पटना, बिहार। गंगा की उफनती लहरों ने जब नथमलपुर और सिन्हा जैसी पंचायतों की जमीन को अपने आगोश में लिया, तो हजारों परिवार विस्थापित होकर तटबंधों और ऊंचे रास्तों पर आ बसे। इन अस्थाई बस्तियों में सिर्फ घर ही नहीं टूटे, बल्कि सुरक्षा का वह सामाजिक ढांचा भी चरमरा गया जो किशोरियों को बाल विवाह जैसी कुरीतियों से बचाता था।
विस्थापन का दर्द यहाँ सिर्फ सिर से छत छिनना नहीं है, बल्कि उस गरिमा और कानून के डर का खत्म होना भी है जो कभी इन परिवारों के पास अपनी जमीन पर हुआ करता था। लेकिन इस कहानी का सबसे स्याह पहलू गरीबी नहीं, बल्कि वह प्रशासनिक और राजनीतिक 'मौन' है, जिसे व्यवस्था की भाषा में 'बैलेट ब्लेसिंग' कहा जा सकता है।
यहाँ बाल विवाह सिर्फ एक सामाजिक मजबूरी नहीं, बल्कि स्थानीय जनप्रतिनिधियों की मूक सहमति और 'आधार' के संगठित फर्जीवाड़े से तैयार किया गया एक कानूनी छल है।
वोट बैंक की राजनीति और 'मौन' का समझौता
विस्थापित क्षेत्रों में बाल विवाह को रोकने की नैतिक जिम्मेदारी जिनके कंधों पर थी, वही अब इसे खाद-पानी दे रहे हैं। नथमलपुर के पूर्व मुखिया बूटन सिंह बड़े बेबाक अंदाज में इस कड़वी सच्चाई को स्वीकार करते हैं। वे कहते हैं:
आज के समय में कोई भी प्रतिनिधि किसी के घर में हस्तक्षेप नहीं करना चाहता। सबको अपना वोट बैंक प्यारा है। चुनाव के समय एक-एक वोट की कीमत होती है। अगर मुखिया या सरपंच किसी का बाल विवाह रुकवाते हैं, तो वह पूरा परिवार, उनके रिश्तेदार और पूरा कुनबा उनके खिलाफ हो जाता है। वोट बिगड़ने के डर से लोग जानते हुए भी अपनी आँखें मूंद लेते हैं।
बूटन सिंह की यह स्वीकारोक्ति उस 'सिस्टम' की पोल खोलती है जहाँ कानून से बड़ा जनाधार हो गया है।
प्रशासनिक सक्रियता भी यहाँ शून्य के बराबर है। पूर्व प्रतिनिधि आगे बताते हैं कि, हकीकत तो यह है कि हमें ब्लॉक (BDO) या अंचल (CO) कार्यालय से कभी ऐसे स्पष्ट निर्देश या आदेश नहीं मिलते कि हम अपनी पंचायतों में बाल विवाह की सघन निगरानी करें। जब ऊपर से प्रशासनिक दबाव ही नहीं है, तो कोई स्थानीय नेता अपना वोट खराब करने का जोखिम क्यों लेगा?
आधार कार्ड: अवैध विवाह का नया 'कानूनी पासपोर्ट'
इस खोजी पड़ताल का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा 'आधार कार्ड' की हेराफेरी है। यह केवल एक कार्ड नहीं, बल्कि बाल विवाह को वैध बनाने वाली एक चाबी बन गया है। समाजसेवी और वरिष्ठ नेता विश्वनाथ प्रताप सिंह, जिन्होंने खुद कई बाल विवाहों को रुकवाने के लिए जमीनी लड़ाई लड़ी है, इस व्यवस्था पर सीधा प्रहार करते हैं। वे बताते हैं कि कैसे....
