
नई दिल्ली: मार्च 2024 में, भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने देशभर की करीब सौ जेलों को सुरक्षित और स्वस्थ खान-पान को बढ़ावा देने के लिए 'ईट राइट कैंपस' का प्रमाणपत्र दिया था। दिलचस्प बात यह है कि इनमें सबसे ज्यादा प्रमाणित जेलें उत्तर प्रदेश की थीं। बीते कुछ वर्षों में राज्य की कई जेलों ने FSSAI से "फाइव-स्टार" रेटिंग भी हासिल की है।
लेकिन अब इस शानदार रिकॉर्ड पर एक बड़ा सवालिया निशान लग गया है। हाल ही में सामने आए दस्तावेजों से पता चला है कि पिछले साल नवंबर में उत्तर प्रदेश जेल प्रशासन और सुधार विभाग को सप्लाई किए गए करोड़ों रुपये के मसाले गुणवत्ता परीक्षण में बुरी तरह फेल हो गए थे।
दस्तावेजों के अनुसार, हल्दी, लाल मिर्च, तेजपत्ता, काली मिर्च, दालचीनी और बड़ी इलायची जैसे रोजमर्रा के छह प्रमुख मसाले लखनऊ स्थित क्षेत्रीय खाद्य अनुसंधान एवं विश्लेषण केंद्र की जांच में खरे नहीं उतर पाए। हैरान करने वाली बात यह है कि इसी बैच को बाद में हापुड़ जिले की एक निजी प्रयोगशाला में भेजा गया, और वहां से पास होने के बाद इन मसालों की खरीद कर ली गई।
लखनऊ स्थित सरकारी लैब की रिपोर्ट बेहद चिंताजनक है। जांच में पाया गया कि खरीदे गए मसालों में "बाहरी तत्व" तय सीमा 1% के मुकाबले 50% तक थे। वहीं, एक सैंपल में "कीड़ों द्वारा क्षतिग्रस्त हिस्सा" 40% से अधिक पाया गया था।
इस गंभीर मामले पर जेल प्रशासन और सुधार सेवाओं के अतिरिक्त महानिरीक्षक (IG) धर्मेंद्र सिंह का कहना है कि हापुड़ लैब की रिपोर्ट के आधार पर मसालों को मंजूरी दी गई। उन्होंने बताया कि पहले जब कुछ आइटम टेस्टिंग के मापदंडों पर खरे नहीं उतरे थे, तो उस ऑर्डर को रद्द कर दिया गया था और एक बैच का दोबारा परीक्षण कराया गया। दूसरी बार में सभी मानक स्पष्ट रूप से पास हो गए थे।
सूत्रों की मानें तो उसी बैच के एक अलग सैंपल का परीक्षण कर उसे पास किया गया था। जब प्राइवेट लैब में जांच कराने पर सवाल पूछा गया, तो धर्मेंद्र सिंह ने स्पष्ट किया कि 'वाणी एनालिटिकल रिसर्च प्राइवेट लिमिटेड' NABL (नेशनल एक्रिडिटेशन बोर्ड फॉर टेस्टिंग एंड कैलिब्रेशन लैबोरेटरीज) से मान्यता प्राप्त है। विभाग के पास सरकारी या NABL प्रमाणित लैब, दोनों में से किसी भी जगह जांच कराने का विकल्प मौजूद है।
हापुड़ के शाहपुर फगौता गांव में स्थित इस प्राइवेट लैब का संचालन एक तीन मंजिला इमारत में होता है, जहां कुल 25 कर्मचारी काम करते हैं। लैब के मालिक और निदेशक सुदर्शन मित्तल ने बताया कि उनके पास पूरे भारत से सैंपल आते हैं। उत्तर प्रदेश जेल विभाग द्वारा भेजे गए मसालों के सैंपल कोरियर के जरिए उनके पास पहुंचे थे, जिन्होंने जांच के सभी मापदंडों को सफलतापूर्वक पार कर लिया था।
दूसरी ओर, दिल्ली के एक वरिष्ठ खाद्य विशेषज्ञ ने लखनऊ लैब की रिपोर्ट का हवाला देते हुए इसे FSSAI मानकों के खिलाफ बताया। नाम न छापने की शर्त पर उन्होंने स्पष्ट किया कि ये मसाले गुणवत्ता में बेहद घटिया हैं। इनका सेवन पूरी तरह से असुरक्षित है और यह कैदियों के स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक साबित हो सकता है।
हल्दी: क्षेत्रीय खाद्य अनुसंधान केंद्र ने पाया कि हल्दी के सैंपल में बाहरी तत्व कुल वजन का 1.0% से अधिक नहीं होना चाहिए। लेकिन 24 जनवरी 2026 को जांचे गए हल्दी के एक बैच में यह 11.12% और दूसरे में 38.89% था। इसके अलावा, कीड़ों द्वारा खराब किया गया हिस्सा भी तय 1% की सीमा से काफी ज्यादा, 5.5% पाया गया।
काली मिर्च: FSSAI नियमों के अनुसार काली मिर्च में 2% तक बाहरी तत्वों की अनुमति है। हालांकि, केंद्र द्वारा जांचे गए काली मिर्च के सैंपल में यह मात्रा 14.26% पाई गई, जो तय मानक से कई गुना अधिक है।
बड़ी इलायची: इस मसाले के लिए बाहरी तत्वों की स्वीकृत सीमा वजन का 1% है, जबकि सैंपल में यह करीब एक चौथाई यानी 21.40% तक मिला। वहीं, कीड़ों द्वारा क्षतिग्रस्त हिस्से की सीमा भी 1% तय है, लेकिन परीक्षण में एक सैंपल में यह 7.9% और दूसरे में 4.16% निकला।
दालचीनी: दालचीनी के मामले में भी बाहरी तत्व 1% से ज्यादा नहीं होने चाहिए। लेकिन जांच में एक सैंपल में यह आधे से भी अधिक 50.42% और दूसरे में 38.2% दर्ज किया गया। इसके साथ ही, कीड़ों की वजह से खराब हुए हिस्से की मात्रा एक सैंपल में 9.8% और दूसरे में 7.79% थी, जबकि इसके लिए भी अधिकतम सीमा महज 1% है।
तेजपत्ता: तेजपत्ते के एक सैंपल में बाहरी तत्व 7.2% और दूसरे में 4% मिले, जबकि इसकी तय सीमा 1% है। कीड़ों द्वारा खाए गए और रोगग्रस्त पत्तों की जांच में यह आंकड़े और भी भयानक थे। जहां इसकी अधिकतम सीमा 10% है, वहीं पहले सैंपल में यह 32.50% और दूसरे सैंपल में 43.24% तक पाई गई।
लाल मिर्च: लखनऊ की प्रयोगशाला द्वारा जांची गई लाल मिर्च भी गुणवत्ता के पैमाने पर विफल रही। इसमें कीड़ों द्वारा क्षतिग्रस्त हिस्से की तय सीमा 1% है, लेकिन जांच के दौरान यह एक सैंपल में 8.4% और दूसरे में 8.8% पाई गई।
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