बेंगलुरु: कर्नाटक की कांग्रेस सरकार द्वारा 'रोहित वेमुला विधेयक' (Rohith Vemula Bill) के मसौदे को जारी करने में हो रही देरी ने अब तूल पकड़ लिया है। दलित कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों और छात्रों ने सरकार से कड़े शब्दों में मांग की है कि इस मसौदे को तुरंत सार्वजनिक किया जाए और आगामी बजट सत्र के दौरान ही इसे शिक्षण संस्थानों में लागू किया जाए। कार्यकर्ताओं ने साफ चेतावनी दी है कि अगर सरकार ने इस पर जल्द कोई ठोस कदम नहीं उठाया, तो वे बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन करने के लिए मजबूर होंगे।
समान शिक्षा के लिए 'पीपुल्स ड्राफ्ट' तैयार
पिछले दो वर्षों से सक्रिय "कैंपेन फॉर रोहित वेमुला एक्ट" (Campaign for Rohith Vemula Act) ने इस दिशा में एक "पीपुल्स ड्राफ्ट" (जन-मसौदा) तैयार किया है। इस मसौदे का मुख्य उद्देश्य अनुसूचित जाति और जनजाति (SC/ST) के छात्रों को समान शैक्षिक अवसर प्रदान करना और शिक्षण संस्थानों से जातिगत भेदभाव को पूरी तरह से खत्म करना है। गौरतलब है कि पिछली बैठकों के दौरान यह मसौदा राज्य सरकार को सौंपा भी जा चुका है।
सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप
मसौदे को लाने में हो रही देरी की निंदा करते हुए, दलित संघर्ष समिति (अंबेडकर वाद) के राज्य संयोजक मवल्ली शंकर ने अपनी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा, "राज्य सरकार ने पहले ही रोहित एक्ट को लागू करने का वादा किया था। यह बेहद खेदजनक है कि अब तक न तो मसौदे को सार्वजनिक किया गया है और न ही विधानसभा में इस पर कोई चर्चा हुई है।"
शंकर ने जोर देकर कहा कि दलित और आदिवासी छात्रों के लिए उच्च शिक्षा में समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए यह कानून अनिवार्य है। उन्होंने कहा, "संविधान की कसमें खाने वाली कांग्रेस पार्टी को प्रस्तावना के मूल्यों को हकीकत में बदलने के लिए ठोस कदम उठाने ही होंगे। रोहित वेमुला एक्ट को लागू करना कर्नाटक के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में गरिमा, समानता और न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम साबित होगा।"
कर्नाटक का रहा है सुधारवादी इतिहास
इस विधेयक के मसौदे के लिए शोध कार्य करने वालीं, नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (NLSIU), बैंगलोर की असिस्टेंट प्रोफेसर आशना सिंह ने इस कानून की आवश्यकता पर ऐतिहासिक तर्क दिए। उन्होंने कहा, "जातिगत पदानुक्रम को तोड़ने के लिए, सरकारी नौकरियों में आरक्षण सबसे पहले मैसूर के वाडियार शासकों के शासनकाल में लागू किया गया था।"
प्रोफेसर सिंह ने आगे बताया कि कर्नाटक का दलितों, आदिवासियों और बहुजनों की सुरक्षा के लिए विशेष कानून बनाने का एक समृद्ध इतिहास रहा है। राज्य में पीटीसीएल (PTCL), केटीपीपी (KTPP), देवदासी प्रथा का उन्मूलन और सामाजिक बहिष्कार विरोधी जैसे कानून पहले से मौजूद हैं।
उन्होंने कहा, "इसी ऐतिहासिक भावना को आगे बढ़ाते हुए, अब रोहित एक्ट को लागू करना वक्त की मांग और एक बड़ी आवश्यकता है।"
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