ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट: कलकत्ता हाईकोर्ट ने पीआईएल को माना सुनवाई योग्य, आदिवासियों को बताया 'बेहद कमजोर'

कलकत्ता हाईकोर्ट ने 72 हजार करोड़ रुपये के ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट के खिलाफ जनहित याचिकाओं को दी मंजूरी, केंद्र की आपत्तियों को खारिज करते हुए आदिवासियों के अधिकारों और न्यायिक समीक्षा पर दिया जोर।
कलकत्ता हाईकोर्ट
कलकत्ता हाईकोर्ट ने ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट में वन अधिकारों के उल्लंघन पर दायर PIL को मंजूर कर लिया है। कोर्ट ने केंद्र की आपत्तियां खारिज कर आदिवासियों को बताया 'बेहद कमजोर'।
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नई दिल्ली: कलकत्ता उच्च न्यायालय ने ग्रेट निकोबार इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट से जुड़े कथित वन अधिकार अधिनियम के उल्लंघनों को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (पीआईएल) को सुनवाई योग्य माना है। अदालत ने केंद्र सरकार की उस आपत्ति को पूरी तरह से खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि याचिकाकर्ता हैदराबाद की निवासी हैं और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह से नहीं हैं, इसलिए उन्हें यह याचिका दायर करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।

मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पॉल और न्यायमूर्ति पार्थसारथी सेन की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि जनहित याचिकाओं में याचिकाकर्ता के अधिकार क्षेत्र को लेकर कोई सख्त नियम नहीं हो सकता। अदालत ने कहा कि जब मामला कमजोर और हाशिए पर रहने वाले समुदायों से जुड़ा हो, तो सीधे तौर पर प्रभावित न होने वाले व्यक्तियों को भी वास्तविक जनहित के मुद्दे उठाने की अनुमति दी जानी चाहिए।

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) की प्रारंभिक आपत्ति को दरकिनार करते हुए अदालत ने नियम 56 का हवाला दिया। पीठ ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति या वर्ग गरीबी, लाचारी या सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन के कारण न्याय के लिए अदालत नहीं पहुंच सकता, तो आम जनता का कोई भी सदस्य उनकी शिकायत दूर करने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है।

यह पूरा मामला सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी मीना गुप्ता द्वारा दायर तीन जनहित याचिकाओं से संबंधित है। इन याचिकाओं में ग्रेट निकोबार विकास परियोजना से जुड़ी विभिन्न सरकारी कार्रवाइयों को चुनौती दी गई है। इनमें अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 के उल्लंघन और राष्ट्रीय उद्यानों के आसपास इको-सेंसिटिव बफर जोन को कम करने का आरोप लगाया गया है।

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार का तर्क था कि यह जनहित याचिका सुनवाई योग्य नहीं है क्योंकि मीना गुप्ता हैदराबाद की स्थायी निवासी हैं और इस द्वीप में उनका कोई सीधा हित नहीं है। सरकार ने यह भी दलील दी कि यह परियोजना 'महान राष्ट्रीय महत्व' की है। इसमें बंदरगाह, हवाई अड्डा, बिजली स्टेशन और रक्षा सुविधाओं जैसे अहम बुनियादी ढांचे शामिल हैं, जिनकी अनुमानित लागत 72,000 करोड़ रुपये है।

एएसजी का यह भी कहना था कि जिन आदिवासी समुदायों के लाभ के लिए यह याचिका दायर की गई है, वे खुद अदालत में पक्षकार नहीं हैं। सरकार की ओर से दलील दी गई कि रणनीतिक महत्व की परियोजनाओं को लागू करने का राज्य का संप्रभु अधिकार सर्वोपरि होना चाहिए।

इन आपत्तियों का कड़ा विरोध करते हुए याचिकाकर्ता ने आदिवासी कल्याण और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के साथ अपने लंबे और गहरे जुड़ाव का हवाला दिया। अदालत ने मीना गुप्ता की दलीलों पर गौर किया, जिसमें बताया गया था कि वह जनजातीय मामलों के मंत्रालय में सचिव के रूप में कार्य कर चुकी हैं। इसके अलावा, वह वन अधिकार विधेयक के कानून बनने से पहले उसे अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में भी शामिल रही थीं।

याचिकाकर्ता ने 'प्रिमिटिव ट्राइबल ग्रुप्स' शब्द को 'पार्टिक्युलरली वल्नरेबल ट्राइबल ग्रुप्स' (पीवीटीजी) में बदलने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। खंडपीठ ने इस बात को भी रिकॉर्ड पर लिया कि याचिकाकर्ता ने अपने बचपन का एक बड़ा हिस्सा इन द्वीपों में बिताया है और वह ग्रेट निकोबार में आदिवासी अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर लगातार नजर रखती आई हैं।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों, जैसे 'पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स बनाम भारत संघ' और 'उत्तरांचल राज्य बनाम बलवंत सिंह चौफाल' का विस्तार से जिक्र किया। पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि जनहित याचिकाओं का मुख्य उद्देश्य उन वंचित समुदायों को न्याय दिलाना है जो खुद न्यायपालिका तक नहीं पहुंच सकते।

बेंच ने अपनी अहम टिप्पणी में कहा कि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की जनजातीय आबादी 'बेहद कमजोर' है और आम आदमी की उन तक पहुंच बहुत मुश्किल है।

सरकार ने कलकत्ता हाई कोर्ट के एक पुराने फैसले का भी हवाला दिया था, जिसमें दिल्ली के याचिकाकर्ताओं द्वारा पश्चिम बंगाल की रेत नीति के खिलाफ दायर पीआईएल खारिज कर दी गई थी। अदालत ने इसे यह कहते हुए नामंजूर कर दिया कि वर्तमान मामले में याचिकाकर्ता का इस विषय से एक पुराना और वास्तविक संबंध साबित होता है, इसलिए उस फैसले को यहां लागू नहीं किया जा सकता।

खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि सिर्फ इसलिए कि किसी परियोजना में भारी खर्च शामिल है या वह राष्ट्रीय महत्व की है, उसे न्यायिक समीक्षा से छूट नहीं मिल जाती। अदालत ने कहा कि भारी खर्च वाली किसी भी परियोजना को लागू कानूनों के दायरे में ही आगे बढ़ना चाहिए और यह उचित मापदंडों पर न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर नहीं है।

गैलाथिया नेशनल पार्क और कैंपबेल बे नेशनल पार्क के आसपास बफर जोन कम करने से जुड़ी याचिकाओं पर भी सरकार ने 'ऑर्डर II रूल 2 सीपीसी' और 'रेस जुडिकाटा' जैसी कानूनी आपत्तियां उठाई थीं। अदालत ने इन सभी आपत्तियों को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि प्रत्येक याचिका अलग-अलग सरकारी अधिसूचनाओं और अलग-अलग कारणों से उत्पन्न हुई है।

अब इन सभी मामलों को अंतिम सुनवाई के लिए 23 जून 2026 को सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया है।

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