सुप्रीम कोर्ट ने यूपी पुलिस से पूछा: "रोड रेज केस में पत्रकार के डिजिटल डेटा की क्या जरूरत है?"

पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के खिलाफ दर्ज रोड रेज एफआईआर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यूपी पुलिस की जांच के तरीकों पर उठाए गंभीर सवाल, डिजिटल निजता को लेकर मांगा जवाब।
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उत्तर प्रदेश: अयोध्या राम मंदिर के चंदे में कथित गड़बड़ी का मुद्दा उठाने वाले स्वतंत्र पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस से कड़े सवाल किए हैं। सोमवार, 7 सितंबर को शीर्ष अदालत ने पूछा कि एक साधारण रोड रेज के मामले में जांच के लिए पुलिस को पत्रकार के डिजिटल फुटप्रिंट की आवश्यकता क्यों पड़ गई।

मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। अदालत ने गाजियाबाद के पुलिस आयुक्त को एक हलफनामा दायर करने का स्पष्ट निर्देश दिया है। इसमें उन्हें यह बताना होगा कि पत्रकार के खिलाफ दर्ज एफआईआर की जांच के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' (पूर्व में ट्विटर) से किस तरह की जानकारी मांगी गई है।

पीठ ने यह भी आदेश दिया है कि जब तक कोई अगला आदेश नहीं आ जाता, तब तक इस तरह की कोई भी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाएगी। इसके साथ ही, अदालत ने पत्रकार अभिषेक उपाध्याय को भी पुलिस की जांच में पूरा सहयोग करने का निर्देश दिया है।

अभिषेक उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर अपने खिलाफ दर्ज रोड रेज की एफआईआर को रद्द करने या जांच सीबीआई को सौंपने की मांग की है। उनका आरोप है कि यह मामला पूरी तरह से मनगढ़ंत है और उन्हें उनके पत्रकारीय कामकाज के कारण परेशान करने के लिए दर्ज किया गया है। पत्रकार ने यह भी दावा किया कि पुलिस उनके सूत्रों का पता लगाने के लिए 1 जून 2026 से उनकी डिजिटल गतिविधियों की जानकारी खंगाल रही है।

पत्रकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप राय ने दलील दी कि जांच एजेंसियों को किसी भी आरोपी की डिजिटल जानकारी मांगते समय उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना चाहिए। उन्होंने अदालत को बताया कि यूपी पुलिस ने यूट्यूब और एक्स जैसे सोशल मीडिया मंचों से कथित घटना की तारीख से काफी पहले का डेटा मांगा है। इसमें मोबाइल डिवाइस की पहचान करने वाला आईएमईआई (IMEI) नंबर तक शामिल है।

वकील प्रदीप राय ने जांच एजेंसियों पर तंज कसते हुए कहा कि वे अक्सर खुद को "राजा से भी ज्यादा वफादार" दिखाने की कोशिश करती हैं। उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि डिजिटल युग में जांच के लिए नए दिशा-निर्देश बनाए जाएं। साल 1996 के 'डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य' मामले का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है जब आरोपियों के डिजिटल अधिकारों और निजता की सुरक्षा के लिए कड़े नियम तय किए जाएं।

मुख्य न्यायाधीश ने इन चिंताओं को गंभीरता से लेते हुए स्वीकार किया कि तकनीक के विकास ने आपराधिक जांच के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। उन्होंने कहा कि एक तरफ आरोपी के अधिकारों की रक्षा करना जरूरी है, तो दूसरी तरफ जांच एजेंसियों को भी वैज्ञानिक तरीके से जांच करने की छूट मिलनी चाहिए, ताकि एक सही संतुलन कायम हो सके।

वहीं, उत्तर प्रदेश पुलिस की ओर से पेश वकील ने कहा कि वह इस बात की जानकारी जुटाएंगे कि जांच के लिए इस तरह के डिजिटल डेटा की मांग क्यों की गई। हालांकि, उन्होंने पत्रकार द्वारा राम मंदिर निर्माण से जुड़े एक इंजीनियर पर 40% कमीशन लेने के लगाए गए आरोपों पर तीखे सवाल उठाए। वकील ने कहा कि बिना किसी ठोस सबूत के इस तरह के व्यापक आरोप लगाना लोगों की छवि खराब करने जैसा है और यह पत्रकारिता के लिहाज से उचित नहीं है।

पुलिस के वकील ने अदालत को यह आश्वासन दिया कि अगर जांच के दौरान अभिषेक उपाध्याय के खिलाफ कोई भी आपत्तिजनक सामग्री नहीं मिलती है, तो पुलिस इस मामले में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर देगी। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि जांच को तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने के लिए अगर 'एक्स' से कोई विशेष जानकारी चाहिए, तो हलफनामे में उसका स्पष्ट कारण बताएं।

इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद पुलिस को निर्देश दिया था कि वह पत्रकार को एफआईआर की कॉपी और रोड रेज की घटना से जुड़ा सीसीटीवी फुटेज मुहैया कराए। अदालत ने उन्हें गिरफ्तारी से राहत देते हुए आगे की कानूनी मदद के लिए अधिकार क्षेत्र वाले हाई कोर्ट जाने की अनुमति भी दी थी।

बता दें कि एफआईआर में आरोप लगाया गया है कि उपाध्याय की एसयूवी ने एक दोपहिया वाहन को टक्कर मारी थी, जिसके बाद उन्होंने स्कूटर सवार को कथित तौर पर जातिसूचक गालियां दी थीं।

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