
पद्मश्री से सम्मानित तेलुगु विद्वान और प्रवचनकार गरिकपति नरसिंह राव इन दिनों अपनी एक विवादास्पद टिप्पणी के चलते कड़े विरोध का सामना कर रहे हैं, जिसमें उन्होंने सरकारी स्कूलों की मिड-डे मील योजना को बेमानी बताते हुए गरीब बच्चों की तुलना "सजे-धजे दूल्हे" (शोभनम पेल्लिकोडुकुलु) से की और अंडे को "गधे के अंडे" कहकर संबोधित किया।
गरिकपति पर जातिवादी सोच रखने के आरोप लग रहे हैं और संगठनों ने उनसे माफी की मांग की है। छात्र संगठन एसएफआई की आंध्र प्रदेश इकाई ने गरिकपति के बयान की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि यह कहना कि बच्चे केवल अंडे के लिए स्कूल आते हैं, पढ़ाई के लिए नहीं, गरीब छात्रों के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाता है और कई अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों से साबित हुआ है कि मिड-डे मील स्कूल छोड़ने की दर को कम करने में मदद करता है। एसएफआई ने अपने बयान में यह भी कहा कि छात्रों की तुलना दूल्हे से करना उनके प्रति अपमानजनक है और इस टिप्पणी से गरीब परिवारों के उन बच्चों की भावनाएं आहत हुई हैं, जिनके लिए मिड-डे मील ही दिन का एकमात्र पौष्टिक भोजन होता है।
हाल ही मुंबई तेलुगु समिति और महाराष्ट्र के तेलुगु संघों के महासंघ द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में गरिकापति ने सवाल उठाया कि सरकार को स्कूली बच्चों को पोषण, विशेष रूप से अंडे, क्यों उपलब्ध कराने चाहिए? उन्होंने कहा- "स्कूलों में मिड-डे मील शिक्षा से ज़्यादा ज़रूरी हो गया है। लोगों को इस बात की परवाह है कि अंडे मिल रहे हैं या नहीं... जो लोग चावल खाते हैं, उन्हें आप अंडे क्यों परोसते हैं? क्या उनमें कोई समझ नहीं है? छात्रों से कहो कि अगर वे पढ़ना चाहते हैं तो रुकें, वरना चले जाएं। क्या वे इसी के लिए स्कूल आते हैं? अंडों के लिए? यह शिक्षकों का दुर्भाग्य है कि उन्हें इन अंडों का हिसाब-किताब रखना पड़ता है"। गरिकापति ने गरीब छात्रों को दिए जाने वाले अंडों को मज़ाक उड़ाते हुए 'गधे के अंडे' भी कहा।
उन्होंने कहा कि बच्चों को अपना खाना खुद लाना चाहिए या स्कूल छोड़ देना चाहिए। "वे बच्चों को खाना, यूनिफ़ॉर्म, किताबें सब देते हैं - क्या ये सब देने से बच्चा पढ़ाई करेगा? वह तो शादी की रात दूल्हे की तरह बिस्तर पर बैठा रहेगा। वह पढ़ाई क्यों करेगा? क्या छात्रों को इतनी सारी सुविधाओं की ज़रूरत है? कोई शिक्षित नहीं हो रहा है, उन्हें बस खाना मिल रहा है।" उन्होंने आगे कहा कि सरकार के पास मिड-डे मील कर्मचारियों को वेतन देने के लिए भी पर्याप्त पैसे नहीं हैं।
गरिकापति ने कहा, "अपनी शिक्षा के लिए अपने पैसे खर्च करो, अपना खाना खुद खाओ, अपने कपड़े खुद पहनो, अगर मन करे तो पढ़ाई करो। मैं यह इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि मेरी बातें दोनों तेलुगु राज्यों के अधिकारियों तक पहुँचेंगी। सरकार का काम अच्छी शिक्षा देना है, न कि किताबें, यूनिफ़ॉर्म और खाना देना। किसी में भी यह कहने की हिम्मत नहीं है कि, 'हम तुम्हें अच्छी शिक्षा देंगे; अगर तुम हम पर भरोसा करते हो तो हमारे पास आओ, वरना चले जाओ।' क्योंकि हर कोई दोबारा चुनाव जीतना चाहता है।"
