नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (3 अगस्त 2026) को केंद्र सरकार को कड़े शब्दों में यह स्पष्ट कर दिया है कि ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों से जुड़ा नया कानून पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू नहीं किया जा सकता। अदालत ने साफ किया कि इस नए कानून के आ जाने भर से पिछले कानून के तहत समुदाय के सदस्यों को जारी किए गए 'ट्रांसजेंडर कार्ड' खुद-ब-खुद अमान्य नहीं हो जाएंगे।
इस मामले में सामाजिक कार्यकर्ताओं और समुदाय के सदस्यों सहित कई याचिकाकर्ताओं ने अदालत का दरवाजा खटखटाया है। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय से अधिकारियों को ट्रांसजेंडर पहचान पत्र रद्द करने से रोकने की अपील करते हुए कहा कि इन कार्डों के महत्व को केंद्र सरकार द्वारा नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सुनवाई के दौरान ट्रांसजेंडर समुदाय से ही ताल्लुक रखने वाली एक वकील ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए अदालत को बताया कि यह कार्ड उनकी बुनियादी पहचान का एक बेहद अहम हिस्सा है।
उन्होंने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ के सामने अपना दर्द साझा किया। उन्होंने बताया कि उन्हें हर दिन भारी संघर्ष करना पड़ता है और यहां तक कि रहने के लिए एक अदद छत तलाशना भी उनके लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है।
उनकी इस बात पर पीठ में शामिल जस्टिस जोयमाल्या बागची ने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा कि अदालत उनके अधिकारों को लेकर पूरी तरह से चिंतित है और उन्हें न्याय का भरोसा दिलाती है।
याचिकाकर्ताओं की मुख्य चिंता 30 मार्च को लागू हुए 2026 संशोधन अधिनियम को लेकर है, जिसने अधिकारों की बहस को एक नया मोड़ दे दिया है। उनका तर्क है कि इस नए कानून ने सरकार को किसी भी व्यक्ति की लैंगिक पहचान तय करने का असीमित और खतरनाक अधिकार दे दिया है।
अदालत में दलील दी गई कि 2026 का यह अधिनियम सुप्रीम कोर्ट के 2014 के ऐतिहासिक नालसा (NALSA) फैसले की मूल भावना के बिल्कुल विपरीत काम करता है। 2014 के उस फैसले में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अपनी लैंगिक पहचान खुद तय करने के अधिकार को बरकरार रखा गया था और उन्हें हर तरह के भेदभाव से सुरक्षा प्रदान की गई थी।
उसी ऐतिहासिक फैसले के आधार पर ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 लागू हुआ था, जिसने स्व-पहचान के सिद्धांत को मजबूती से स्थापित किया था। लेकिन याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि 2026 अधिनियम की धारा 3 ने विधायिका की एक कलम से इस अधिकार को ही छीन लिया है।
इस गंभीर मसले पर जस्टिस बागची ने केंद्र सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि भले ही कानून में कोई बदलाव हो जाए, लेकिन जो अधिकार पहले ही दिए जा चुके हैं, वे हर हाल में सुरक्षित रहने चाहिए।
जवाब में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका पर प्रतिक्रिया देने के लिए अदालत से और समय की मांग की। उन्होंने तर्क दिया कि जेंडर को लेकर स्पष्टता की कमी से भविष्य में उत्तराधिकार जैसी गंभीर कानूनी समस्याएं पैदा हो सकती हैं, इसलिए कानून का गहराई से परीक्षण करना जरूरी है।
इसके साथ ही सरकार के शीर्ष विधि अधिकारी ने याचिकाकर्ताओं द्वारा ट्रांसजेंडर कार्ड की वैधता बनाए रखने के लिए किसी विशेष अंतरिम निर्देश की मांग पर भी सवाल उठाए। मेहता ने अदालत में कहा कि यह कोई राशन कार्ड नहीं है, जिसके बिना लोगों को खाना नहीं मिलेगा।
मेहता की इस टिप्पणी पर जस्टिस बागची ने कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि यदि विधायिका का इरादा वास्तव में पुराने ट्रांसजेंडर कार्ड को समाप्त करने का होता, तो इसके लिए एक स्पष्ट संशोधन लाया गया होता। 2026 के इस नए कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं दिखता है, जो पुराने कार्डों को रद्द करता हो।
इस अहम कानूनी लड़ाई में लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी जैसे प्रमुख याचिकाकर्ता भी शामिल हैं, जो एशिया-प्रशांत क्षेत्र से संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करने वाले पहले ट्रांसजेंडर व्यक्ति हैं। इसके अलावा उन्होंने कुंभ मेले में भी पहली बार ट्रांसजेंडर समुदाय की ऐतिहासिक भागीदारी का नेतृत्व किया था।
याचिकाकर्ताओं ने अंत में एक सबसे बुनियादी और बड़ा सवाल उठाया है कि क्या सरकार कानून के जरिए यह तय कर सकती है कि कोई व्यक्ति असल में कौन है। उन्होंने इस बात पर गहरी आपत्ति जताई है कि किसी इंसान की अपनी चुनी हुई और स्वायत्त पहचान की जगह सरकार का जैविक या चिकित्सा वर्गीकरण कभी नहीं ले सकता।
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