यूजीसी इक्विटी नियमावली पर सुप्रीम कोर्ट का स्टे निराशाजनक; यूपी-बिहार के संगठनों ने कहा- सम्मान और हिस्सेदारी के लिए सड़कों पर उतरेंगे बहुजन

45 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में आरक्षित पद खाली, भेदभाव में 118% की वृद्धि; यूपी-बिहार के संगठनों ने किया निर्णायक संघर्ष का ऐलान
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UGC इक्विटी नियमावली पर SC का स्टे! यूपी-बिहार के संगठनों ने क्यों कहा इसे निराशाजनक? जानिए विश्वविद्यालयों में खाली पदों और भेदभाव के चौंकाने वाले आंकड़े।(Ai Image)
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लखनऊ/पटना: उत्तर प्रदेश और बिहार के दर्जनों सामाजिक और राजनीतिक संगठनों ने एक साझा बयान जारी कर यूजीसी इक्विटी नियमावली पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्टे (रोक) लगाने के फैसले को 'निराशाजनक' करार दिया है। संगठनों ने आरोप लगाया है कि मोदी सरकार के कार्यकाल में संविधान पर हमले बढ़े हैं और एससी-एसटी व ओबीसी वर्ग के साथ सामाजिक अन्याय में वृद्धि हुई है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और फैसले पर सवाल

साझा बयान में संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्टे लगाते समय की गई टिप्पणी को 'हास्यास्पद' बताया है। उनका कहना है कि कोर्ट का यह फैसला और टिप्पणी यूजीसी इक्विटी नियमावली के विरोधियों के पक्ष में जाती दिख रही है। संगठनों ने अपने बयान में कहा कि सदियों से अन्याय और भेदभाव झेल रहे एससी-एसटी और ओबीसी के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले अक्सर निराशाजनक रहे हैं।

उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि इससे पहले कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट को कमजोर किया था, जिसे 2 अप्रैल 2018 के ऐतिहासिक आंदोलन और शहादतों के बाद ही दोबारा हासिल किया जा सका। वहीं, दूसरी तरफ ईडब्ल्यूएस (EWS) आरक्षण के मामले में कोर्ट ने एक दिन के लिए भी स्टे नहीं लगाया और उसे सही घोषित कर दिया।

केंद्रीय विश्वविद्यालयों में खाली पड़े आरक्षित पद

मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए संगठनों ने कहा कि मौजूदा दौर में हिंसा, उत्पीड़न और भेदभाव चरम पर है। बयान में आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया कि, 45 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में एससी (SC) के 64 प्रतिशत, एसटी (ST) के 84 प्रतिशत और ओबीसी (OBC) के 80 प्रतिशत प्रोफेसर के आरक्षित पद खाली हैं। 45 विश्वविद्यालयों में 38 कुलपति (Vice Chancellors) केवल अगड़ी जाति से हैं। यूजीसी के आंकड़ों के मुताबिक, 2019 से 2024 के बीच विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जाति आधारित भेदभाव की शिकायतों में 118 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

जाति जनगणना के फॉर्म पर संशय

संगठनों ने सामाजिक न्याय के लिए जाति जनगणना को एक जरूरी एजेंडा बताया। उन्होंने मोदी सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार ने जाति जनगणना की घोषणा तो की, लेकिन हाल ही में जारी जनगणना फॉर्म में एससी और एसटी के लिए कॉलम है, जबकि ओबीसी और शेष जातियों का इसमें कोई जिक्र नहीं है।

'सड़कों पर उतरना होगा'

संगठनों ने कहा कि यूजीसी इक्विटी नियमावली रोहित वेमुला और डॉ. पायल तड़वी की संस्थानिक हत्या के बाद उपजे संघर्षों की उपलब्धि है, जिससे पीछे नहीं हटा जा सकता। उन्होंने आह्वान किया कि बहुजनों को सम्मान, हिस्सेदारी और बराबरी के लिए एकजुट होकर निर्णायक संघर्ष के लिए सड़कों पर उतरना होगा।

बयान जारी करने वाले प्रमुख संगठन

इस साझा बयान को जारी करने वालों में सामाजिक न्याय आंदोलन (बिहार व यूपी), रिहाई मंच, यादव सेना, हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी, पूर्वांचल किसान यूनियन, पिछड़ा वर्ग उत्थान संघ, संविधान बचाओ संघर्ष समिति, कम्यूनिस्ट फ्रंट (बनारस) और बहुजन स्टूडेंट्स यूनियन (बिहार) सहित कई अन्य संगठन शामिल हैं।

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