
नई दिल्ली/बेंगलुरु: आज पूरी दुनिया में 'शून्य भेदभाव दिवस' (Zero Discrimination Day) मनाया जा रहा है। इसी अवसर पर कर्नाटक से एक ऐतिहासिक पहल की खबर सामने आ रही है, जो देश के शैक्षणिक संस्थानों में जातिगत भेदभाव को खत्म करने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो सकती है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार 'रोहित वेमुला अधिनियम' (Rohith Vemula Act) लागू करने जा रही है, जिससे वह ऐसा कानून बनाने वाला देश का पहला राज्य बन जाएगा।
यह विधेयक कर्नाटक राज्य के सभी स्कूल-कॉलेजों में एससी-एसटी-ओबीसी और अल्पसंख्यक छात्रों के साथ हो रहे जातिगत अत्याचार और भेदभाव को रोकने के लिए लाया जा रहा है।
यह विधेयक 2016 में हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में कथित जातिगत भेदभाव के कारण आत्महत्या करने वाले दलित शोधार्थी रोहित वेमुला की स्मृति में लाया जा रहा है। रोहित की मौत के बाद एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन में जाति के आधार पर भेदभाव पर देश भर में बहस छिड़ गई थी।
BANAE के राष्ट्रीय अध्यक्ष नागसेन सोनारे ने बताया कि यह कानून पहली बार आधिकारिक तौर पर यह मान्यता देगा कि रोहित वेमुला दलित थे और उनकी मौत जातिगत भेदभाव का परिणाम थी।
यह कानून मौजूदा SC/ST एक्ट से अलग है। यह एक सिविल कानून होगा, जिसका उद्देश्य मामलों को सीधे कैंपस में ही सुलझाना है ताकि पीड़ित छात्रों को लंबी कानूनी लड़ाई न लड़नी पड़े।
आंतरिक समितियां: हर संस्थान में जातिगत उत्पीड़न के खिलाफ एक आंतरिक समिति बनाना अनिवार्य होगा, जो यौन उत्पीड़न मामलों की समिति (GSCASH) की तरह काम करेगी।
आसान शिकायत: पीड़ित, उनके परिवार या सहपाठी भी भेदभाव के खिलाफ आसानी से शिकायत दर्ज करा सकेंगे।
सख्त सजा: विधेयक में अपराधों को संज्ञेय और गैर-जमानती बनाने का प्रावधान है। सबसे अहम बात यह है कि यदि कोई संस्थान इस कानून का उल्लंघन करता है तो राज्य सरकार उसे कोई आर्थिक सहायता या अनुदान नहीं देगी।
हाल ही में 26 फरवरी को कर्नाटक कैबिनेट ने इस विधेयक के मसौदे को मंजूरी दी थी। इसे 7 मार्च से शुरू हो रहे विधानसभा सत्र में पेश किए जाने की संभावना थी।
हालांकि, 27 फरवरी को सरकार ने इस विधेयक को पेश करने को फिलहाल टाल दिया है। कानून मंत्री एच.के. पाटिल ने बताया कि कैबिनेट ने गृह विभाग से कुछ स्पष्टीकरण मांगे हैं। स्पष्टीकरण मिलने के बाद अगली कैबिनेट बैठक में इस पर फैसला लिया जाएगा। हालांकि कैबिनेट की मंजूरी से साफ है कि सियासी इच्छाशक्ति मौजूद है और विधेयक जल्द ही पारित हो सकता है।
यह टालना कानूनी प्रक्रिया में एक सामान्य प्रक्रिया है जिससे पता चलता है कि सरकार कानूनी रूप से पुख्ता होना चाहती है, खासकर मानवाधिकारों के मामलों में। इसे होम डिपार्टमेंट को भेजने से पता चलता है कि इसे लागू करने के तरीकों और कानूनी प्रक्रियाओं पर ध्यान दिया जा रहा है। रोहित वेमुला बिल में OBC को शामिल करने को लेकर जो साफ़ नहीं है, वह बहुत ज़रूरी है, क्योंकि यह SC/ST समुदायों के अलावा दूसरे पिछड़े तबकों को भी सुरक्षा देने पर हो रही बड़ी बहस को छूता है, जिन्हें इसी तरह के सिस्टमिक बहिष्कार का सामना करना पड़ रहा है।
इस कानून की आवश्यकता क्यों है, यह हाल के RTI डेटा से साफ हो जाता है। देश के टॉप संस्थानों में SC-ST समुदाय के शिक्षकों (फैकल्टी) की स्थिति बेहद खराब है:
IIT-दिल्ली: 1,093 फैकल्टी पदों में से सिर्फ 45 SC, 17 ST और 103 OBC पद भरे गए हैं।
IIT-गुवाहाटी: 743 पदों में से सिर्फ 22 SC, 5 ST और 23 OBC फैकल्टी हैं।
IIM-बैंगलोर: 120 फैकल्टी पदों में से सिर्फ 5 SC और 1 ST पद भरे गए हैं।
IIM-इंदौर और IIM-कोझिकोड: IIM-इंदौर में तो एक भी SC या ST फैकल्टी नहीं है।
बता दें कि पिछले दो दशकों में IIT के 150 छात्रों ने आत्महत्या की है, जिनमें से अधिकांश SC-ST-OBC समुदाय से थे। ये आंकड़े बताते हैं कि कैंपस में 'जातिवाद' और 'बहिष्कार' आज भी एक कड़वी सच्चाई है।
इस कानून की चर्चा ऐसे समय में हो रही है जब केंद्रीय यूजीसी (University Grants Commission) के नए समानता नियमों (UGC 2026 Regulations) पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। कोर्ट ने इसे 'अस्पष्ट और दुरुपयोग वाला' करार दिया था।
ऐसे में जब केंद्र स्तर पर कोई ठोस कानून नहीं बन पा रहा है, तो कर्नाटक जैसे राज्यों की यह पहल और भी अहम हो जाती है। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के आश्वासन के बाद कर्नाटक सरकार ने यह कदम उठाया है।
BANAE के राष्ट्रीय अध्यक्ष नागसेन सोनारे ने इस ऐतिहासिक फैसले के लिए राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और पूरी कर्नाटक सरकार का आभार व्यक्त किया है। उन्होंने उम्मीद जताई कि बाकी सभी राज्य भी कर्नाटक के इस कदम का अनुसरण करेंगे और अपने राज्यों में भी इस तरह के कानून लाएंगे।
सोनारे ने कहा, "आज शून्य भेदभाव दिवस पर हम सबका संकल्प है कि जब तक हर कैंपस, हर संस्थान से जातिवाद की जड़ें नहीं निकल जातीं, हमें रुकना नहीं है। रोहित वेमुला अधिनियम इसी लड़ाई की पहली बड़ी जीत होगी।"
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