नई दिल्ली/पोर्ट ब्लेयर: ग्रेट निकोबार द्वीप में प्रस्तावित 92,000 करोड़ रुपये की मेगा-इन्फ्रास्ट्रक्चर-प्रोजेक्ट को मंजूरी मिलने की प्रक्रिया अंतिम चरण में है, लेकिन इसके साथ ही एक गंभीर विवाद गहराता जा रहा है। गुरुवार 22 जनवरी, को लिटिल और ग्रेट निकोबार की 'ट्राइबल काउंसिल' ने जिला प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। काउंसिल का कहना है कि प्रशासन उन पर अपनी "पुश्तैनी जमीनें सरेंडर" करने का दबाव बना रहा है ताकि इस प्रोजेक्ट के लिए रास्ता साफ किया जा सके।
यह विवाद मुख्य रूप से गलाथिया बे, पेम्माया बे और नंजप्पा बे के वन क्षेत्रों से जुड़ा है। इन इलाकों में 2004 की विनाशकारी सुनामी से पहले निकोबारी आदिवासी समुदाय निवास करता था और अब प्रोजेक्ट के कुछ हिस्से इन्हीं जमीनों पर प्रस्तावित हैं।
पत्रकारों को दी गई एक ऑनलाइन ब्रीफिंग में ट्राइबल काउंसिल के सदस्यों ने बताया कि उन्हें 7 जनवरी को निकोबार जिला प्रशासन के अधिकारियों के साथ बैठक के लिए बुलाया गया था। आरोप है कि उस बैठक में उनसे मौखिक रूप से एक "सरेंडर सर्टिफिकेट" (समर्पण प्रमाण पत्र) पर हस्ताक्षर करने को कहा गया, जिसके तहत उन्हें अपनी पुश्तैनी जमीनों पर दावा छोड़ना था।
द हिन्दू की रिपोर्ट के अनुसार, हैरानी की बात यह रही कि मीडिया ब्रीफिंग के कुछ ही घंटों बाद, काउंसिल सदस्यों को फिर से एक बैठक के लिए तलब किया गया। इस दूसरी बैठक में प्रशासन ने कथित तौर पर एक समझौते की पेशकश की। उनसे पूछा गया कि यदि उन्हें तट के एक अलग हिस्से पर अपने उजड़े हुए गांवों को फिर से बसाने की अनुमति दी जाती है, तो क्या वे अपनी जमीन के कुछ हिस्सों पर अपना दावा छोड़ने को तैयार होंगे?
इस मामले पर निकोबार के डिप्टी कमिश्नर अमित काले मारुतिराव और असिस्टेंट कमिश्नर (कैम्पबेल बे) केशव नरेंद्र सिंह की ओर से अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है।
ट्राइबल काउंसिल के चेयरमैन बरनबास मंजू ने 7 जनवरी की घटना का जिक्र करते हुए कहा, "निकोबार के कैम्पबेल बे स्थित अंडमान लोक निर्माण विभाग (APWD) के गेस्ट हाउस में हुई बैठक महज 10 मिनट चली। वहां प्रशासन के कुछ अधिकारियों के साथ 'अंडमान आदिम जनजाति विकास समिति' के प्रतिनिधि भी मौजूद थे। हमें प्रोजेक्ट के नक्शे दिखाए गए और विकास पर हमारी राय पूछी गई। और फिर अचानक, हमें समर्पण प्रमाण पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा गया।"
काउंसिल के सदस्यों ने अधिकारियों से कहा कि वे इस पर आपस में चर्चा किए बिना कोई फैसला नहीं ले सकते।
पुलोभाबी गांव के फर्स्ट कैप्टन और काउंसिल के सदस्य टाइटस पीटर ने ब्रीफिंग में अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा, "हम इस तरह के किसी भी सरेंडर दस्तावेज पर हस्ताक्षर नहीं कर सकते। यह हमारी पुश्तैनी आदिवासी जमीन है। अगर हम इसे दे देंगे, तो हमारी आने वाली पीढ़ियों के पास कुछ भी नहीं बचेगा।"
मंजू ने यह भी याद दिलाया कि 2004 की सुनामी के कारण विस्थापित हुए उन्हें 21 साल हो चुके हैं। वे लगातार अपने उन पुश्तैनी गांवों में लौटने की मांग कर रहे हैं जो सुनामी में नष्ट हो गए थे, लेकिन प्रशासन ने अभी तक उनकी सुध नहीं ली है।
काउंसिल के सदस्यों का कहना है कि उन्हें उस प्रमाण पत्र के बारे में कोई ठोस जानकारी नहीं दी गई, हालांकि अधिकारियों ने यह जरूर कहा कि यदि जरूरत पड़ी तो वे इसे ड्राफ्ट करने में मदद करेंगे। गौरतलब है कि ट्राइबल काउंसिल निकोबारी समुदाय की सर्वोच्च प्रतिनिधि संस्था है, जिसे अनुसूचित जनजाति का दर्जा प्राप्त है।
