
रांची- झारखंड के वरिष्ठ आदिवासी नेता रामेश्वर उरांव ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बड़ा बयान देते हुए साफ किया कि आदिवासी समाज न तो हिंदू है और न ही सनातन धर्म को मानता है। उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म वर्णाश्रम पर आधारित है, जिसमें आदिवासियों को शूद्र की श्रेणी में रखने की कोशिश की जाती है, जिसे वे कभी स्वीकार नहीं कर सकते।
उन्होंने कहा कि हमारी पहचान हमारी आस्था है, और हम स्पष्ट रूप से बोलना चाहते हैं कि हम कतई हिंदू नहीं हैं, क्योंकि हिंदू धर्म वर्णाश्रम पर आधारित है: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र- ऐसे में आदिवासी को कहाँ रखेंगे? अगर शूद्र में रखेंगे तो वह हम कभी स्वीकार नहीं कर सकते।
उरांव ने यह भी कहा कि 'सनातन' शब्द भी भ्रमित करने वाला (confusing word) है। उनके अनुसार, जो लोग प्रकृति की पूजा करते हैं, उनकी पहचान 'सरना' धर्म से है, न कि सनातन या हिंदू धर्म से।
उन्होंने कहा, "हमारी पहचान तो वो (सरना ) है, हमारी पहचान सनातन धर्म या हिंदू धर्म नहीं है।"
आपको बता दें, रामेश्वर उरांव झारखंड के जाने-माने आदिवासी नेता हैं। उन्होंने राजनीति और प्रशासन दोनों ही क्षेत्रों में आदिवासी समाज के उत्थान, शिक्षा और उनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए लगातार आवाज उठाई है। वे भारत सरकार के राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष भी रह चुके हैं, मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली UPA-1 सरकार में उन्हें केंद्रीय जनजातीय मामलों के मंत्रालय में राज्य मंत्री बनाया गया था। 2019 के झारखंड विधानसभा चुनाव में उन्होंने लोहरदगा विधानसभा सीट से जीत दर्ज की। हेमंत सोरेन और बाद में चंपई सोरेन के नेतृत्व वाली झारखंड महागठबंधन सरकार में उन्हें वित्त, योजना एवं विकास, वाणिज्य कर, और खाद्य व सार्वजनिक वितरण विभाग जैसे बेहद महत्वपूर्ण मंत्रालयों का कैबिनेट मंत्री बनाया गया था।
झारखंड में 'सरना कोड' आदिवासियों की अलग धार्मिक पहचान के लिए लंबे समय से मांगा जा रहा है। डीलिस्टिंग का मुद्दा भी झारखंड विधानसभा में गरमाया हुआ है।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में उरांव ने 'डीलिस्टिंग' के मुद्दे पर भी बात की और कहा कि किसी एक धर्म विशेष (ईसाई) के आदिवासियों को टारगेट करना गलत और असंवैधानिक है। उन्होंने पटना हाईकोर्ट के पुराने फैसले का हवाला देते हुए कहा कि उरांव समुदाय एक है, चाहे उसका धर्म कोई भी हो। साथ ही उन्होंने एक बार फिर झारखंड से भेजे गए 'सरना कोड' प्रस्ताव को मंजूरी देने की मांग की ताकि आदिवासियों की अलग धार्मिक पहचान कानूनी तौर पर स्थापित हो सके।
उरांव ने 1962-63 के पटना हाईकोर्ट के फैसले का जिक्र किया, जिसमें कार्तिक उरांव और डेविड मुंजनी के मामले में कोर्ट ने कहा था कि दोनों उरांव जाति के हैं, भले ही उनका धर्म अलग हो। इस आधार पर वे ट्राइबल सीट से चुनाव लड़ सकते हैं।
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