
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई महीने में 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) के विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने वाली एक नाबालिग लड़की के उत्पीड़न के आरोपों पर गुरुवार को बेहद कड़ा रुख अपनाया है। सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि किसी को भी आपराधिक कार्यवाही आगे बढ़ाने से रोकने के लिए पीड़ित या उसके परिवार को धमकाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
इस मामले में 14 वर्षीय लड़की की ओर से पेश हुए वकील ने अदालत को बताया कि प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज कराने के बाद से ही बच्ची को परेशान किया जा रहा है और उसके घर में तोड़फोड़ भी की गई है। यह एफआईआर दक्षिणपंथी समर्थक स्वतंत्र भारद्वाज के खिलाफ दर्ज कराई गई थी, जिसने एक वीडियो में दावा किया था कि उसने सीजेपी के प्रदर्शन के दौरान बच्ची के पिता पर जानलेवा हमला किया था।
इस गंभीर मामले पर मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) की अगुवाई वाली पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि इस पर कोई दो राय नहीं हो सकती और ऐसे मामलों को हल्के में बिल्कुल नहीं लिया जा सकता। अदालत ने कहा कि किसी भी दोषी को संरक्षण नहीं मिलना चाहिए। पीठ ने स्पष्ट किया कि अगर किसी बच्ची के खिलाफ हिंसा शामिल है और आरोपी खुलेआम घूमकर परिवार को डराने-धमकाने की कोशिश कर रहे हैं, तो यह एक बेहद गंभीर मसला है।
इससे पहले 5 सितंबर को दिल्ली पुलिस ने स्वतंत्र भारद्वाज के खिलाफ दर्ज एफआईआर में एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम और आपराधिक धमकी की धाराएं भी जोड़ दी थीं। यह अहम कार्रवाई सीजेपी के नेतृत्व में हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान नाबालिग कार्यकर्ता के पिता पर हुए कथित हमले के मामले में की गई थी।
संसद मार्ग पुलिस स्टेशन के बाहर सीजेपी द्वारा भारद्वाज की तुरंत गिरफ्तारी की मांग को लेकर किए गए जोरदार प्रदर्शन के बाद, उसे बुलंदशहर से हिरासत में लिया गया था।
यह पूरी कार्रवाई उस भारी आक्रोश के बाद हुई जब भारद्वाज का एक इंटरव्यू सोशल मीडिया पर सामने आया था। उस साक्षात्कार में उसने खुलेआम दावा किया था कि 20 जुलाई के विरोध प्रदर्शन के दौरान उसने नाबालिग कार्यकर्ता के पिता का 'सिर फोड़' दिया था। आरोपी ने यह भी डींग हांकी थी कि अपने मजबूत राजनीतिक संपर्कों के कारण वह अब तक गिरफ्तारी से बच निकला है।
बच्ची के वकील ने बिना किसी का नाम लिए अदालत को यह भी बताया कि कैमरे में कैद हुए आरोपी के साथियों पर मुकदमा चलाने के बजाय, खुद उस बच्ची के खिलाफ ही एफआईआर दर्ज कर ली गई है। वकील ने सुप्रीम कोर्ट के पहले के आदेशों का हवाला देते हुए कहा कि यह कार्रवाई पूरी तरह से कानून के विपरीत है। उन्होंने अदालत को बताया कि लड़की के घर पर पथराव होने के सबूत के तौर पर वीडियो भी पेश किए जा सकते हैं।
वकील ने अपनी दलील में आगे कहा कि इस मामले के लिए बनाई गई उच्चाधिकार प्राप्त समिति अपना समय लेगी, लेकिन अगर इस बीच बच्ची को कुछ हो जाता है, तो उस नुकसान की भरपाई समिति के माध्यम से बाद में कभी नहीं की जा सकेगी।
इस चिंताजनक दलील पर प्रतिक्रिया देते हुए सीजेआई ने कहा कि यदि कोई असामाजिक तत्व बच्ची के खिलाफ हिंसा में शामिल हैं, वे खुलेआम घूम रहे हैं और उसे धमकाने की कोशिश कर रहे हैं, तो यह वास्तव में एक बड़ी चिंता का विषय है।
अंत में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को लड़की की एफआईआर पर उचित कार्रवाई सुनिश्चित करने का कड़ा निर्देश दिया है। इसके साथ ही अदालत ने इस संवेदनशील मुद्दे पर दिल्ली और उत्तर प्रदेश सरकार से विस्तृत रिपोर्ट भी तलब की है।
द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.
'द मूकनायक' जनवादी पत्रकारिता करता है. यह संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय पर चलने वाला मीडिया समूह है। अगर आप भी चाहते हैं कि 'द मूकनायक' हमेशा हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज बुलंद करता रहे, बेजुबानों की पीड़ा दिखाते रहें तो सब्सक्राइब करें।
यहां सब्सक्राइब करें