और हक पर

किसी भी नागरिक को सिर्फ आधार न होने की वजह से राशन कार्ड या पेंशन से वंचित नहीं किया जाए। पंचायत-स्तरीय सत्यापन वैकल्पिक पहचान के रूप में मान्य हो। PVTGs और बुजुर्गों के लिए ग्राम पंचायत स्तर पर कैंप मोड में आधार नामांकन हो।

3. बैंकिंग SOP पर

ओडिशा ग्रामीण बैंक और सहकारिता विभाग बिस्तर पर पड़े, जरूरतमंद और दिवंगत खाताधारकों के लिए डोरस्टेप बैंकिंग, सरल नामांकन प्रक्रिया और मानवीय दावा निपटान की SOP जारी करे। मल्लीपोशी शाखा के आचरण की आंतरिक जाँच हो।

4. पुलिस आचरण पर

केओंझर के पुलिस अधीक्षक 27 अप्रैल को पटना थाने के उन पुलिसकर्मियों के आचरण की जाँच करें जिन्होंने नंगे पैर, विक्षुब्ध अवस्था में बहन की हड्डियाँ लेकर खड़े जीतू को पैदल चलने पर मजबूर किया, जबकि खुद गाड़ी में बैठकर चले गए।

5. जीतू मुंडा की देखभाल पर

जिला प्रशासन जीतू मुंडा की दीर्घकालिक देखभाल की जिम्मेदारी ले। उनके भाई और भाभी जो गंभीर रूप से कुपोषित पाए गए, उनकी भी तत्काल सुध ली जाए।

जीतू मुंडा का अपनी बहन की हड्डियाँ उठाकर बैंक तक चलना किसी पागलपन का नहीं, बल्कि उस इंसान की आखिरी पुकार थी जिसने हर दरवाजा खटखटाया था और हर बार खाली हाथ लौटा था। यह उस व्यवस्था की विफलता है जो तभी जागती है जब तस्वीरें वायरल हो जाएँ।
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जीतू मुंडा का अपनी बहन की हड्डियाँ उठाकर बैंक तक चलना किसी पागलपन का नहीं, बल्कि उस इंसान की आखिरी पुकार थी जिसने हर दरवाजा खटखटाया था और हर बार खाली हाथ लौटा था। यह उस व्यवस्था की विफलता है जो तभी जागती है जब तस्वीरें वायरल हो जाएँ।
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