गलत प्रकरण दर्ज कर रही थी एमपी पुलिस, PHQ ने एफआईआर और विवेचना को लेकर जारी किया सर्कुलर

बीएनएसएस तभी लागू होगा जब विशेष अधिनियम में अलग प्रक्रिया न हो; पुलिस आयुक्तों और एसपी को सटीक कानूनी व्याख्या के साथ कार्रवाई के निर्देश
पुलिस मुख्यालय भोपाल
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भोपाल। मध्य प्रदेश में अलग-अलग थानों में विशेष अधिनियम (स्पेशल एक्ट) के तहत दर्ज किए जा रहे मामलों में कानूनी प्रक्रियाओं की गलत व्याख्या सामने आने के बाद पुलिस मुख्यालय (PHQ) ने सख्त रुख अपनाया है। यह पाया गया कि कई मामलों में पुलिस द्वारा स्पेशल एक्ट के तहत आने वाले अपराधों को गलत श्रेणी में रखते हुए भारतीय न्याय संहिता (BNS) के संज्ञेय अपराधों के साथ जोड़कर एफआईआर दर्ज की जा रही थी, जिससे न केवल केस की कानूनी स्थिति कमजोर हो रही थी बल्कि अभियोजन की प्रक्रिया भी प्रभावित हो रही थी। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए स्पेशल डीजी, अपराध अनुसंधान विभाग ने प्रदेशभर के सभी पुलिस आयुक्तों, पुलिस अधीक्षकों और अन्य इकाइयों को विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

पुलिस मुख्यालय द्वारा जारी सर्कुलर में स्पष्ट किया गया है कि विधानसभा सत्र के दौरान उठे प्रश्नों और आंतरिक समीक्षा में यह खामी सामने आई कि कई थानों में विशेष अधिनियमों के प्रावधानों को नजरअंदाज किया जा रहा है। कई मामलों में ऐसे अपराधों को "असंज्ञेय" मान लिया गया, जबकि वे विशेष कानूनों के अंतर्गत अलग प्रक्रिया से संचालित होते हैं। इसके चलते एफआईआर पंजीयन से लेकर विवेचना और अभियोजन तक पूरी कानूनी प्रक्रिया प्रभावित हो रही थी, जिससे आरोपियों को लाभ मिलने और पीड़ितों को न्याय मिलने में देरी की आशंका बढ़ जाती है।

सबसे महत्वपूर्ण निर्देश यह दिया गया है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) 2023 के प्रावधानों का उपयोग तभी किया जाएगा जब संबंधित विशेष अधिनियम में अलग से कोई प्रक्रिया निर्धारित न हो। यदि किसी कानून में अपराध के पंजीयन, जांच या अभियोजन की स्पष्ट प्रक्रिया दी गई है, तो उसी का पालन करना अनिवार्य होगा। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि हर केस अपने संबंधित कानून के तहत मजबूत और विधिसम्मत तरीके से आगे बढ़े।

विशेष अधिनियमों का गंभीरता से अध्ययन पर जोर

आदेश में यह भी कहा गया है कि सभी पुलिस अधिकारी चाहे वे जिला स्तर पर हों या विशेष इकाइयों जैसे रेल पुलिस, एसटीएफ या साइबर सेल उन्हें विशेष अधिनियमों का गंभीरता से अध्ययन करना होगा। केवल सामान्य आपराधिक कानूनों के आधार पर कार्रवाई करने के बजाय संबंधित एक्ट की धाराओं और प्रक्रियाओं को समझकर ही एफआईआर दर्ज करनी होगी। इससे जांच की पारदर्शिता बढ़ेगी और कोर्ट में केस टिकाऊ बनेगा।

पुलिस मुख्यालय ने अपने सर्कुलर में कई प्रमुख अधिनियमों का उदाहरण देते हुए प्रक्रिया स्पष्ट की है। दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 के तहत पुलिस की जिम्मेदारी होगी कि पीड़ित को कार्यपालिक मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन का अधिकार बताया जाए, साथ ही उसे सेवा प्रदाताओं, संरक्षण अधिकारियों और निःशुल्क विधिक सहायता की जानकारी दी जाए। इसी तरह घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005 में पीड़िता को उपलब्ध सेवाओं, संरक्षण अधिकारियों और कानूनी सहायता के बारे में जानकारी देना अनिवार्य किया गया है।

वहीं मध्यप्रदेश सहकारी समितियां अधिनियम 1960 के मामलों में बिना सक्षम प्राधिकारी की लिखित अनुमति के कोई संज्ञान नहीं लिया जा सकेगा। इसी प्रकार केंद्रीय माल एवं सेवा कर अधिनियम 2017 के तहत निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ही कार्रवाई करनी होगी। खाद्य एवं औषधि नियंत्रण अधिनियम 1957 में स्पष्ट है कि अभियोजन केवल अधिकृत अधिकारी द्वारा न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करने के बाद ही आगे बढ़ेगा।

इसके अलावा पुलिस मुख्यालय ने मनी लॉन्ड्रिंग निवारण अधिनियम 2002 (PMLA), पासपोर्ट अधिनियम 1967, मध्यप्रदेश श्रम कल्याण निधि अधिनियम 2006 और मध्यप्रदेश देनदार संरक्षण अधिनियम 1937 जैसे कानूनों का हवाला देते हुए कहा है कि इन सभी में निर्धारित प्रक्रिया से ही कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। इन कानूनों में अलग-अलग प्रकार की जांच और अभियोजन प्रणाली है, जिसे नजरअंदाज करना कानूनी रूप से गंभीर त्रुटि मानी जाएगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम पुलिसिंग प्रणाली में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। यदि पुलिस अधिकारी संबंधित कानूनों के प्रावधानों को सही तरीके से लागू करते हैं, तो इससे न केवल केस की गुणवत्ता बेहतर होगी बल्कि न्यायिक प्रक्रिया भी तेज और प्रभावी बनेगी। लंबे समय से यह शिकायत सामने आती रही है कि गलत धाराओं में केस दर्ज होने के कारण आरोपी अदालत में आसानी से राहत पा जाते हैं।

द मूकनायक से बातचीत में विधि विशेषज्ञ और अधिवक्ता मयंक सिंह ने बताया कि विशेष अधिनियमों के प्रावधानों की सही समझ और उनका सटीक अनुपालन न्याय प्रक्रिया की बुनियाद है। उन्होंने कहा कि कई मामलों में पुलिस द्वारा स्पेशल एक्ट को नजरअंदाज कर सामान्य आपराधिक कानूनों के तहत एफआईआर दर्ज कर दी जाती है, जिससे केस कानूनी रूप से कमजोर हो जाता है और अदालत में टिक नहीं पाता। उनके अनुसार, पुलिस मुख्यालय द्वारा जारी यह सर्कुलर एक जरूरी कदम है, जो न केवल जांच की गुणवत्ता को बेहतर बनाएगा बल्कि अभियोजन को भी मजबूत करेगा और पीड़ितों को समय पर न्याय मिलने में मदद करेगा।

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