हैरान करने वाली बात यह है कि 7 जनवरी की बैठक से चार दिन पहले, काउंसिल के एक सदस्य को वॉट्सऐप पर एक मैसेज मिला था। इसमें मुख्य सचिव (अंडमान और निकोबार प्रशासन) को संबोधित एक "सरेंडर सर्टिफिकेट" का ड्राफ्ट (टेम्पलेट) सुझाया गया था और इस पर चर्चा के लिए बैठक का अनुरोध किया गया था।
पीटर ने ग्रेट निकोबार द्वीप के नक्शे पर पश्चिमी तट की ओर इशारा करते हुए समझाया, "यह स्पष्ट नहीं है कि अधिकारी हमारी किस पुश्तैनी जमीन की बात कर रहे हैं, लेकिन हमें लगता है कि वे उन इलाकों का सरेंडर चाहते हैं जहां सुनामी से पहले हमारे गांव थे।"
इन गांवों में दक्षिण-पूर्वी तट पर गलाथिया बे में स्थित 'चिंगेन', पेम्माया बे में 'इन हैंग लोई' और पश्चिमी तट पर नंजप्पा बे में स्थित 'कोकेओन' और 'पुलो पक्का' शामिल हैं।
गुरुवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद असिस्टेंट कमिश्नर के कार्यालय में हुई तत्काल बैठक के बारे में मंजू ने बताया, "हमें कहा गया कि गलाथिया बे में स्थित पुराना 'चिंगेन' गांव प्रोजेक्ट के दायरे में आ रहा है। हमसे पूछा गया कि अगर पश्चिमी तट के गांवों को फिर से बसाया जाए, तो क्या हम गलाथिया बे वाले हिस्से की मांग छोड़ने को तैयार हैं? हमें बताया गया है कि अगली बैठक 28 जनवरी को होगी।"
यह पूरा मामला कानूनी विवादों में भी घिरा हुआ है। केंद्रीय जहाजरानी मंत्रालय ने हाल ही में प्रशासन को सूचित किया था कि प्रोजेक्ट के 'इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट' वाले हिस्से के लिए ज़मीनी दौरे की योजना बनाई जा रही है।
दूसरी ओर, कलकत्ता उच्च न्यायालय में प्रोजेक्ट की वन मंजूरी (Forest Clearances) को चुनौती दी गई है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने पिछले सप्ताह अदालत में माना कि केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासन ने अभी तक 'स्टेज-I' मंजूरी की सभी शर्तों का पालन नहीं किया है, जिसमें वन अधिकारों (Forest Rights) का निपटारा भी शामिल है।
अगस्त 2025 में, ट्राइबल काउंसिल ने केंद्रीय जनजातीय मामलों के मंत्री जुएल ओराम से शिकायत की थी कि प्रशासन ने केंद्र को गलत जानकारी दी है कि 2022 में वन अधिकार अधिनियम (FRA) के तहत स्थानीय लोगों के अधिकारों का निपटारा कर दिया गया है। काउंसिल का दावा है कि प्रक्रिया शुरू ही नहीं हुई थी।
बरनबास मंजू ने प्रशासन के विरोधाभास पर सवाल उठाते हुए कहा, "अगर प्रशासन का यह दावा सच है कि हमारे वन अधिकार निपटा दिए गए हैं, तो फिर वे हमसे सरेंडर सर्टिफिकेट जैसे दस्तावेजों पर हस्ताक्षर क्यों मांग रहे हैं?"
प्रोजेक्ट के तहत एक ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, एयरपोर्ट, पावर प्लांट और टाउनशिप का निर्माण होना है, जिसके लिए लगभग 13,000 हेक्टेयर वन भूमि का उपयोग किया जाएगा। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने पिछले साल नवंबर में पर्यावरण मंजूरी को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। वहीं, कलकत्ता उच्च न्यायालय में मार्च 30 से शुरू होने वाले सप्ताह में इस मामले की अंतिम सुनवाई होनी है।
पिछले साल, जब ट्राइबल काउंसिल ने केंद्रीय मंत्री को पत्र लिखा था, तब विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने भी सरकार का ध्यान इस ओर खींचा था और मांग की थी कि लोगों को उनके पैतृक गांवों में पुनर्स्थापित किया जाए।
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