उत्तर प्रदेश: सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के एक विधान परिषद सदस्य (एमएलसी) ने राज्य सरकार से उन गांवों और कस्बों के नाम बदलने की मांग की है, जिनके नाम दलित जातियों पर रखे गए हैं। उनका कहना है कि इस तरह के नाम समुदाय के लिए अपमानजनक हैं। मंगलवार को बीजेपी एमएलसी लालजी प्रसाद निर्मल ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात कर उन्हें ऐसे नामों की एक सूची सौंपी और प्रदेश भर में इस तरह के गांवों को चिन्हित कर उनके नाम बदलने का आग्रह किया है।
लालजी प्रसाद निर्मल द्वारा मुख्यमंत्री को सौंपी गई सूची में कई जिलों के गांव शामिल हैं। इनमें जालौन जिले के चमारी, चमरौआ, चमेड़ और चमारसेना, इटावा का चमरौली, उन्नाव का भँगियाना, झांसी का चमरौआ, लखनऊ का चमरन खेड़ा और हरदोई जिले का नटपुरवा जैसे नाम प्रमुख रूप से शामिल हैं। इसके अलावा, राज्य के रामपुर जिले में तो 'चमरौआ' नाम से एक पूरी विधानसभा सीट भी मौजूद है।
इसी बीच, बहुजन सशक्तिकरण संघ (बीएसएस) ने भी मुख्यमंत्री को एक पत्र लिखकर अपना विरोध दर्ज कराया है। संगठन के अध्यक्ष नानक चंद ने जालौन जिले की कालपी तहसील के 'चमारी' गांव का नाम बदलने का विशेष अनुरोध किया है। उन्होंने अपने पत्र में स्पष्ट किया है कि गांव का यह मौजूदा नाम पूरी तरह से 'जातिसूचक' और सामाजिक रूप से 'आपत्तिजनक' लगता है, जिससे समाज के एक बड़े वर्ग की भावनाएं आहत होती हैं।
उन्होंने इस गांव का नाम बदलकर कोई सम्मानजनक और प्रेरणादायक नाम रखने की पुरजोर मांग की है।
अम्बेडकर महासभा ट्रस्ट के अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी निभा रहे एमएलसी लालजी प्रसाद निर्मल ने अपने पत्र में लिखा है कि प्रदेश के विभिन्न जिलों में अनुसूचित जाति के नाम वाले ऐसे कई गांव मौजूद हैं, जो दलितों को अपमानित महसूस कराते हैं।
उन्होंने चिंता जताई है कि राज्य के लगभग हर जिले में ऐसे नाम वाले गांव मिल जाएंगे और इससे दलित समुदाय में असुरक्षा तथा असहजता की भावना पैदा हो सकती है। उनका तर्क है कि जातियों के आधार पर गांवों या संस्थानों का नामकरण करना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है क्योंकि यह सीधे तौर पर दलितों की भावनाओं को ठेस पहुंचाता है।
मीडिया से बातचीत के दौरान निर्मल ने एक महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु भी उठाया। उन्होंने कहा कि अगर कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी दलित को चमरौआ या चमरखेड़ा जैसे शब्दों से बुलाता है, तो यह अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम यानी एससी/एसटी एक्ट के तहत एक दंडनीय अपराध है। ऐसे में जब ये शब्द इतने संवेदनशील और गैर-कानूनी हैं, तो भला इनका इस्तेमाल किसी गांव, संस्था या जिले के नामकरण के लिए कैसे किया जा सकता है।
उन्होंने माना कि संभवतः आजादी से पहले ऐसे नाम प्रचलन में रहे होंगे, लेकिन देश के स्वतंत्र होने और नए समानता आधारित कानून लागू होने के बाद इन नामों को तुरंत सुधारा जाना चाहिए था, जिस पर दुर्भाग्य से किसी ने ध्यान नहीं दिया।
साल 2011 की जनगणना की ग्राम निर्देशिका के एक विस्तृत विश्लेषण से यह तथ्य सामने आता है कि उत्तर प्रदेश में 2,865 गांव ऐसे हैं जिनके नाम जातियों, उप-जातियों और गोत्रों पर रखे गए हैं। इनमें ब्राह्मण, ठाकुर, बनिया, कायस्थ, यादव, जाट, गुर्जर, कुर्मी, लोध और दलित समेत कई अन्य जातियां शामिल हैं। इन गांवों के नामों में बभनपुर, शुक्लगंज, ठकुराई और हरिजनपुर जैसे नाम स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं।
गांवों के नाम बदलने की यह मांग ऐसे अहम समय में उठी है जब 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले राज्य में ब्राह्मणों और दलितों के सम्मान के मुद्दे पर जातीय राजनीति तेजी से गरमा रही है। सभी प्रमुख राजनीतिक दल दलित वोट बैंक को अपने पक्ष में करने की कोशिश में जुटे हैं। अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी ने बसपा संस्थापक कांशीराम की जयंती को 15 मार्च को 'पीडीए दिवस' के रूप में मनाने और पूरे राज्य में बड़े कार्यक्रम आयोजित करने का ऐलान किया है।
हालांकि, इस फैसले को लेकर बसपा सुप्रीमो मायावती ने अखिलेश यादव की कड़ी आलोचना की है। वहीं, कांग्रेस ने भी कांशीराम की 92वीं जयंती को 'सामाजिक परिवर्तन दिवस' के रूप में मनाने की घोषणा की है। इस मौके पर 13 मार्च को लखनऊ में कांग्रेस के ओबीसी और एससी विभाग द्वारा एक विशाल कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है, जिसमें लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल होंगे।
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