गरिकपति के इस बयान को जातिवादी माने जाने के पीछे कई ऐतिहासिक और सामाजिक कारण हैं, क्योंकि मिड-डे मील योजना का सबसे अधिक लाभ दलित, आदिवासी और अति-पिछड़े वर्ग के उन बच्चों को मिलता है जो घर से भोजन नहीं ला पाते और आलोचकों के अनुसार गरिकपति ने इन बच्चों की विवशता को "दूल्हा" जैसे उपहासास्पद शब्दों में तब्दील करके पारंपरिक जातिवादी मानसिकता को उजागर किया है, जो सदियों से उच्च जातियों द्वारा दलितों और पिछड़ों को शिक्षा और भोजन से दूर रखने की कोशिशों की याद दिलाता है।
सामाजिक कार्यकर्ताओं और दलित नेताओं का यह भी कहना है कि दलित-आदिवासी समुदायों में कुपोषण की दर राष्ट्रीय औसत से अधिक है और ऐसे में मिड-डे मील न केवल शिक्षा बल्कि इन बच्चों के पोषण का भी महत्वपूर्ण साधन है, इसलिए इस योजना को "बेमानी" बताने वाली गरिकपति की टिप्पणी को उनकी सुविधापूर्ण वर्गीय सोच के रूप में देखा जा रहा है और कुछ लोगों ने तो उनके खिलाफ एससी/एसटी अत्याचार अधिनियम के तहत कार्रवाई की मांग भी कर दी है।
गरिकपति के इस विवाद के बीच एक और पुराना मामला भी चर्चा में आ रहा है, जब ब्राह्मण समुदाय से जुड़े समूह द्वारा संचालित प्रमुख अखबार डिनामलर ने अगस्त 2023 में तमिलनाडु सरकार की मुख्यमंत्री नाश्ता योजना पर एक विवादास्पद रिपोर्ट छापी थी। इसमें कहा गया था कि सरकारी स्कूलों में दोगुना भोजन मिलने से बच्चों के शौचालय भर गए हैं। उस समय तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने इस खबर की कड़ी निंदा करते हुए इसे "मनुवादी" और "सनातन" सोच करार दिया था और कहा था कि यह रिपोर्ट गरीबों और शोषितों के प्रति घृणा को दर्शाती है। इस पुराने विवाद का जिक्र इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यह उसी मानसिकता का एक और उदाहरण है, जहां गरीब और दलित बच्चों के लिए चलाई जा रही कल्याणकारी योजनाओं को उपहास का पात्र बनाया जाता है, चाहे वह मिड-डे मील में दिए जाने वाले अंडे को "गधे के अंडे" कहना हो या नाश्ता योजना को शौचालय भरने का कारण बताना।
बीआरएस नेता, पूर्व आईपीएस, आरएस प्रवीण कुमार ने घटना की निंदा की,उन्होंने कहा कि गरिकपति की टिप्पणियां प्रभुत्वशाली जातियों के उस रवैये को दर्शाती हैं जो सदियों से गरीबों की शिक्षा और पोषण के खिलाफ रही हैं। उन्होंने गरिकपति की सराहना करने वालों पर भी व्यंग्य करते हुए कहा, " गरिकापति सिर्फ़ बकवास नहीं कर रहे हैं, मुझे उन बेवकूफों पर तरस आता है जो उनके ऐसे ज़ोरदार भाषणों पर उनकी तारीफ़ करते हैं। उनके जैसे लोगों पर केस करके उन्हें चंचल गुडा ‘अंडा’ सेल में डाल देना चाहिए।" एक सार्वजनिक स्वास्थ्य संगठन प्रजा आरोग्य वेदिका ने कहा कि मिड-डे मील योजना गरीबी के कारण स्कूल छोड़ने वाले बच्चों के लिए वरदान है। किसी भी बच्चे को गरीबी के कारण शिक्षा से वंचित नहीं रहना चाहिए।
इस विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए गरिकपति की टीम ने एक बयान जारी किया, जिसमें दावा किया गया कि उनकी टिप्पणियों को तोड़-मरोड़कर पेश किया जा रहा है और उन्हें संदर्भ से हटकर देखा जा रहा है। बयान में कहा गया, "सभी गरीब लोग गुरुवर के भाषणों से प्रभावित होकर हिंदू धर्म के प्रति उत्साहित और प्रेरित हुए हैं। इस बात को पचा न पाते हुए, कुछ मूर्ख लोग उन्हें गरीबों से दूर करने के लिए दुर्भावनापूर्ण दुष्प्रचार फैला रहे हैं।"
द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.