पूरे देश में मनेगी चक्रवर्ती सम्राट अशोक जयंती; हर बौद्ध कार्यक्रम में अब एक साथ होंगे भगवान बुद्ध, सम्राट अशोक और डॉ. अंबेडकर!

चक्रवर्ती सम्राट अशोक की 2330वीं जयंती कल, द बुद्धिस्ट सोसायटी ऑफ इंडिया का एतिहासिक निर्णय
अब से प्रत्येक कार्यक्रम में भगवान बुद्ध (ज्ञान के प्रतीक), सम्राट अशोक (धम्म विस्तार के प्रतीक) और बोधिसत्व डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर (धम्म क्रांति के प्रतीक) की प्रतिमाएं स्थापित करने और उन्हें वंदन करने का प्रावधान किया गया है।
अब से प्रत्येक कार्यक्रम में भगवान बुद्ध (ज्ञान के प्रतीक), सम्राट अशोक (धम्म विस्तार के प्रतीक) और बोधिसत्व डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर (धम्म क्रांति के प्रतीक) की प्रतिमाएं स्थापित करने और उन्हें वंदन करने का प्रावधान किया गया है।
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मुंबई-  भारतीय बौद्ध धम्म परंपरा को नई दिशा देने वाला एक ऐतिहासिक निर्णय लिया गया है। द बुद्धिस्ट सोसायटी ऑफ इंडिया के बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज ने प्रतिवर्ष चक्रवर्ती सम्राट अशोक की जयंती पूरे देश में मनाने और सभी धम्म कार्यक्रमों तथा बौद्ध विधि संस्कारों में तीन प्रमुख विभूतियों – तथागत बुद्ध, सम्राट अशोक और डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर की प्रतिमाएं अनिवार्य रूप से रखने का फैसला किया है।

यह प्रस्ताव डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर के पौत्र डॉ. भीमराव वाई. अम्बेडकर द्वारा रखा गया था। केंद्रीय मीटिंग 18 मार्च को डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर भवन, दादर पूर्व, मुंबई स्थित केंद्रीय कार्यालय में संपन्न हुई, जिसमें यह निर्णय सर्वसम्मति से पारित किया गया।

बैठक में जोर देकर कहा गया कि चक्रवर्ती सम्राट अशोक का कार्यकाल भारत का स्वर्णिम काल था। उन्होंने न केवल पूरे जंबुद्वीप (वर्तमान भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका और फारस) में 84 हजार स्तूप, धम्मस्तंभ, शिलालेख और बुद्ध विहारों का निर्माण कराया, बल्कि तृतीय धम्मसंगीति का आयोजन करके बौद्ध धम्म को विश्व के विभिन्न देशों में प्रसारित किया। उनके पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका भेजकर धम्म प्रचार की जो परंपरा शुरू की गई, वह आज भी प्रासंगिक है।

बौद्ध धम्म के प्रसार में सम्राट अशोक के योगदान को ध्यान में रखते हुए और डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर के विचारों को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से यह निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अब से प्रत्येक कार्यक्रम में भगवान बुद्ध (ज्ञान के प्रतीक), सम्राट अशोक (धम्म विस्तार के प्रतीक) और बोधिसत्व डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर (धम्म क्रांति के प्रतीक) की प्रतिमाएं स्थापित करने और उन्हें वंदन करने का प्रावधान किया गया है।

पहली बार यह जयंती 26 मार्च, 2026 को सम्राट अशोक की 2330वीं जयंती के रूप में मनाई जाएगी। संगठन ने पूरे देश के सभी राज्यों, जिलों, तालुकाओं, शाखाओं, बौद्धाचार्यों, बौद्ध जनता और अम्बेडकरी समाज से इस ऐतिहासिक निर्णय का पालन सुनिश्चित करने की अपील की है।

सम्राट अशोक का बौध धर्म प्रसार में योगदान

सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद बौद्ध धर्म अपनाकर इसके प्रचार-प्रसार में अतुलनीय योगदान दिया। उन्होंने धर्म प्रचारक देश- विदेश में भेजे, 80,000 से अधिक स्तूप बनवाए, पाटलिपुत्र में तीसरी बौद्ध संगीति बुलाई, और 'धम्म' (नैतिक आचरण) की नीति अपनाकर अहिंसा और शांति का संदेश फैलाया। अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रसार के लिए न केवल भारत में, बल्कि श्रीलंका, ग्रीस, सीरिया, मिस्र और मध्य एशिया में अपने दूत और भिक्षु भेजे। अशोक ने अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका में बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए भेजा, जहाँ उन्होंने बोधि वृक्ष का एक पौधा भी लगाया।  उन्होंने पाटलिपुत्र में तीसरी बौद्ध संगीति का आयोजन किया, ताकि बौद्ध संघ में मतभेदों को दूर किया जा सके और धर्म को सुव्यवस्थित किया जा सके। कलिंग युद्ध के बाद हिंसा छोड़कर, उन्होंने 'धम्म' की नीति अपनाई, जो बौद्ध सिद्धांतों पर आधारित थी। इसमें पशु-हत्या पर रोक, अहिंसा, और धार्मिक सहिष्णुता शामिल थी। उन्होंने चट्टानों और स्तंभों पर बौद्ध शिक्षाओं को अंकित करवाया, ताकि जनता उन्हें पढ़ सके और जीवन में उतार सके।

अब से प्रत्येक कार्यक्रम में भगवान बुद्ध (ज्ञान के प्रतीक), सम्राट अशोक (धम्म विस्तार के प्रतीक) और बोधिसत्व डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर (धम्म क्रांति के प्रतीक) की प्रतिमाएं स्थापित करने और उन्हें वंदन करने का प्रावधान किया गया है।
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अब से प्रत्येक कार्यक्रम में भगवान बुद्ध (ज्ञान के प्रतीक), सम्राट अशोक (धम्म विस्तार के प्रतीक) और बोधिसत्व डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर (धम्म क्रांति के प्रतीक) की प्रतिमाएं स्थापित करने और उन्हें वंदन करने का प्रावधान किया गया है।
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