
भोपाल। मध्य प्रदेश सरकार में जनजातीय कार्य मंत्री की मुश्किलें अब और बढ़ती नजर आ रही हैं। भारतीय सेना की अधिकारी कर्नल सोफिया कुरैशी को लेकर की गई कथित अशालीन टिप्पणी के मामले में सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी और पुराने निर्देशों की पुनः पुष्टि के बाद अब राज्य सरकार पर अभियोजन की स्वीकृति को लेकर निर्णय लेना लगभग अनिवार्य हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को स्पष्ट कहा कि 19 जनवरी को दिए गए निर्देशों का पालन किया जाए, जिनमें राज्य सरकार को अभियोजन स्वीकृति पर “उचित निर्णय” लेने को कहा गया था। ऐसे में अब मामला सीधे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के स्तर तक पहुंचना तय माना जा रहा है, क्योंकि मंत्री से जुड़े मामलों में अंतिम प्रशासनिक और राजनीतिक निर्णय मुख्यमंत्री स्तर से ही लिया जाता है।
इस पूरे घटनाक्रम ने राज्य की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी है। विशेष जांच दल (एसआईटी) पहले ही अपनी जांच पूरी कर राज्य सरकार को रिपोर्ट सौंप चुकी है, जिसमें विजय शाह के खिलाफ अभियोजन की स्वीकृति देने की अनुशंसा की गई बताई जा रही है। हालांकि, कई महीनों से सरकार की ओर से इस पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया था। अब सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बाद सरकार के लिए इस मामले को और लंबित रखना आसान नहीं माना जा रहा। गृह विभाग के अधिकारियों के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की प्रति प्राप्त होने के बाद फाइल सामान्य प्रशासन विभाग को भेजी जाएगी और आवश्यकता पड़ने पर विधि एवं विधायी विभाग से कानूनी राय भी ली जा सकती है।
महू की सभा में दिए बयान से शुरू हुआ विवाद, हाई कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर दर्ज कराई थी एफआईआर
पूरा विवाद 12 मई 2025 को इंदौर जिले के महू क्षेत्र के रायकुंडा गांव में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान दिए गए विजय शाह के बयान से शुरू हुआ था। आरोप है कि कार्यक्रम के दौरान उन्होंने सेना की वरिष्ठ अधिकारी कर्नल सोफिया कुरैशी के संबंध में आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। बयान सार्वजनिक होने के बाद राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर तीखी प्रतिक्रिया सामने आई थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए जबलपुर हाई कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया और टिप्पणी को सेना तथा महिला अधिकारी का अपमान मानते हुए पुलिस को प्राथमिकी दर्ज करने के निर्देश दिए थे।
हाई कोर्ट के आदेश के बाद 14 मई 2025 को विजय शाह के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया। इनमें धारा 152, जो देश की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने से संबंधित है, धारा 196(1)(ब), जो सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने वाले कार्यों से जुड़ी है, और धारा 197(1)(स), जो राष्ट्रीय एकता के प्रतिकूल आचरण से संबंधित प्रावधान है, शामिल किए गए थे। इन धाराओं के लगने के बाद मामला केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा बल्कि राष्ट्रीय महत्व और संवेदनशीलता से जुड़ा कानूनी विषय बन गया।
सुप्रीम कोर्ट से गिरफ्तारी पर राहत मिली, लेकिन SIT जांच के आदेश ने बढ़ाई मुश्किल
एफआईआर दर्ज होने के बाद विजय शाह ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। वहां से उन्हें तत्काल राहत के रूप में गिरफ्तारी पर रोक तो मिल गई, लेकिन अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच के लिए विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने के निर्देश दिए। इसके बाद गठित एसआईटी ने कई स्तरों पर जांच की, बयान दर्ज किए और उपलब्ध वीडियो तथा अन्य साक्ष्यों का परीक्षण किया।
19 अगस्त 2025 को एसआईटी ने अपनी जांच रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में सीलबंद लिफाफे में प्रस्तुत की थी। सूत्रों के अनुसार रिपोर्ट में अभियोजन की स्वीकृति देने की अनुशंसा की गई थी, ताकि मंत्री के खिलाफ विधिक कार्रवाई आगे बढ़ाई जा सके। हालांकि, रिपोर्ट मिलने के बाद भी राज्य सरकार की ओर से कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया। अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा पुराने निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने की बात कहे जाने के बाद सरकार पर दबाव बढ़ गया है कि वह अभियोजन स्वीकृति के मुद्दे पर स्पष्ट रुख अपनाए।
मुख्यमंत्री मोहन यादव के सामने राजनीतिक और नैतिक चुनौती
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला अब केवल कानूनी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकार की राजनीतिक और नैतिक जवाबदेही से भी जुड़ चुका है। चूंकि विजय शाह वर्तमान में मंत्री पद पर हैं, इसलिए उनके खिलाफ अभियोजन की अनुमति देने या न देने का निर्णय सरकार की मंशा और राजनीतिक इच्छाशक्ति दोनों को दर्शाएगा। प्रशासनिक प्रक्रिया के अनुसार फाइल सामान्य प्रशासन विभाग से होकर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव तक पहुंचेगी, जहां अंतिम अनुमोदन होना है।
पूर्व अतिरिक्त महाधिवक्ता का कहना है कि अभियोजन की स्वीकृति देना या न देना पूरी तरह राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बाद इस मामले को अधिक समय तक लंबित रखना कठिन होगा। उनका कहना है कि यदि सरकार अभियोजन की अनुमति देती है तो उसके बाद न्यायालय में नियमित सुनवाई शुरू होगी और मंत्री के खिलाफ विधिक प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।
मंत्री पद पर बने रहने को लेकर भी उठ रहे सवाल, लेकिन स्पष्ट कानूनी प्रावधान नहीं
मामले के राजनीतिक प्रभाव को देखते हुए अब विपक्ष और कई सामाजिक संगठनों की ओर से विजय शाह के मंत्री पद पर बने रहने को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि, कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि केवल एफआईआर या अभियोजन स्वीकृति के आधार पर किसी मंत्री को पद छोड़ने के लिए बाध्य करने का कोई स्पष्ट संवैधानिक प्रावधान नहीं है। यह पूरी तरह राजनीतिक नैतिकता और सरकार के विवेक का विषय होता है।
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