विश्वनाथ सिंह कहते हैं, यह सब स्थानीय प्रतिनिधियों की मिलीभगत के बिना मुमकिन नहीं है। आधार कार्ड में उम्र बढ़वाने के लिए मुखिया के कार्यालय से जारी दस्तावेजों और उनके हस्ताक्षरों का इस्तेमाल होता है। यह एक ऐसा मकड़जाल है जहाँ बिचौलिए और आधार केंद्र संचालक चंद रुपयों के लिए बच्ची की उम्र बदल देते हैं।
सफेद झूठ का पर्दा: जनप्रतिनिधियों की उदासीनता
जब जमीनी हकीकत और इन गंभीर आरोपों को लेकर सिन्हा पंचायत के वर्तमान मुखिया धनजी शाह से बात की गई, तो वहाँ केवल सफेद झूठ का पर्दा दिखाई दिया। धनजी शाह दावों के विपरीत कहते हैं, "हमारे यहाँ ऐसी कोई समस्या नहीं है। हम लोग जागरूक हैं और सरकार की योजनाओं का पूरी तरह पालन करा रहे हैं। हमारे पास ऐसी कोई शिकायत नहीं आई है कि कहीं बाल विवाह हो रहा हो।"
जब उनसे आधार कार्ड में धांधली और बिचौलियों की सक्रियता पर तीखे सवाल पूछे गए, तो उन्होंने इसे सिरे से खारिज कर दिया। सत्ता में बैठे प्रतिनिधियों का यह 'सब ठीक है' वाला रवैया ही वह मुख्य कारण है जिसके चलते बाल विवाह की जड़ें और गहरी होती जा रही हैं।
प्रशासनिक लाचारी और ग्रासरूट का 'अंधेरा'
इस पूरे खेल में जिला प्रशासनिक तंत्र की भूमिका सबसे अधिक सवालों के घेरे में है। भोजपुर के असिस्टेंट डिस्ट्रिक्ट चाइल्ड प्रोटेक्शन ऑफिसर (ADCPU) के साथ हुई विस्तृत बातचीत विभाग के खोखलेपन को उजागर करती है। अधिकारी ने स्वीकार किया कि जिले के प्रमुख अधिकारी मुख्यालय में बैठते हैं, जबकि अनुमंडल स्तर पर निगरानी के लिए कोई स्वतंत्र स्टाफ नहीं है। वे पूरी तरह से 1098 (चाइल्डलाइन) या बाहरी सूचना पर निर्भर हैं।
लेकिन, प्रशासन जिस 'सूचना तंत्र' की बात करता है, उसकी जमीनी हकीकत कुछ और ही है। बलुआ पंचायत की आंगनवाड़ी सेविका रमावती देवी और इजरी पंचायत के मनीराय के टोला की सेविका रंभा देवी के बयान इस तंत्र की धज्जियां उड़ा देते हैं।
इन सेविकाओं का स्पष्ट कहना है कि "हमें विभाग या जिला प्रशासन की तरफ से बाल विवाह की निगरानी करने या उसकी जानकारी देने का कोई विशेष निर्देश प्राप्त नहीं है।"
वे मानती हैं कि यह जगजाहिर है कि बाल विवाह वर्जित है, लेकिन जब उन्हें इसे रिपोर्ट करने के लिए निर्देशित ही नहीं किया गया, तो वे जोखिम क्यों लें? ग्रासरूट लेवल की कार्यकर्ताओं का यह बयान साबित करता है कि प्रशासन और फील्ड के बीच 'कनेक्टिविटी फेलियर' है। जब गाँव की सबसे मजबूत कड़ी को ही जिम्मेदारी से बाहर रखा गया हो, तो विस्थापित बस्तियों में होने वाले विवाहों की सूचना मुख्यालय तक पहुँचना असंभव है।
अधिकारी ने भी यह माना कि विस्थापित बस्तियों जैसे उच्च-जोखिम वाले क्षेत्रों के लिए विभाग के पास कोई 'विशेष निगरानी इकाई' नहीं है। वे कहते हैं, "जब तक समाज के लोग या जनप्रतिनिधि खुद आगे आकर हमें जानकारी नहीं देते, हमारा वहां पहुंचना मुश्किल होता है।"
छीन ली गई पहचान
भोजपुर की इन विस्थापित बस्तियों में बाल विवाह अब केवल एक कुरीति नहीं रही। यह वोट बैंक की राजनीति, प्रशासनिक उदासीनता और तकनीकी फर्जीवाड़े का एक घातक कॉकटेल बन चुका है। आंगनवाड़ी सेविकाओं से लेकर जिला अधिकारियों तक की बातों में एक ही बात समान है— जिम्मेदारी का अभाव। सैंकड़ों किशोरियां हैं जिनका बचपन 'आधार' के फर्जी अंकों के पीछे दफन हो गया है। भविष्य में जब ये लड़कियां अपने कागजात देखेंगी, तो उन्हें शायद यह भी याद नहीं रहेगा कि उनकी असल उम्र क्या थी।
जब तक पंचायत प्रतिनिधि 'वोट' से ऊपर उठकर 'बेटी' के भविष्य को नहीं देखेंगे और प्रशासन मुख्यालय की फाइलों से निकलकर ग्राउंड पर अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कराएगा, तब तक 'बैलेट ब्लेसिंग' का यह खेल मासूमों की जिंदगी से ऐसे ही खेलता रहेगा। विस्थापन ने उन्हें जमीन से बेदखल किया था, पर इस राजनीतिक और प्रशासनिक मिलीभगत ने उनसे उनका भविष्य और उनकी पहचान भी छीन ली है।
बाल विवाह को रोकने में अपनी भूमिका निभाएं
यदि आपको कहीं भी बाल विवाह होने की जानकारी मिलती है, तो तुरंत भारत सरकार की हेल्पलाइन नंबर चाइल्डलाइन 1098 या पुलिस हेल्पलाइन 100 पर कॉल करें। आपकी एक सूचना किसी मासूम का भविष्य बचा सकती है। यह सेवा 24 घंटे उपलब्ध है और सूचना देने वाले की पहचान पूरी तरह गुप्त रखी जाती है।
यह विशेष खोजी रिपोर्ट पापुलेशन फर्स्ट की 'लाडली मीडिया फेलोशिप 2026' के अंतर्गत तैयार की गई है।
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