भोपाल की हवा पर NGT सख्त! 100 दिन का विंटर प्लान, धूल-धुएं पर होगी निगरानी

सर्दियों में AQI 336 तक पहुंचने पर बढ़ी चिंता, एनजीटी ने कहा- पहले से तैयारी नहीं हुई तो हालात और खतरनाक होंगे
वायु प्रदूषण सांकेतिक चित्र
वायु प्रदूषण सांकेतिक चित्र
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भोपाल। राजधानी भोपाल की लगातार बिगड़ती हवा अब सिर्फ स्वास्थ्य विभाग या पर्यावरण विशेषज्ञों की चिंता नहीं रह गई है, बल्कि मामला अब सीधे नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) तक पहुंच गया है। राजधानी में बीते सर्दियों के दौरान एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) कई बार 336 तक दर्ज किया गया, जिससे हवा “बहुत खराब” श्रेणी में पहुंच गई थी। इसी गंभीर स्थिति को देखते हुए एनजीटी ने मध्यप्रदेश सरकार, भोपाल नगर निगम और संबंधित विभागों को आगामी सर्दियों से पहले 100 दिन का विस्तृत “विंटर एक्शन प्लान” तैयार करने के निर्देश दिए हैं। ट्रिब्यूनल ने साफ शब्दों में कहा है कि यदि समय रहते प्रभावी तैयारी नहीं की गई तो आने वाले वर्षों में प्रदूषण का संकट और अधिक जानलेवा हो सकता है। एनजीटी ने यह भी स्पष्ट किया कि यह सिर्फ कागजी योजना नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसकी प्रतिदिन निगरानी और जमीन पर क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाए।

पीएम 2.5 और धूल के महीन कण बने बड़ा खतरा, हार्ट अटैक और स्ट्रोक का बढ़ रहा जोखिम

पर्यावरण विशेषज्ञों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने एनजीटी के समक्ष बताया कि भोपाल की हवा में बढ़ रहे पीएम 2.5 और अन्य महीन धूल कण सबसे अधिक खतरनाक साबित हो रहे हैं। ये इतने सूक्ष्म होते हैं कि सांस के जरिए सीधे फेफड़ों और रक्त प्रवाह तक पहुंच जाते हैं। डॉक्टरों के अनुसार लंबे समय तक ऐसी हवा में रहने से हार्ट अटैक, स्ट्रोक, अस्थमा, फेफड़ों की बीमारी, डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर जैसी गंभीर समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है। बच्चों, बुजुर्गों और पहले से बीमार लोगों पर इसका प्रभाव सबसे ज्यादा पड़ता है। विशेषज्ञों ने कहा कि सर्दियों में तापमान गिरने के कारण धूल और धुआं वातावरण में नीचे ही जमा रहता है, जिससे प्रदूषण तेजी से बढ़ता है। यही कारण है कि विंटर सीजन के लिए अलग से विशेष एक्शन प्लान तैयार करने की जरूरत महसूस की गई है।

ट्रैफिक और भारी वाहनों पर सख्ती, लो-इमिशन जोन बनाने का सुझाव

एनजीटी के सामने पेश किए गए सुझावों में शहर के ट्रैफिक सिस्टम में बड़े बदलाव की बात भी कही गई है। विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि सर्दियों के दौरान भारी वाहनों की शहर में एंट्री नियंत्रित की जाए और ट्रैफिक जाम कम करने के लिए प्रमुख चौराहों पर “फ्री लेफ्ट टर्न” व्यवस्था लागू की जाए। इसके साथ ही शहर के कुछ हिस्सों को “लो-इमिशन जोन” घोषित करने का सुझाव भी दिया गया है, जहां ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों की आवाजाही सीमित की जा सके। सार्वजनिक परिवहन, ई-रिक्शा और साइकिल को बढ़ावा देने की बात कही गई है ताकि निजी वाहनों पर निर्भरता कम हो सके। विशेषज्ञों का मानना है कि भोपाल में तेजी से बढ़ते वाहनों की संख्या भी प्रदूषण बढ़ाने की बड़ी वजह बन चुकी है।

