
नई दिल्ली: कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने मंगलवार, 26 मई 2026 को केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री जुएल ओराम को एक और पत्र लिखा है। इस पत्र में उन्होंने ग्रेट निकोबार द्वीप में वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) के सही से लागू न होने के मुद्दे को उठाया है। उन्होंने साफ कहा है कि इस संदर्भ में उनके द्वारा उठाई गई चिंताओं का अब तक कोई समाधान नहीं किया गया है।
केंद्र सरकार की 92,000 करोड़ रुपये की विशाल ग्रेट निकोबार द्वीप बुनियादी ढांचा परियोजना को दी गई मंजूरियों पर जयराम रमेश लगातार सवाल उठाते रहे हैं। वह इससे जुड़ी प्रक्रियाओं के कथित उल्लंघन को लेकर कई केंद्रीय मंत्रियों को पत्र लिख चुके हैं। जुएल ओराम को लिखे अपने ताजा पत्र में उन्होंने मांग की है कि जनजातीय कार्य मंत्रालय कलकत्ता उच्च न्यायालय में एफआरए के कार्यान्वयन को सुरक्षित करने के लिए स्पष्ट और निर्णायक रुख अपनाए। गौरतलब है कि मंत्रालय ने बार-बार अदालत से कहा है कि उसे इस मामले में एक पक्ष के रूप में हटा दिया जाए।
जयराम रमेश का यह पत्राचार जुएल ओराम के उस जवाब के बाद आया है, जिसमें उन्होंने एफआरए के उल्लंघन से जुड़ी चिंताओं को खारिज कर दिया था। इस विशाल परियोजना में एक अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, एक हवाई अड्डा और पर्यटन आधारित टाउनशिप का निर्माण शामिल है। अपने जवाब में मंत्री ने तर्क दिया था कि द्वीप का विकास और आदिवासी हितों की रक्षा दोनों एक साथ संभव हैं और आदिवासियों के सभी अधिकार पूरी तरह सुरक्षित हैं।
स्थानीय आदिवासियों के अधिकारों की अनदेखी के मुद्दे पर जयराम रमेश ने कड़ी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि जनजातीय कार्य मंत्री का जवाब एफआरए के विशिष्ट कानूनी उल्लंघनों का समाधान करने के बजाय, वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत स्थानीय आदिवासी समुदायों को मिले अधिकारों की जानबूझकर अनदेखी करने का एक प्रयास लगता है।
इस महीने की शुरुआत में लिखे अपने पत्र में कांग्रेस नेता ने जोर देकर कहा था कि वन भूमि के इस्तेमाल के लिए सहमति निकोबारी और शोम्पेन अनुसूचित जनजातियों की जनजातीय परिषद से नहीं ली गई है। इसके बजाय, उन ग्राम सभाओं से अनुमति ली गई जो बाहरी बसावट वाले परिवारों का प्रतिनिधित्व करती हैं। असल में वन भूमि पर एफआरए के तहत वास्तविक दावा इन्हीं स्थानीय आदिवासियों का है।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि सरकार को अंडमान आदिम जनजाति विकास समिति (AAJVS) के जरिए शोम्पेन समुदाय की सहमति प्राप्त करने की अनुमति देने वाला कोई कानूनी प्रावधान नहीं है।
अपने दावे को पुख्ता करने के लिए जयराम रमेश ने मानवविज्ञानी प्रोफेसर विश्वजीत पांड्या द्वारा तैयार की गई एक वीडियो रिपोर्ट का भी हवाला दिया। इस वीडियो में शोम्पेन समुदाय का एक सदस्य स्पष्ट रूप से कह रहा है कि वे नहीं चाहते कि पहाड़ियों में स्थित उनके जंगलों पर परियोजना के लिए अतिक्रमण किया जाए। रमेश ने कहा कि यह सीधे समुदाय की राय है, जिसका पूरा सम्मान किया जाना चाहिए।
मंगलवार को जनजातीय कार्य मंत्री को लिखे पत्र में जयराम रमेश ने याद दिलाया कि उनके ही मंत्रालय ने इस शर्त पर परियोजना के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) जारी किया था कि एफआरए के सभी प्रावधानों का पालन किया जाएगा। रमेश ने आरोप लगाया कि उस अनिवार्य प्रक्रिया का बिल्कुल पालन नहीं किया गया है।
उन्होंने जुएल ओराम से यह सुनिश्चित करने का आग्रह किया कि चूंकि उनका मंत्रालय इस कानून को लागू करने के लिए नोडल एजेंसी है, इसलिए उसे कलकत्ता उच्च न्यायालय में चल रहे मामले में अपना स्टैंड स्पष्ट करना चाहिए।
कलकत्ता उच्च न्यायालय में दायर किए गए अपने हलफनामों में, जनजातीय कार्य मंत्रालय लगातार यह रुख अपना रहा है कि उसे इस मामले में पक्षकार नहीं बनाया जाना चाहिए। मंत्रालय का तर्क है कि कानून को जमीनी स्तर पर लागू करने की जिम्मेदारी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासन की होती है।
इस पर पलटवार करते हुए रमेश ने कहा कि लंबित रिट याचिका मंत्रालय के लिए कोई बाधा नहीं है। बल्कि यह वन अधिकार अधिनियम 2006 का कड़ाई से कानूनी अनुपालन सुनिश्चित करने का एक बेहतरीन अवसर है, जिसकी खुद न्यायपालिका भी सराहना करेगी।
हिंद महासागर में भारत के रणनीतिक हितों की रक्षा के लिए इस परियोजना के महत्व पर जुएल ओराम के तर्कों का भी रमेश ने जवाब दिया। उन्होंने बताया कि वह ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना के संभावित विकल्पों को लेकर पहले ही रक्षा मंत्री को पत्र लिख चुके हैं। अपने उन सुझावों में उन्होंने ग्रेट निकोबार पर मौजूद आईएनएस बाज़ (INS Baaz) के विस्तार की भी सलाह दी थी।
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