
नई दिल्ली: महिला आरक्षण कानून को लागू करने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक अहम कदम उठाया है। इसके तहत सरकार ने राज्यों के बीच मौजूदा अनुपात को बरकरार रखते हुए लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या बढ़ाने का सुझाव दिया है। इस मुद्दे पर आम सहमति बनाने के लिए विपक्षी दलों के साथ चर्चा चल रही है। सरकार की योजना है कि सीटों में यह वृद्धि साल 2011 की जनगणना के आधार पर की जाए, जिससे इसे वर्तमान में चल रही जनगणना से अलग रखा जा सके।
'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' को लेकर सोमवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में एक महत्वपूर्ण बैठक हुई। इस बैठक में मौजूद एक विपक्षी सांसद ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन के बाद लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 816 करने का प्रस्ताव रखा गया है। सांसद के मुताबिक, इनमें से करीब 270 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जा सकती हैं।
संसद भवन में हुई इस बैठक में अमित शाह ने बीजेडी, वाईएसआरसीपी, एनसीपी (एसपी), शिवसेना (यूबीटी) और एआईएमआईएम के नेताओं के साथ मुलाकात की। उम्मीद जताई जा रही है कि वे जल्द ही कांग्रेस, टीएमसी, डीएमके और एसपी के नेताओं से भी बातचीत करेंगे। सूत्रों के अनुसार, सरकार मंगलवार को एक सर्वदलीय बैठक बुला सकती है, जिसके बाद इन बदलावों पर कोई ठोस फैसला लिया जाएगा।
बैठक में शामिल दो अन्य पार्टियों के नेताओं ने भी गृह मंत्री द्वारा दिए गए सुझावों की पुष्टि की है। सूत्रों का कहना है कि अमित शाह ने लोकसभा के साथ-साथ विधानसभाओं में भी सीटों की संख्या 50 प्रतिशत तक बढ़ाने का प्रस्ताव दिया है। सरकार की मंशा स्पष्ट रूप से 2029 के आम चुनावों से महिला कोटा लागू करने और इस बढ़ी हुई सीटों की व्यवस्था को सुनिश्चित करने की है।
बीजेपी की एक सहयोगी पार्टी के सांसद ने स्पष्ट किया कि विभिन्न राज्यों की सीटों का आपसी अनुपात पहले जैसा ही रहेगा। इस फैसले से दक्षिण भारतीय राज्यों की उन चिंताओं को दूर करने में मदद मिलेगी, जिसमें वे वर्तमान जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन के चलते जनसंख्या के अनुपात में सीटों के बढ़ने की आशंका जता रहे थे।
गृह मंत्री ने एक और बेहद महत्वपूर्ण सुझाव दिया है, जिसके तहत अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) की आरक्षित सीटों के भीतर भी महिलाओं को कोटा देने की बात कही गई है। समाजवादी पार्टी और आरजेडी जैसी पार्टियां, साथ ही विभिन्न समूहों के पिछड़े वर्ग के नेता लंबे समय से इसकी मांग कर रहे थे।
वर्तमान जनगणना को परिसीमन की प्रक्रिया से अलग रखने का सीधा मतलब यह है कि जातिगत गणना के नतीजों को इसमें शामिल नहीं किया जाएगा। सोमवार की बैठक में मौजूद एक विपक्षी नेता के मुताबिक, अमित शाह ने स्पष्ट किया कि देश में लगभग 81 लाख जाति समूह हैं, इसलिए उन सभी को एक साथ ध्यान में रखना लगभग असंभव काम है।
इन बदलावों को कानूनी रूप देने के लिए सरकार को महिला आरक्षण अधिनियम और परिसीमन आयोग अधिनियम में संशोधन लाना होगा। मौजूदा महिला आरक्षण कानून में यह प्रावधान है कि कोटा वर्तमान जनगणना और परिसीमन के बाद लागू किया जाएगा। अगर संशोधन होता है, तो 2011 की जनगणना के आधार पर इसी साल जून तक एक परिसीमन आयोग का गठन किया जा सकता है। सूत्रों का कहना है कि इन कानूनों में संशोधन के लिए सरकार या तो चालू सत्र की अवधि बढ़ा सकती है या फिर एक विशेष सत्र बुला सकती है।
विपक्षी नेताओं के साथ हुई इस बैठक में अमित शाह ने कथित तौर पर कहा कि सरकार वर्तमान जनगणना प्रक्रिया के पूरा होने का इंतजार नहीं करना चाहती, क्योंकि इसमें 2029 तक का समय लग सकता है। इससे महिला आरक्षण कानून को लागू करने में देरी होगी। दिलचस्प बात यह है कि सितंबर 2023 में 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' पारित होने के दौरान कई विपक्षी दलों ने यही मांग उठाई थी और इसे वर्तमान जनगणना के बाद के परिसीमन से जोड़ने पर सवाल खड़े किए थे।
हालांकि सरकार ने सोमवार की वार्ता के लिए सभी दलों को आमंत्रित किया था, लेकिन कांग्रेस, वामपंथी दल, टीएमसी, आप और डीएमके सहित कई प्रमुख पार्टियां इससे दूर रहीं। इसके बाद कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन के सहयोगियों की एक अलग बैठक बुलाई। इस बैठक में प्रस्तावित बदलावों को लेकर सरकार से एक विस्तृत रिपोर्ट मांगने का निर्णय लिया गया।
इस बीच, टीडीपी सूत्रों ने बताया है कि बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने इस प्रस्ताव को लेकर मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू के साथ भी चर्चा की है।
बैठक में मौजूद एक सांसद ने जानकारी दी कि हर राज्य में महिलाओं के लिए आरक्षित की जाने वाली सीटों का फैसला लॉटरी सिस्टम से करने का प्रस्ताव भी रखा गया है। हालांकि, सांसद ने बताया कि इस बात पर कोई चर्चा नहीं हुई कि ये सीटें हमेशा के लिए तय होंगी या फिर रोटेशन के आधार पर महिलाओं के लिए आरक्षित की जाएंगी।
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