
नई दिल्ली: लोकसभा से मंजूरी मिलने के ठीक एक दिन बाद, बुधवार (25 मार्च, 2026) को राज्यसभा में भी ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक पारित हो गया। हालांकि, विपक्षी दलों ने इस कानून का कड़ा विरोध करते हुए इसे आगे की विस्तृत जांच के लिए सदन की प्रवर समिति (सिलेक्ट कमेटी) के पास भेजने की मांग की। विपक्ष का मुख्य तर्क यह था कि इस बिल के नए प्रावधानों से थर्ड जेंडर समुदाय के सम्मान और अधिकारों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
विपक्ष के इन आरोपों पर पलटवार करते हुए केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री वीरेंद्र कुमार ने सरकार का बचाव किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह विधेयक समाज के सभी वर्गों को एक साथ लेकर चलने की एक सार्थक पहल है। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि यह नया कानून केवल उन लोगों को सुरक्षा सुनिश्चित करेगा जो जैविक कारणों से भेदभाव का सामना करते हैं। उन्होंने सदन को यह भी भरोसा दिलाया कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को कानूनी मान्यता और संरक्षण मिलना पहले की तरह ही जारी रहेगा।
मंत्री वीरेंद्र कुमार ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार जैविक कारणों से पीड़ित हर व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने जानकारी दी कि देश के 30 से अधिक राज्यों में ट्रांसजेंडर कल्याण बोर्डों का गठन किया जा चुका है।
उनके मुताबिक, यह नया संशोधन प्रशासनिक स्तर पर स्पष्टता लाएगा और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों को मजबूती से सुरक्षित करेगा। उन्होंने इसे महज एक कानूनी सुधार मानने से इनकार करते हुए कहा कि यह अपनी पहचान के कारण लंबे समय से सामाजिक बहिष्कार झेल रहे लोगों के लिए न्याय का मार्ग प्रशस्त करेगा।
दूसरी तरफ, डीएमके (DMK) सांसद तिरुची शिवा ने इस विधेयक की कड़ी आलोचना करते हुए इसके प्रावधानों पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि ये नए संशोधन ट्रांसजेंडर व्यक्तियों से स्वयं अपनी पहचान तय करने (सेल्फ-आइडेंटिफिकेशन) का अधिकार छीन लेते हैं और लिंग पहचान के लिए उन्हें एक मेडिकल बोर्ड के सामने पेश होने के लिए मजबूर करते हैं।
शिवा ने कहा कि वह संसद में उन लोगों की आवाज उठा रहे हैं जो खुद अपनी बात रखने यहां नहीं आ सकते। उन्होंने मांग की कि इस बिल को सभी हितधारकों, कानूनी विशेषज्ञों, नागरिक समाज और ट्रांसजेंडर समुदाय के साथ विचार-विमर्श के लिए प्रवर समिति के पास भेजा जाना चाहिए।
तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सांसद साकेत गोखले ने आंकड़ों के जरिए सरकार की इस नीति को कटघरे में खड़ा किया। 2011 की जनगणना का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि देश में पांच लाख ट्रांसजेंडर्स की कुल आबादी में से अब तक केवल 32,000 लोगों को ही मौजूदा कानून के तहत प्रमाण पत्र और पहचान पत्र मिल पाए हैं।
उन्होंने कहा कि यह समुदाय पहले से ही समाज के डर से सामने आने में हिचकिचाता है। गोखले ने एक चिंताजनक आंकड़ा देते हुए बताया कि भारत में 31 प्रतिशत ट्रांसजेंडर लोगों ने आत्महत्या का प्रयास किया है, जिनमें से 50 फीसदी की उम्र 20 वर्ष से भी कम थी।
टीएमसी सांसद ने कहा कि यह समुदाय हर दिन जिस तरह का भेदभाव झेल रहा है, उसी के कारण वे आत्महत्या जैसे घातक कदम उठाने को मजबूर हो रहे हैं। उन्होंने सरकार पर तंज कसते हुए कहा कि सामाजिक भेदभाव क्या कम था, जो अब सरकार भी नए कानून के जरिए उनके साथ भेदभाव शुरू करने जा रही है।
गोखले ने आरोप लगाया कि सरकार ऐसे संशोधन विधेयक इसलिए ला रही है क्योंकि वह कानून बनाने के लिए अमेरिका की तरफ देखती है। उनका यह भी कहना था कि भारत सरकार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तरह 'अनवोक' (unwoke) बनना चाहती है।
सीपीएम (CPI-M) सांसद जॉन ब्रिटास ने भी इस नए कानून को एक प्रतिबंधात्मक और लोगों को हाशिए पर धकेलने वाला कदम करार दिया। उन्होंने सदन में एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने रखते हुए कहा कि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त एक समिति ने सरकार को इस कानून के साथ आगे न बढ़ने की स्पष्ट सलाह दी थी। ब्रिटास ने सरकार से सीधा सवाल किया कि उस सलाह का आखिर क्या हुआ और सरकार सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त समिति के अनुरोध पर गंभीरता से विचार क्यों नहीं कर रही है।
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