
नई दिल्ली: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने शुक्रवार को कहा कि न्यायिक प्रक्रियाओं में आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल ने भौगोलिक सीमाओं को तोड़ दिया है। इससे मुकदमा लड़ने वाले लोगों को दुर्गम रास्तों, आर्थिक तंगी और लंबी दूरी जैसी बुनियादी समस्याओं से पार पाने में बड़ी मदद मिल रही है।
'प्रौद्योगिकी और न्यायिक शिक्षा पर राष्ट्रीय कॉन्क्लेव' (National Conclave on Technology and Judicial Education) के दो दिवसीय उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए सीजेआई ने न्यायपालिका में आए बदलावों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि भारतीय कानूनी व्यवस्था अब कागजी कार्रवाई के उस पुराने दौर से काफी आगे निकल चुकी है, जहां अहम रिकॉर्ड सिर्फ फाइलों में बंद रहते थे। आज हम एक बेहद सक्रिय और जीवंत डिजिटल इकोसिस्टम का हिस्सा बन चुके हैं।
इस खास मौके पर मुख्य न्यायाधीश ने सिक्किम को देश की पहली पेपरलेस (कागज रहित) राज्य न्यायपालिका घोषित किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि देश भर की न्यायिक प्रणाली में तकनीक को जोड़ने का सीधा अर्थ उन तमाम भौगोलिक और आर्थिक बाधाओं को जड़ से खत्म करना है, जो आम आदमी और न्याय के बीच दीवार बनकर खड़ी होती हैं।
अदालत तक पहुंचने के पुराने संघर्ष को सहनशक्ति की परीक्षा बताते हुए सीजेआई ने हिमालय का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि विशाल और शानदार हिमालयी रास्तों पर आवाजाही हमेशा से धीमी और मुश्किल रही है। अगर एक दशक पहले की ही बात करें, तो सिक्किम के किसी वादी के लिए न्याय पाने का सफर किलोमीटर में नहीं, बल्कि संकरे रास्तों और खराब मौसम के बीच यात्रा के दिनों में मापा जाता था।
मुख्य न्यायाधीश ने इस बात पर खास जोर दिया कि डिजिटल बदलाव सिर्फ कोई सैद्धांतिक या किताबी बात नहीं रह गई है। यह कानून के शासन को प्रभावी ढंग से बनाए रखने के लिए आज के समय की सबसे बड़ी व्यावहारिक जरूरत है।
उन्होंने यह भी बताया कि ई-कोर्ट्स (e-Courts) प्रोजेक्ट ने आम नागरिक और कानून के बीच के रिश्ते को पूरी तरह से नया रूप दे दिया है। सीजेआई कांत के अनुसार, जिन कानूनी कामों के लिए पहले अदालत के चक्कर काटने पड़ते थे और लंबी पूछताछ से गुजरना पड़ता था, वे सभी सुविधाएं अब एक साधारण डिजिटल इंटरफेस के जरिए लोगों की उंगलियों पर मौजूद हैं।
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