खरगोन: मध्य प्रदेश के 'रॉबिन हुड' कहे जाने वाले महान आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी टंट्या मामा भील की प्रतिमा स्थापना का मामला अब प्रशासन के गले की फांस बन गया है। जनजातीय गौरव दिवस के अवसर पर खरगोन में स्थापित की गई यह प्रतिमा अब सम्मान से ज्यादा विवादों और शर्मिंदगी का कारण बन रही है। दरअसल, जिस जगह पर संगमरमर (मार्बल) या धातु की भव्य प्रतिमा लगनी थी, वहां प्रशासन की नाक के नीचे फाइबर-रिइनफोर्स्ड पॉलीमर (FRP) का ढांचा खड़ा कर दिया गया।
आनन-फानन में हुआ काम, नियमों की उड़ाई गईं धज्जियां
नगर निगम के दस्तावेजों और वरिष्ठ अधिकारियों से मिली जानकारी के मुताबिक, 15 नवंबर की राजनीतिक रूप से अहम समय सीमा (डेडलाइन) को पूरा करने की जल्दबाजी में नियमों को ताक पर रख दिया गया। फंड जारी होने और प्रतिमा पूरी करने के बीच महज 22 दिनों का समय था। हैरानी की बात यह है कि यह काम एक ऐसे ठेकेदार को सौंपा गया, जिसे अधिकारियों के अनुसार, इस तरह की परियोजनाओं का कोई पूर्व अनुभव ही नहीं था।
मामला यहीं नहीं रुका; मूर्ति की डिलीवरी कार्यक्रम से ठीक एक रात पहले देर रात को की गई, जिससे निरीक्षण (इंस्पेक्शन) की कोई गुंजाइश ही नहीं बची। नतीजतन, एक ऐसी प्रतिमा स्थापित कर दी गई जो जिला प्रशासन द्वारा तय की गई शर्तों का खुला उल्लंघन थी। खरगोन नगर निगम द्वारा जारी दस्तावेजों में साफ लिखा था कि "प्रतिमा पत्थर/संगमरमर की बनी होनी चाहिए।"
कलेक्टर ने माना— हुई है भारी चूक
इस मामले पर खरगोन की कलेक्टर भव्य मित्तल ने स्पष्ट किया कि नगर निगम ने इस मामले में बिना किसी सावधानी के जल्दबाजी में कदम उठाया। उन्होंने कहा, "प्रतिमा धातु, पत्थर या किसी अन्य प्राकृतिक सामग्री से बनी होनी चाहिए थी, जैसा कि आमतौर पर महापुरुषों या देवताओं की मूर्तियों के लिए उपयोग किया जाता है।"
कलेक्टर ने आगे बताया कि जब ठेकेदार से सवाल किया गया, तो उसने खुलासा किया कि यह उसका पहला ऐसा असाइनमेंट था। उसने समय सीमा पर डिलीवरी न कर पाने की असमर्थता जताते हुए इसका दोष किसी और पार्टी पर मढ़ दिया, जिससे उसने मूर्ति बनवाई थी।
ठेकेदार ब्लैकलिस्ट, भुगतान रोका गया
इस परियोजना का ठेका 'पिनाक ट्रेडिंग कंपनी, खरगोन' को मिला था। विवाद बढ़ने पर कंपनी के अधिकारियों ने चुप्पी साध ली है। खरगोन नगर निगम की अध्यक्ष छाया जोशी ने पुष्टि की है कि ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया है और परियोजना की निगरानी करने वाले अधिकारियों को नोटिस जारी किए गए हैं।
छाया जोशी ने कहा, "मूर्ति कार्यक्रम से एक रात पहले ही आई थी, इसलिए हम गलती नहीं पकड़ सके। अब हम निरीक्षण में हुई चूक और अन्य मुद्दों की जांच कर रहे हैं। ठेकेदारों को कोई भुगतान नहीं किया गया है।"
परियोजना की देखरेख करने वाले रिपोर्टिंग अधिकारी जितेंद्र मेड़ा ने बताया कि उद्घाटन के बाद ही उन्हें एहसास हुआ कि मूर्ति की गुणवत्ता बेहद खराब है, जिसके बाद 18 नवंबर को नोटिस जारी किया गया। उन्होंने भी माना कि ठेकेदार खुद मूर्तियां नहीं बनाता, बल्कि उसने यह काम आउटसोर्स किया था।
घटनाक्रम: कब क्या हुआ?
इस पूरे मामले की जड़ें 12 दिसंबर, 2022 से जुड़ी हैं, जब मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने खरगोन शहर के बिस्टान नाका तिराहे का नाम बदलकर टंट्या मामा भील के नाम पर रखा था। इसके बाद के प्रमुख घटनाक्रम इस प्रकार हैं:
24 सितंबर, 2025: खरगोन नगर परिषद की बैठक में टंट्या मामा तिराहे के सौंदर्यीकरण और प्रतिमा के लिए 40 लाख रुपये की प्रशासनिक और वित्तीय स्वीकृति दी गई।
27 अक्टूबर, 2025: खरीद प्रक्रिया शुरू हुई। टेंडर में स्पष्ट रूप से "7.5 फीट" की "मार्बल टंट्या मामा प्रतिमा" की मांग की गई थी।
7 नवंबर, 2025: मुख्य नगर पालिका अधिकारी ने सूचित किया कि संबंधित विभागों से अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) प्राप्त कर लिए गए हैं।
बोली प्रक्रिया: तीन बोलियां प्राप्त हुईं, जिनमें पिनाक ट्रेडिंग कंपनी ने सबसे कम 9,90,000 रुपये की दर कोट की और टेंडर हासिल कर लिया।
दस्तावेजों में क्या थीं शर्तें?
नगर निगम की चेकलिस्ट के अनुसार, प्रतिमा की ऊंचाई 108 इंच, चौड़ाई 48 इंच और वजन लगभग 300 किलोग्राम होना चाहिए था। साथ ही स्पष्ट निर्देश थे कि मूर्ति पत्थर या मार्बल की हो। कलेक्टर भव्य मित्तल ने भी 12 नवंबर, 2025 के अपने आदेश में शर्त रखी थी कि "प्रतिमा ठोस पत्थर या धातु की बनी होगी।" ट्रैफिक पुलिस, पीडब्ल्यूडी और बिजली बोर्ड जैसे विभागों से एनओसी भी ली गई थी।
सियासी मायने और जल्दबाजी का कारण
मध्य प्रदेश की सत्ताधारी भाजपा के लिए 15 नवंबर की तारीख बेहद खास है। इसे भगवान बिरसा मुंडा की जयंती के उपलक्ष्य में 'जनजातीय गौरव दिवस' के रूप में मनाया जाता है। राज्य में आदिवासियों की बड़ी आबादी है और वे चुनाव में एक निर्णायक भूमिका निभाते हैं। यही वजह है कि प्रशासन पर इस तारीख तक हर हाल में प्रतिमा का अनावरण करने का भारी दबाव था, जिसके चलते गुणवत्ता से समझौता किया गया और अब यह मामला प्रशासन के लिए फजीहत का कारण बन गया है।
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