
लखनऊ: उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के सामने सुल्तानपुर जिले में एक दिव्यांग व्यक्ति के कथित कस्टोडियल टॉर्चर मामले में पुलिस अधिकारियों की लापरवाही को खुले तौर पर स्वीकार किया है। सरकार ने अदालत में यह माना है कि जब संबंधित पुलिस स्टेशन में लगे सीसीटीवी कैमरे खराब हुए, तो पुलिसकर्मियों द्वारा अनिवार्य कानूनी और विभागीय प्रक्रियाओं का पालन करने में भारी चूक हुई।
मुख्य सचिव शशि प्रकाश गोयल ने 21 फरवरी को अदालत में अपना व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर इस पूरे मामले की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने हाईकोर्ट को बताया कि लापरवाही बरतने वाले संबंधित पुलिस उपाधीक्षक (डीएसपी) के खिलाफ विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू कर दी गई है। इसके साथ ही पूरे राज्य के लिए एक नई और बेहद सख्त मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) लागू की गई है, जिसके तहत अब किसी भी थाने के सीसीटीवी कैमरों में आने वाली तकनीकी खराबी को 24 घंटे के भीतर ठीक करवाना अनिवार्य कर दिया गया है।
सरकार की तरफ से यह हलफनामा 4 फरवरी को जस्टिस अब्दुल मोईन और जस्टिस बबीता रानी की पीठ द्वारा दिए गए एक आदेश के जवाब में पेश किया गया। यह पूरा विवाद एक 56 वर्षीय दिव्यांग व्यक्ति द्वारा दायर की गई याचिका पर आधारित है।
पीड़ित का आरोप है कि 6 और 7 सितंबर 2025 की दरमियानी रात को पुलिस ने उसे उठाया था और सुल्तानपुर जिले के मोतीगरपुर पुलिस स्टेशन के भीतर उसके साथ बेरहमी से मारपीट करते हुए अमानवीय शारीरिक यातनाएं दी गईं।
इन गंभीर आरोपों को देखते हुए सितंबर 2025 में ही हाईकोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिया था कि वह टॉर्चर के दावों की सच्चाई परखने के लिए थाने की सीसीटीवी फुटेज को सुरक्षित रखे। हालांकि, इस आदेश के जवाब में मोतीगरपुर के थाना प्रभारी (एसएचओ) ने अदालत में यह दावा करके सबको चौंका दिया कि थाने के कैमरे घटना से पूरे तीन महीने पहले यानी 1 जून 2025 से ही खराब पड़े हुए थे।
इस पूरे घटनाक्रम और पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ा रुख अपनाते हुए हाईकोर्ट ने अब इस मामले की आगे की सुनवाई के लिए 12 मार्च की तारीख तय की है।
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