सिर्फ योजना नहीं, रोजाना समीक्षा के लिए मॉनिटरिंग कमेटी भी बनेगी

एनजीटी ने अपने निर्देशों में स्पष्ट कहा है कि सिर्फ एक्शन प्लान तैयार करना पर्याप्त नहीं होगा। इसके प्रभावी क्रियान्वयन और निगरानी के लिए अलग से मॉनिटरिंग कमेटी बनाई जाएगी, जो रोजाना स्थिति की समीक्षा करेगी। यह कमेटी अलग-अलग विभागों के बीच समन्वय बनाकर यह सुनिश्चित करेगी कि प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े निर्देशों का पालन हो रहा है या नहीं। ट्रिब्यूनल ने इस बात पर भी जोर दिया कि सभी विभागों की जवाबदेही तय की जाए और लापरवाही मिलने पर जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई हो।

खुले में कचरा और अलाव जलाने पर रोक की सिफारिश

मामले के याचिकाकर्ता राशिद नूर खान ने बताया कि विशेषज्ञों ने खुले में कचरा, पत्तियां, बायोमास और फसल अवशेष जलाने पर पूरी तरह रोक लगाने की सिफारिश की है। उन्होंने कहा कि सर्दियों में जगह-जगह जलने वाले अलाव भी वायु प्रदूषण की बड़ी वजह बनते हैं। विशेषज्ञों ने इसके विकल्प के रूप में एलपीजी और इलेक्ट्रिक हीटर को बढ़ावा देने की बात कही है। इसके अलावा होटल, ढाबों और रेस्तरां में लकड़ी और कोयले से चलने वाले तंदूरों को सीमित करने या बंद करने का सुझाव भी दिया गया है। एनजीटी ने स्थानीय प्रशासन से पूछा है कि ऐसे प्रदूषण स्रोतों पर नियंत्रण के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं।

निर्माण स्थलों की धूल पर भी सख्ती, ग्रीन नेट और पानी छिड़काव अनिवार्य करने की तैयारी

भोपाल में तेजी से चल रहे निर्माण और विध्वंस कार्यों से उड़ने वाली धूल को भी प्रदूषण का बड़ा कारण माना गया है। एनजीटी ने सुझाव दिया है कि सभी निर्माण स्थलों पर ग्रीन नेट लगाना अनिवार्य किया जाए ताकि धूल आसपास के क्षेत्रों में न फैले। नियमों का उल्लंघन करने वाले बिल्डरों और एजेंसियों पर भारी जुर्माना लगाने की सिफारिश भी की गई है। साथ ही नागरिकों की शिकायतों के लिए हेल्पलाइन शुरू करने का सुझाव दिया गया है। नगर निगम को निर्देश दिए गए हैं कि शहर में मशीनीकृत सफाई बढ़ाई जाए, फुटपाथ और डिवाइडरों की वाटर जेट मशीन से धुलाई हो तथा नियमित रूप से पानी का छिड़काव कराया जाए, ताकि सड़कों पर जमी धूल हवा में न उड़ सके।

बढ़ते प्रदूषण के बीच अब सख्त कार्रवाई की उम्मीद

भोपाल लंबे समय तक अपनी हरियाली और झीलों के लिए पहचाना जाता रहा है, लेकिन बीते कुछ वर्षों में बढ़ते निर्माण, वाहनों की संख्या, खुले में कचरा जलाने और अनियोजित शहरीकरण ने शहर की हवा को तेजी से खराब किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अभी भी प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले समय में राजधानी में सांस लेना और अधिक मुश्किल हो सकता है। ऐसे में एनजीटी के निर्देशों को शहर के लिए चेतावनी के साथ-साथ सुधार का अवसर भी माना जा रहा है।

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