
नई दिल्ली: व्यावसायिक यौन शोषण (CSE) और मानव तस्करी का शिकार हुई युवा महिलाओं की सुरक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम कदम उठाया है। शुक्रवार, 29 मई 2026 को शीर्ष अदालत ने सरकार और संबंधित अधिकारियों के लिए व्यापक दिशा-निर्देश जारी किए हैं। यह ऐतिहासिक फैसला उन अनगिनत पीड़िताओं के लिए एक नई उम्मीद लेकर आया है, जिन्हें जबरन देह व्यापार के अंधेरे कुएं में धकेल दिया गया था।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने इस संवेदनशील मामले पर अपना फैसला सुनाया। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि 22 साल से अधिक समय से लंबित इस मामले का यह फैसला उनके "दिल के बहुत करीब" है। जजों ने मानव तस्करी को संवैधानिक गरिमा का खुला अपमान करार दिया। यौन शोषण की शिकार महिलाओं के बचाव और सुरक्षा के लिए एक समान प्रोटोकॉल स्थापित करने पर भी अदालत ने जोर दिया। फैसला सुनाते हुए जस्टिस पारदीवाला ने कहा, "हमने अपनी तरफ से सबसे बेहतर करने की कोशिश की है।"
कोर्ट रूम में इस प्रभावशाली फैसले को सुनाए जाने के दौरान एक बेहद खास पल भी आया। जस्टिस महादेवन ने इस मामले में सालों तक मजबूती से पैरवी करने वाली वरिष्ठ वकील अपर्णा भट के प्रयासों की खुले दिल से सराहना की। उन्होंने अपर्णा भट को संबोधित करते हुए कहा कि इस मामले में आपके लंबे संघर्ष और शानदार प्रयासों को इतिहास हमेशा याद रखेगा।
देह व्यापार में धकेली जाने वाली मासूम बच्चियों के लिए उचित कानूनों और सुरक्षा तंत्र की भारी कमी को उजागर करने वाली यह मूल याचिका साल 2004 में दायर की गई थी। गैर-सरकारी संगठन (NGO) 'प्रज्वला' ने इस जनहित याचिका को दाखिल किया था। इस याचिका में मुख्य रूप से इस बात पर गहरी चिंता जताई गई थी कि रेस्क्यू ऑपरेशन से पहले, उसके दौरान और बाद में पुनर्वास के समय पीड़ितों के साथ कैसा बर्ताव किया जाता है। संगठन ने मौजूदा कानूनी और संस्थागत सहायता प्रणाली को पूरी तरह से अपर्याप्त बताया था।
प्रज्वला एनजीओ की इस याचिका में मानव तस्करी के काले सच को गहराई से सामने रखा गया था। इसमें बताया गया था कि देह व्यापार के लिए तस्करी करना एक बेहद मुनाफे वाला आर्थिक अपराध बन चुका है। तस्करों का एक बहुत ही जटिल जाल इस पूरे नेटवर्क को चलाता है, जो कानून की खामियों से भली-भांति वाकिफ है। समय के साथ-साथ इस अपराध का स्वरूप भी बदला है और चिंताजनक बात यह है कि अब इसमें शिकार होने वाली बच्चियों की उम्र लगातार कम होती जा रही है।
याचिका के मुताबिक, आम तौर पर शिकार होने वाली युवतियों या उनके परिवारों को वित्तीय प्रलोभन देकर फंसाया जाता है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह लालच अक्सर ऐसे व्यक्ति द्वारा दिया जाता है जिस पर पीड़ित परिवार बहुत ज्यादा भरोसा करता है। अच्छी नौकरी का झांसा, ग्लैमर की दुनिया का आकर्षण, किसी परेशान पारिवारिक स्थिति से छुटकारा दिलाने का वादा या फिर शादी का लालच देकर इन मासूम जिंदगियों को हमेशा के लिए एक भयानक दलदल में धकेल दिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट की ये नई विस्तृत गाइडलाइंस अब इस पूरे अमानवीय तंत्र पर कड़ी चोट करने का काम करेंगी।
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