
उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महराजगंज की एक विशेष अदालत के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एक सब-इंस्पेक्टर, एक कांस्टेबल और करीब 20 अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया गया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि निचली अदालत ने आपराधिक कार्रवाई का आदेश देने से पहले पुलिस रिकॉर्ड और कानूनी सुरक्षा उपायों की ठीक से जांच नहीं की।
निचली अदालत के फैसले को "न्यायिक विवेक का इस्तेमाल न करने" का मामला बताते हुए, हाईकोर्ट ने पूरे उत्तर प्रदेश के न्यायिक अधिकारियों के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने कहा कि जजों को, विशेष रूप से सरकारी कर्मचारियों से जुड़े मामलों में, जांच का आदेश देने से पहले रिकॉर्ड की सावधानीपूर्वक जांच करनी चाहिए और उचित कारण बताते हुए ही आदेश पारित करने चाहिए। इस फैसले को राज्य भर के न्यायिक अधिकारियों, जिला प्रशासन और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के बीच प्रसारित करने का निर्देश दिया गया है।
जस्टिस संतोष राय ने सब-इंस्पेक्टर (एसआई) राकेश कुमार यादव द्वारा दायर अपील को स्वीकार करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि महराजगंज के विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी एक्ट) ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) के प्रावधानों का पर्याप्त रूप से पालन नहीं किया। यह कानून विशेष तौर पर उन सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के अनुरोधों को नियंत्रित करता है, जो अपनी आधिकारिक ड्यूटी का निर्वहन कर रहे हों।
यह पूरा विवाद बसंतपुर गांव की रहने वाली शीला और अंजू द्वारा दायर एक शिकायत से शुरू हुआ था। दोनों महिलाओं ने आरोप लगाया था कि 6 जून को जमीन और वित्तीय विवाद से जुड़ी एक झड़प के बाद, रात के समय पुलिस उनके घर में जबरन घुसी। शिकायत के अनुसार, पुलिसकर्मियों ने घर की महिलाओं के साथ अभद्रता की और जातिसूचक टिप्पणियां कीं। एसपी (SP) के समक्ष दी गई शिकायत पर कोई जवाब न मिलने का दावा करते हुए महिलाओं ने विशेष अदालत का रुख किया था।
महिलाओं की इसी याचिका पर संज्ञान लेते हुए विशेष न्यायाधीश ने 11 अगस्त को घुघली के एसएचओ को पुलिसकर्मियों पर एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया था। निचली अदालत के इसी आदेश को पुलिसकर्मियों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने तथ्यों पर गौर करते हुए पाया कि 6 जून की घटना के संबंध में पहले ही दो क्रॉस-केस दर्ज किए गए थे और एसआई यादव दोनों ही मामलों में जांच अधिकारी थे। पुलिस की जनरल डायरी की प्रविष्टियों से यह साफ हो गया कि पुलिस को एक संज्ञेय अपराध की सूचना मिली थी, जिस पर प्रतिक्रिया देते हुए पुलिस दल मौके पर पहुंचा था और केवल अपनी कानून-व्यवस्था की ड्यूटी निभा रहा था।
जस्टिस राय ने अपने फैसले में जोर देकर कहा कि जब भी सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ आधिकारिक कर्तव्यों से जुड़े किसी कार्य के लिए शिकायत की जाती है, तो अदालतों को बीएनएसएस की धारा 175(3) और 175(4) का अनिवार्य रूप से पालन करना चाहिए। इन धाराओं के तहत अदालतों के लिए हलफनामों और पुलिस रिपोर्ट पर विचार करना, आवश्यक जांच करना और वरिष्ठ अधिकारियों से उनकी टिप्पणियां प्राप्त करना जरूरी है।
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